Only You Are

No one knew –
No one –
No one was here to know anything,
There was nothing but
God was somewhere,
It’s true that God was right only,
He was right – He is – He will be,
He is the provider of all,
He doesn’t have to go anywhere-
He is omnipresent,
Everything is done by Him & will do,
Whatever we see –
All belongs to Him,
Everything originates from Him
& will eventually dissolve within Him,
It’s true that You know Yourself
& only You are right,
You were the one only –
Always will be –
You’re You.


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केवल तूं ही Only You Are

किसी को किसी की
खबर ही नहीं थी
खबर रखता भी कौन
कोई तो न यहां था
कुछ भी नहीं था
पर वह तो कहीं था
यह सच है कि
केवल वही एक सही है
सभी कुछ है उसमें
सभी में वही है
न आता न जाता
वह हरदम यहीं है
वह खुद ही है करता
और खुद ही करेगा
सब निकला उसी से
उसी में मिलेगा
यह सच है कि तुझको ही
तेरी खबर है
तूं इक था – रहेगा
तूं ही तूं – तूंही है।

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ओ नैया O Boat

(Hindi & English Both Language)

ओ नैया!
अपना पाल फैलाओ,
रुक गई क्यों तुम बीच समंदर,
यूं ही व्यर्थ न समय गंवाओ,
लहराती झूमें मस्त हवाएं,
तुम भी इनके संग लहराओ,
भूल के अपना सारा दुख दर्द,
नृत्य करो और गुनगुनाओगे,
मत डरो देख के लहरें ऊंचीं,
पीठ पे इनकी तुम चढ़ जाओ,
भय भीतर से फेंक निकालो,
सीने में साहस भर दिखलाओ,
पहचानो अपने निज बल को,
न रुको, चलो, आगे बढ़ जाओ।

O Boat!
Spread your sails,
Don’t waste your time
by stopping
in the mid of ocean,
You must swing & wave
with the cool wind,
Sing & dance with them
to forget all
your pain & sorrow,
Don’t be afraid
to see
the high waves,
Get on their back,
Recognize
your inner strength,
Throw the fear
out of you,
Show yourself with courage,
Don’t stop,
Come on,
Go ahead.


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प्रकाश Light

Happy Diwali

नहीं था जब कुछ भी यहां,
तिमिर – प्रकाश का जन्म हुआ,
तब से लेकर वर्तमान तक,
दोनों में संघर्ष हुआ,
तिमिर था फैला दूर दूर तक,
इसका अपना राज्य था,
नहीं था इसमें कुछ भी पनपा,
फिर प्रकाश विजयी हुआ,
सूर्य रश्मियां फैलीं जैसे ही,
नवजीवन का उदय हुआ,
छंटा तिमिर – प्रकाशित ब्राह्मण्ड,
प्रसन्नता का वास हुआ,
केवल एक दीप बहुत है,
इस दीवाली तिमिर मिटाने को,
प्रज्ज्वलित दीप हो बाहर भीतर,
खुशहाली को लाने को,
मिटे विकार – छंटे अंधकार,
है यही आस दीवाली को।

अपना पराया

जीवन भर हम लोगों को परखते ही रह जाते हैं कि यह अपना है या पराया…यहां अपने पराये और पराये अपने बन मिलते –  बिछड़ते रहते हैं। यहां तो हरदम संग चलने वाला दम भी अंत मे पराया हो जाता है…

कोई कहे अपना – कोई पराया,
किसी को कुछ भी समझ न आया,
सब कोई कर्म है अपना लाया,
भोग के हर कोई जग से जाया,
किसको कहें यह है मेरा अपना,
नहीं अपना – अपना ही साया,
जब जन्मा था – हाथ था खाली,
जो पाया सब छोड़ के जाया,
मिले जो संगी – साथी जग में,
अंत में संग न कोई जाया,
सुख में गुड़ में चींटे बन चिपके,
दुख में नजर न कोई आया,
ढूंढे बहुत सहारे व्यर्थ ही,
अंत सहारा भीतर पाया,
अपना हमदम अपने भीतर,
अंतिम दम तक साथ निभाया।


उलझन Confusion

हम अक्सर इन्हीं उलझनों से घिरे रहकर परेशान और उदास रहते हैं कि संसार में वह ऐसा क्यों है और मैं…जिस दिन यह सब छोड़कर हम सत्कर्मों में लग जाते हैं, उसी दिन से उलझनों की गांठे सुलझना शुरू हो जातीं हैं…
We are often troubled and sad by being surrounded by these confusions that why every person and personality is so different…The day we leave all this and engage in good deeds, from that day the knots of confusion start to unravel.

