“तरंग” Positive Waves

निराशा हमें अवसाद के पाताल में खींच कर ले जाती है…जिससे आने वाले समय में हम कहीं के नहीं रह पाते। समय रहते ही सुचेत हो के नई ऊर्जा के साथ फिर से जुट जाने से सफलता की तरंगें स्वयंमेव ही उठने लगतीं हैं।

मन दबा दबा कुचला सहमा,
डरा डरा सा क्यों है,
अलसाया मुरझाया,
सकुचाया सा क्यों है,
लुका छिपा सा यूं,
गिरा पड़ा क्यों है,
क्या है टीस दिल में,
जुबां दबी क्यों है,
पलकें हुईं हैं बोझिल,
सूखे होंठ क्यों हैं,
माथे पे हैं लकीरें,
ग्रीवा झुकी क्यों है,
तूं इतने दिनों से पीछे,
सहमा सा खड़ा क्यों है,
न कर स्वीकार हार को,
हार अभी तो हुई नहीं है,
देख खुशी से भीतर अपने,
अभी तो सुबह हुई नई है,
न छोड़ दामन आशाओं का,
अभी तो आशा जगी नई है,
छोड़ दे आहें खोल ले बाहें,
अभी तो किरणें खिली नई हैं,
छेड़ दी वीणा मन के भीतर,
अभी तरंगे उठी नई हैं।


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“समाया” Inside

कितने आश्चर्य की बात है कि ईश्वर रोम रोम में समाया हुआ है और रोम रोम ईश्वर में…जो बुद्धि से परे तो है किंतु प्रेम के वश में है।

तेरे भीतर जग समाया,
तू सबके भीतर समाया,
इन नैनों से दिखता जो भी,
वह सब है तेरी ही छाया,
सबकी अपनी सीमा रेखा,
सबकी अपनी अपनी काया,
एक असीमित तो तू ही है,
सब कोई तेरा ही साया,
अणु घूमे परमाणु घूमे,
घूमे ग्रह नक्षत्र बिन पहिया,
करें परिक्रमा तेरी ही सब,
खूब निराली तेरी माया,
स्थिर है तो एक तू ही है,
कहीं न आया कहीं न जाया,
यह कहे मेरा वह कहे मेरा,
सबको अपना ही सुख भाया,
सबके भीतर एक तू ही है,
कौन है अपना कौन पराया,
सब कोई ढूंढे तुझको ही,
यहां न पाया वहां न पाया,
जिसने प्रेम किया खुद मिटकर,
उसी के भीतर तू प्रगटाया।


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लालच Greed

जो है…उसके महत्त्व का भान नहीं है…जो नहीं है…उसे पाने की भरपूर चाहत है। इसी और पाने की ललक जब लालच का रूप ले लेती है तो पतन भी कर देती है। इसीलिए अधिक लालच करके फंसने से बचना चाहिए।

चना भले ही सूखा था,
दुबला पतला बूढ़ा सा था,
झुर्रियों से था भरा हुआ,
छोटा पिचका नन्हा सा था,
पर फुर्ती में अव्वल था,
छिटक के दौड़ लगाता था,
ठोस था तन से और बदन से,
जोर बड़ा आवाज में था
पर कुछ पाने की चाहत थी,
इसीलिए वह खुश न था,
प्यास सताती थी सुख की,
जनम जनम का प्यासा था,
इक दिन खा के तरस किसी ने,
दिया उसे पानी में डाल,
पानी के बर्तन में डल के,
चने का मन था हुआ निहाल,
फूल फाल के हो गया कुप्पा,
गालें हो गईं लालमलाल,
इतना पानी मिलने पर भी,
प्यास नहीं बुझ पाती थी,
अतृप्त रहा था सुबहो तक,
तृप्ति कहां हो पाती थी,
और अधिक लालच में आ के,
हुआ चने का बुरा ही हाल,
रखा किसी ने आग पे बर्तन,
दिए मसाले ऊपर डाल
उबल आग पर बड़ी जोर से,
किया स्वयं से एक सवाल,
क्यों थोड़े पानी से ही,
काम नहीं चल पाया था,
रात रात भर सोख के पानी,
और क्यों मन ललचाया था,
न पड़ता इतना लालच में,
न पड़ता मुझपे यह जाल,
संग सदा मैं रहता सबके,
कभी न आता मेरा काल,
ओ बंधू ओ मित्र सुनो सब,
बुरा है लालच का जंजाल,
छोड़ो इसको सुख से जीओ,
भीतर बाहर रहो निहाल।