सबकी अपनी अपनी बुद्धि,
सबके पास है अपना मन,
कोई तरसे दाने दाने को,
किसी के घर है धन ही धन,
कोई कलूटा काला बदसूरत,
किसी का स्वर्ण सा दमके तन,
किसी के मुख से झड़ते फूल,
कोई फुंफकारे काढ़ के फन,
कोई फाड़े कपड़े सबके,
कोई सबके लिए सज्जन,
सबके अपने कर्म – अपना स्वभाव,
छोड़ दे तूं सारी उलझन,
कर सत्कर्म – बन पावन – तप के,
सदा नहीं रहता जीवन।


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दो अक्टूबर

दो अक्तूबर को भारत में,
दो सुगंधित फूल खिले,
पर जीवन भर राहों में,
कांटें ही उनको बिछे मिले,
विपरीत परिस्थितियों में ही,
वह जीवन भर घिरे रहे,
पर कभी उन्होंने हार न मानी,
संघर्षों में लगे रहे,
बापू का स्वदेशी का नारा गूंजा,
जब चरखे का चक्र चला,
हर इक जन तक खादी पहुंचा,
और विदेशी वस्त्र जला,
जय जवान जय किसान कहा
शास्त्री जी ने,
किसानों का उचित सम्मान किया,
उनके पराक्रम के चलते सेना ने,
पाकिस्तान परास्त किया,
आओ हम भी लग जाएं,
उनके सपने सच करने में,
रंगें देशभक्ति में खुद को,
जुट जाएं देश को विकसित करने में,
जल-थल-वायु करें साफ,
स्वच्छ भारत का लें संकल्प,
स्वस्थ तन-मन रखने में,
स्वच्छता का नहीं है कोई विकल्प,
अब लग जाएं हम स्वच्छता में,
आभा से हर कोना दमके,
छा जाएं जग के नभ पे,
बन के सूरज भारत चमके ।


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हिंदी Hindi

भारतीय संस्कृति थी विश्व में फैली,
संस्कृत ही प्रथम भाषा थी,
हिंदी इसकी मुंहबोली बेटी थी,
और भारत की परिभाषा थी,
इस पर काले बादल छाए,
घनघोर विष की वर्षा लाए,
अरबी फारसी उर्दू आदि ने,
इस पर गहरा आघात किया,
अंगेजों की अंग्रेजी ने,
इसको लगभग समाप्त किया,
पर विद्वानों ने अनवरत,
इसका भी उपचार किया,
लेकर इसको साथ चले,
फिर से इसका प्रचार हुआ,
राग छुपे हैं इसमें सारे,
इसमें छुपा समस्त संगीत,
नहीं है बनता इसके बिन,
सुगम मनोहर कोई गीत,
जन जन के प्राणों में बसती,
साहित्यकारों की है मीत,
इक दिन ऐसा आएगा फिर से,
यह विश्व पटल पर छाएगी,
भारत होगा विश्व गुरु,
विश्व भाषा हिंदी कहलाएगी,
हिंदी ही बोली जाएगी,
हिंदी ही बोली जाएगी।


आईये, सत् साहित्य पढ़ने का आनंद लिया जाए http://www.keyofallsecret.com

मानसिक आजादी Mental Freedom

आजाद होते हुए भी हम कहीं न कहीं से विदेशी संस्कृतियों के जाल में फंसे हुए हैं। वह हमारी पवित्र पुरातन संस्कृति को तेजी से अपना रहे हैं और हम उनकी। इस जाल को काटकर हमें मानसिक रूप से स्वतंत्र होना होगा।

तोड़ गुलामी की जंजीरें,
आजादी की अलख जगाई,
देश – कौम के मतवालों ने,
अपनी – अपनी बली चढ़ाई,
वर्तमान हम गौर से देखें,
आजाद नहीं हैं आज भी हम,
पाश्चात्य संस्कृति सर चढ़ बोले,
अपना सब कुछ भूल गए हम,
कभी हुआ करता था भारत,
आज अभी से दो गुना,
कितना कुछ छिन गया है हमसे,
अब हो गया यह बौना,
ज्ञान समस्त लेकर हमसे ही,
पश्चिम आगे और बढ़ा,
हमसे ही सब छीन- छान कर,
उन्नति के शिखर पे जा चढ़ा,
दे अपनी भौंडी असभ्यता,
नव पीढ़ी को बर्बाद किया,
संस्कृति सभ्यता ले भारत की,
ह्रदय से अंगीकार किया,
अब भी समय है चेत जाओ,
तोड़ गुलामी की जंजीरें मन से,
नवयुग का निर्माण करो,
स्वयं को आजाद करो।।


चलते रहिए Keep going

हम अपनी जिंदगी में कितनी ही हद तक परेशान भले ही क्यों न हो जाएं, गमों के बोझ तले भले कितना ही क्यों न दब जाएं। पूरी हिम्मत से फिर से आगे बढ़ने पर कामयाबी जरूर मिलती है।
Even if we get disturbed to some extent in our life, no matter how much we get buried under the burden of sorrows. Success is definitely achieved if you move forward again with full courage.

दिल में जले चिराग को,
बुझने न दीजिए,
जिंदगी को खुद पे बोझ,
बनने न दीजिए,
जमाने की ठोकरों से,
लड़खड़ा भले ही जाईए,
बुरे वक्त के दरिया में,
डूबीए – उतराईए,
उठिए…हिम्मत तो कीजिए,
खुद को सम्भालिए,
चलने से ही तो है जिंदगी,
कदम बढ़ाईए,
चलना न कम कीजिए,
चलते ही जाईए,
जिस्म तो है एक जरिया,
केवल इसे न देखिए,
ताकत का जरिया तो है रूह,
रूह में उतर के तो देखिए,
आगे है रोशन राह,
आगे चल के तो देखिए।


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भेषधारी

झूठे भेषधारी जनता को बेवकूफ बनाकर अपनी झोलियां तो भर सकते हैं पर भीतर से वह भी भयभीत ही रहते हैं… वहीं सच्चे संत सच की राह पर चलकर अपने प्रभु संग आनंदित रहते हैं।

जिसने पहना कपड़ा बढ़िया,
वही हो गया संत,
पता नहीं है चाहे उसको,
मिलता कैसे कंत,
करे कर्म कृतघ्न वाले,
रहता सदा ही जंत,
मन भर के वह भोग करे,
भोगे भोग अनंत,
नहीं जानता अपने बारे,
कब हो जाएगा अंत,
बक्के बक बक दे उपदेश,
होत नहीं करमवंत,
लूटे जन को धर्म नाम पे,
होत जाए धनवंत,
रखे चाहे भेष अनेकों
नहीं बनता पतवंत,
होता मिलन उसी का प्यारे,
जो होता सतवंत।


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जागो Wake up

हमारी पूरी जिंदगी जोड़ – घटाव यानी सुख का पीछा करने में ही बीत जाती है और हम असली सुख देने वाले को बिसारते रहते हैं, परन्तु सोते से जागने और सच्चे सुख को पाने की शुरुआत कभी भी हो सकती है।

उम्र बढ़ती रही,
मैं बिगड़ता रहा,
लालसा बढ़ती रही,
मैं बढ़ाता रहा,
मासूमियत छोड़ कर,
वह बचपन की,
जवानी में गोते लगाता रहा,
मैं जोड़ता रहा,
तमाम उम्र बहुत कुछ,
पर अनमोल सांसें गंवाता रहा,
मैं समझता रहा,
गहरे समंदर में खुद को,
पर कीचड़ में खुद को लिपटाता रहा,
दुनिया को हर पल निहारा किया,
पर खुद से ही,
नजरें चुराता रहा,
जो न करना था,
वह ही किया उम्र भर,
जो था करना,
उसी से किनारा मैं करता रहा,
गर अब भी जाग जाऊं,
सोते से आज भी,
मिलेगा वह जो,
हर क्षण है,
दिल में धड़कता रहा।


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बीज Seed

पृथ्वी पर हरियाली का आरंभ होने से पहले धरती में बीज कहां से आए, यह एक परम् आश्चर्य है एवं उन लघु बीजों के भीतर में कौन सी शक्ति छुपी बैठी है जो समय आने पर इतना विशाल रूप धारण करके सबकी पालना करती है।
Before the beginning of greenery on earth, where did the seeds come from in the earth, it is a great wonder and what power is hidden among those small seeds, which when the time comes, takes such a huge form and sustains everyone.

बीज हैं आते पौधों से,
पौधे हैं आते बीजों से,
यह क्रम यूं ही चलता रहता है,
न जाने कितने युग से,
नहीं है कोई जान सका,
आए यह बीज कहां से,
क्या पहले से ही थे ढेरों,
या आए हैं उस एक से,
आरंभ हुआ है जीवन का,
इन अनगिनत बीजों से,
देते जीवन जीवों को,
बन फूल – फसल – फल – सब्जी से,
शुद्ध वायु – लकड़ी देते,
अपनी पावन हरियाली से,
होता आश्चर्य कैसे बनता,
वृक्ष विशाल लघु बीजों से,
लग जाते नव निर्माण में,
ज्यों ही मिलते धरती मां से,
नमन उसे जो देता शक्ति,
बीजों को भीतर से।


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मैं रहता हूँ उस देश में

मैं रहता हूँ उस देश में,
जहाँ नानक की भक्ति है,
गुरु गोबिंद की शक्ति है,
जहाँ धर्म की आन की खातिर,
शीश लुटाए जाते हैं,
जहाँ पे मांओं के बच्चे,
चक्की में पिसाए जाते हैं,
जहाँ पे नन्हे नन्हे प्राण,
भालों पे नचाए जाते हैं,
जहाँ फतेह जोरावर सिंह,
दीवारों में चिनाए जाते हैं,
जहाँ गुरु अर्जुन देव जी,
अंगारों पे बिठाए जाते हैं,
जहाँ पे भाई मतीदास,
आरों पे चढ़ाए जाते हैं,
जहाँ पे भाई मनी सिंह,
अंग-अंग कटवाए जाते हैं,
जहाँ चांदनी चौक में गुरु,
शीश लुटाए जाते हैं,
जहाँ गीदड़ से परिवर्तित कर,
सिंह सजाए जाते हैं,
जहाँ पे सन्तों के द्वारा,
भगवान मिलाए जाते हैं,
हाँ, मैं रहता हूँ उस देश में।


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आज विश्व पर्यावरण दिवस (5th June 2021) के अवसर पर नालागढ़ साहित्य कला मंच की online कवि गोष्ठी में भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि श्री यशुदीप सिंह जी (DFO) और विशिष्ट अतिथि श्री बलबीर भारद्वाज जी (APRO) थे। सभी प्रबुद्ध साहित्यकारों की पर्यावरण पर आधारित रचनाएं सराहनीय थीं।

काश

“विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष” कभी – कभी लगता है कि हमारी पृथ्वी जैसी थी, वैसी ही शुद्ध फिर से हो जाए। परन्तु इसके लिए सभी को अपने – अपने स्थान पर इसके लिए विशेष प्रयत्न करने होंगे।

जब हम न थे – जब तुम न थे,
जब धरा हरी और भरी सी थी,
कितना जल था – कितनी प्रकृति,
ऊंचे पर्वत – गहरे समुंद्र,
सारी नदियां कल – कल करतीं,
चहुं ओर थे वन – हरियाली थी,
न नगर ही थे – न डगर ही थे,
न सीमा थी – न देश ही थे,
वर्षा सिंचित करती रहती,
मिट्टी सारी सोंधी सी थी,
न गैसें थीं – न प्रदूषण,
था पवित्र वातावरण,
काश – अब भी ऐसा हो जाए,
यह मानवता संभल जाए,
लोलुपता सब मिट जाए,
यह वन संपदा बढ़ जाए,
शुद्ध पवन चहुं ओर बहे,
सब महामारियां मिट जाएं,
हर मन में निश्चय हो जाए,
हर घर में पौधे लग जाएं,
घर – घर हरियाली लहराए,
स्वर्ग सी पृथ्वी हो जाए,
सबके मन फिर से खिल जाएं।


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समय Time

समय को समझने के लिए व्यक्ति को समय में खो जाना पड़ता है…
One has to be lost itself into time to understand time….

अनंत काल से अनंत काल तक,
घण्टा समय का बज रहा है,
न जाने किस घड़ी – किस क्षण से,
चक्का इसका चल रहा है,
एक से लेकर बारह तक यह,
लगा के चक्कर घूम रहा है,
कभी न रुकता – कभी न थमता,
अद्भुत शक्ति से भरा हुआ है,
पैदा किया है इसने हर क्षण,
हर युग में मौजूद रहा है,
नहीं है गणना इसकी कोई,
कब से चक्र यह घूम रहा है,
कहीं न आता – कहीं न जाता,
पर हर कहीं यह देख रहा है,
सभी हैं निकले इसमें से ही,
सब कुछ इसी में सिमट रहा है,
समय बड़ा बलवान है – सच है,
समय पे सब कुछ घट रहा है,
झांकें इसमें ज्योतिष – गणितज्ञ,
हर विषय इसी से निकल रहा है,
जिसने जान लिया है इसको,
वही ज्ञान को प्राप्त हुआ है।


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समय Time

समय को समझने के लिए व्यक्ति को समय में खो जाना पड़ता है…
One has to be lost itself into time to understand time….

अनंत काल से अनंत काल तक,
घण्टा समय का बज रहा है,
न जाने किस घड़ी – किस क्षण से,
चक्का इसका चल रहा है,
एक से लेकर बारह तक यह,
लगा के चक्कर घूम रहा है,
कभी न रुकता – कभी न थमता,
अद्भुत शक्ति से भरा हुआ है,
पैदा किया है इसने हर क्षण,
हर युग में मौजूद रहा है,
नहीं है गणना इसकी कोई,
कब से चक्र यह घूम रहा है,
कहीं न आता – कहीं न जाता,
पर हर कहीं यह देख रहा है,
सभी हैं निकले इसमें से ही,
सब कुछ इसी में सिमट रहा है,
समय बड़ा बलवान है – सच है,
समय पे सब कुछ घट रहा है,
झांकें इसमें ज्योतिष – गणितज्ञ,
हर विषय इसी से निकल रहा है,
जिसने जान लिया है इसको,
वही ज्ञान को प्राप्त हुआ है।


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सांझ की सुबह Dawn of Dusk

सांझ को दिल थोड़ा घबराया,
पड़ा सोच – कुछ समझ न आया,
कुछ हल्का सा पीया – खाया,
कुछ पढ़ा – सुना – कुछ गुनगुनाया,
पर अनमने मन को रास न आया,
युक्ति हुई न कोई कारगर,
दिल को अपने डूबता पाया,
सब बात भुला – करके साहस,
जोर लगा के भीतर मन का,
परदा सांझ का जरा उठाया,
था घोर अंधेरा – दिखता न था,
मीलों घण्टों खुद को भटकाया,
चूर हुआ पर हार न मानी,
मद्धिम प्रकाश नजर था आया,
रात्रि कालिमा भंग हो गई,
फटी पौ – सूरज चढ़ आया,
अब जान लिया था मैने भी,
सांझ को दिल था क्यों घबराया,
बिछड़ के अपने ही प्रकाश से,
सुख और किसी में नहीं था आया,
पर उस सांझ का अंत मधुर था,
अब था मुझको समझ में आया।


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तुलना Comparison

वैसे तो मनुष्य का स्वभाव आरम्भ से ही दूसरों से अपनी तुलना करने का रहा है। वह या तो दूसरे से श्रेष्ठ बनना चाहता है या दूसरे को श्रेष्ठ बनते देखते हुए देख कर मन ही मन कुढ़ता है।
पर जो दूसरों से अपनी तुलना नहीं करता…वास्तव में वही श्रेष्ठ होता है।
From the very beginning human nature has been to compare himself with others. He either wants to be superior to the other, or seeing the other becoming superior, he become upset.
But the one who does not compare himself to others … Actually he is the best.

आजकल तो जिसको देखो,
तुलना करने बैठा है,
पास में हो कुछ या न हो,
न जाने क्यों ऐंठा है,
बोले बातें ज्ञान भरी,
भीतर कितना रीता है,
हांके गप्पें बड़ी बड़ी,
समझे खुद को नेता है,
करता अभिनय बात बात में,
जैसे कि अभिनेता है,
देख सफलता औरों की,
मन ही मन में जलता है,
मटमैला मन सना मैल से,
एकाकी में रोता है,
रख के भीतर बुरे विचार,
ऊपर तन को धोता है,
छोड़ दे ईर्ष्या,
कर मत कुंठा,
काहे विष को पीता है,
भंवर जाल में फंस के इसके,
बारम्बार जन्मता है,
कर सन्तोष उसी में प्यारे,
जितनी तेरी क्षमता है,
मान उसी में सुख
जितनी कि,
आवश्यक आवश्यकता है,
पर सुख देखन छोड़ के भाई,
कर सन्तोष जो लेता है,
देता भगवन उसी को प्यारे,
जो सम भाव से रहता है।


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अंतर् दर्शन

ईश्वर के पावन स्वरूप का सम्पूर्ण वर्णन न ही कोई पुस्तक कर सकती है और न ही कोई मनुष्य, चाहे उसने दर्शन पा भी लिए हों। और अपने भीतर उसी को उनके पवित्र दर्शन हो सकते हैं, जिसने स्वयं को ईश्वर के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया हो।

अर्धचन्द्र
संग बिन्दी मस्तक,
देख हुआ
सब जग नतमस्तक,
दमके तेज
तुम्हारा ऐसा,
नेत्र हुए
जाते हैं चकमक,
लगा रहे जो
केवल तुझमें,
नहीं दिखा है
कोई अब तक,
कोई विरला
होता जग में,
जिसके द्वार
तू देता दस्तक,
नहीं समझ पाता है
तुझको,
लगा के बुद्धि
कोई विचारक,
वर्णन करे
समूचा तेरा,
नहीं है ऐसी
कोई पुस्तक,
वर्णन तेरे
अंतर् दर्शन का,
नहीं है आता
किसी के लब तक,
कृपा करे अपनी
जिस ऊपर,
केवल वही है
पहुंचे तुझ तक,
करो कृपा हे नाथ
अब मुझ पर,
द्वार खड़ा है
तुमरा बालक,
हे दीन दयाल
अनाथ के नाथ,
तुम स्वामी
मैं तुमरा सेवक।


कृपया मेरी वेबसाईट पे विजिट करके मुझे प्रोत्साहित करें…धन्यवाद http://www.keyofallsecret.com

लौट आ ऐ बचपन

होश संभालने के बाद से लेकर जब तक हम मासूम रहते हैं…वह अवस्था कितनी अच्छी होती है…वह समय कितना मधुर होता है…जैसे जैसे समझ बढ़ती जाती है, उस मधुरता का रस भी सूखने लगता है। काश, फिर से वही निस्वार्थ मस्ती भरा बचपन फिर से लौट आए…

ऐ बचपन तू लौट के आ,
जब मिलजुल के सब रहते थे,
अपना भी था परिवार बड़ा,
फूल खुशी के खिलते थे,
न कोई किसी की भाभी थी,
न कोई किसी का देवर था,
न किसी से कोई रंजिश थी,
न किसी के मुख पे तेवर था,
न जीजा थे न साली थी,
न घरवाली मतवाली थी,
दादा दादी की पलकों की,
छांव खूब घनेरी थी,
रोज कथा कहानी सुनते,
पलकों की छांव में रहते थे,
खुशी गमीं के मौकों पर,
रिश्तेदार जो आते थे,
हिस्सा बन कर हम सबका,
परिवार में ही घुल जाते थे,
पापा की आंखों के डर से,
अनुशासन में सब रहते थे,
मम्मी की लाड लडैया में,
छोटे सपने सच होते थे,
भईया दीदी की पकड़ के उंगली,
मेले में घूम के आते थे,
लड़ते भी थे भिड़ते भी थे,
पर अंत में भूल सब जाते थे,
हर शाम मोहल्ले के बच्चों संग,
खूब मस्तियां करते थे,
हर खेल को खेला करते थे,
कपड़े मिट्टी में सनते थे,
न ट्यूशन थी न लेक्चर था,
न ऑनलाइन का चक्कर था,
गाढ़ी लस्सी संग मक्खन था,
शुद्ध घी और शक्कर था,
बहुत याद आती है तेरी,
असली जीवन तो तुझमें था,
ऐ बचपन फिर लौट के आ,
यौवन से तू बढ़कर था।


सांसें Breath

हम पर बड़ी मेहरबानी है कि हमें सांसों का तोहफा मिला हुआ है। इससे पहले कि यह खत्म हो जाएं, हम ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करें और सभी के लिए अपने दिल में मोहब्बत और हमदर्दी रखें।
Almighty God has given all of us precious gift in the form of breaths. We should all thank God and should keep compassion in our hearts for all beings.

वक्त का लम्हा कुछ ऐसे ही,
आगे से गुजर जाता है,
और मैं बेबस खड़ा,
बस देखता रह जाता हूँ,
जिंदगी से सांसें कुछ,
और निकल जातीं हैं,
मैं यूं ही ठगा सा,
खड़ा रह जाता हूँ,
उलटता पलटता हूँ,
ख्यालों को अपने,
अंजाने ही,
ढेरी सी लगाता चला चला जाता हूँ,
इक ख्याल को नापता हूँ,
तौलता हूँ इक को,
खुद ही उसमें उलझ पुलझ जाता हूँ,
इक ढेरी तो सिमटती नहीं,
दूजी में फिर से खो जाता हूँ,
अपनी अक्ल के घोड़ों से,
दौड़ खूब लगवाता हूँ,
जान के भी अंजान ही रहता,
समझ नहीं कुछ पाता हूँ,
जितनी बार हैं गिरतीं पलकें,
मौत को गले लगाता हूँ,
ताज्जुब होता है तब मुझको,
जब खुद को फिर से जिंदा पाता हूँ,
मोहब्बत तुम्हें भी है मुझसे,
यही कयास लगाता हूँ,
तभी तो इक के जाते ही,
दूजी सांस ले पाता हूँ।


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सत्य का दीप Lamp of Truth

यदि हमें अपने समस्त प्रारब्ध की स्मृति हो जाए तो हो सकता है कि हम लज्जा से स्वयं से ही दृष्टि न मिला पाएं। तो क्यों न हम इस बार स्वंय में सुधार लाकर अपना स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित करें।
If we get power to memorise our all previous lives, may be we become shy for our misdeed.
So why don’t we ensure our golden future by improving ourselves in this present life.

दृष्टि दर्पण से मिलाकर,
देख ले अंतर पतित,
जन्मों जन्मों का किया,
जो हो गया है विस्मृत,
स्मृत जो हो जाएगा तो,
हो जाएगा फिर लज्जित,
कर ले तौबा दुष्कर्मों से,
दिल से कर ले प्रायश्चित,
छोड़ दे लालच,
और कितना करेगा एकत्रित,
कर ले अध्ययन गहन,
विचार कर ले संकुचित,
अब न कर अपना पराया,
स्वयं में हो प्रतिष्ठित,
कर के खेती प्रेम की,
सच को कर ले अंकुरित,
तोड़ बेड़ी सीमाओं की,
कर स्वयं को असीमित,
मांज धूमिल अंतःकरण,
और कर ले उज्जवलित,
जला के दीप सत्य का,
कर ह्रदय में प्रज्ज्वलित।


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