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कालिमा से लालिमा की ओर From dark to light

वक्त को करवट बदलते पल भर भी नहीं लगता। चहकते जीवन पे कब उदासी छा जाए…महकती खुशबू कब फीकी पड़ जाए…किसी को पता नहीं।
इन असीम दुःखों की भट्ठी से तपकर जो बाहर निकल आता है, नियति उसके लिए नए आयाम प्रस्तुत कर देती है…नई राहें उसके स्वागत में विकल्पों के ताजे फूल बिछा देती है।
Time changes in a moment. When does sadness prevail in life…when life become dark…nobody knows.
One who struggle with darkness of life, destiny present new dimensions for him to grow again.

गाड़ी धीरे धीरे पटरियों पर रगड़ खाकर चायं चूं की आवाजें निकालती हुई हिचकोले लेती चली जा रही थी। एक तो पैसेंजर ट्रेन और ऊपर से इतनी भीषण भीड़। वह तो शुक्र था कि नवरात्रि के दिनों में मौसम थोड़ा बदलने लगता है।

यात्रा लंबी थी। वह सभ्य से दिखने वाले बाबूजी सुबह करीब ग्यारह बजे से ही खिड़की के बगल में लकड़ी के फट्टों वाली सीट पर बड़ी मुश्किल से बैठे हुए थे। कमर तो अकड़ ही रही थी…पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी। भीड़ के कारण गर्मी से और भी बुरा हाल था।

हरे भरे खेतों में चलती मंद बयार कभी कभार खिड़की के रास्ते हल्के से मुंह पर टकराकर मानो चिढ़ाती और तड़पा कर चली जाती थी।

दोपहर तीन बजे तक बड़ी भूख लगती रही थी। वह तो भला हो कुछ लोगों का, जो देवदूत बनकर खिड़की से रोटियों के ऊपर सब्जी और अचार रखकर पकड़ा गए थे और गाड़ी छूटते छूटते पानी का पाउच भी गोदी में डाल गए थे…कितना स्वादिष्ट लंगर था।

डूबता सूरज सामने ही था और गाड़ी बड़ी देर तक किसी छोटे से हॉल्ट पर खड़ी रही थी। उनकी खिड़की के अधटूटे पल्ले से सीधी धूप चेहरे पर पड़ कर आंखों को चौंधिया रही थी। अब तो सब्र का बांध टूट रहा था…कब रात हो और कब यात्रा थोड़ी सुखमय हो।

जितने भी स्टेशनों पर गाड़ी रुकती थी, भीड़ घटने की बजाए बढ़ती जाती थी, मानो आज ही सबको अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचना जरूरी था।

वक्त भी कैसी करवट लेता है। जिस इंसान के पास रेलगाड़ी खरीदने की हैसियत हो, वह आज उसी पैसेंजर ट्रेन में धक्के खाने को मजबूर था।

कितना खुशनसीब समझते थे वह अपने आप को। भरा पूरा परिवार, विदेशों तक फैला कारोबार, भली सी पत्नी, दो शादीशुदा बेटे और अब तो दादा भी बन गए थे।

बेटे बहुओं ने कितनी जिद्द करके विदेश यात्रा पर छुट्टियां मनाने भेज दिया था। फाईव स्टार क्रूज पर लग्जरी सुईट में पत्नी के साथ कितना सुहाना समय बीत रहा था।

एक बड़े धमाके के साथ क्रूज तेज झटके के साथ रुका था…शायद किसी बड़ी चट्टान से टकरा गया था। डेक की रेलिंग से विशाल समुंद्र में खूबसूरत सूर्यास्त को निहारती पत्नी अपने आप को संभाल नहीं पाई थीं…उनके हाथों से पत्नी का हाथ छूट गया था और वह अचानक से समुंद्र में जा समाई थीं।

पता नहीं क्या बात थी कि न ही किसी बच्चे ने फोन उठाया था और न ही किसी स्टाफ ने। दुख और निराशा के साथ यात्रा छोड़कर वापिस आने पर गार्ड ने क्षमा मांगते हुए घर के अंदर जाने नहीं दिया था। उनके भोलेपन का फायदा उठाकर बेटों बहुओं ने गहरा षडयंत्र रचकर उन्हें दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका था।

मन संसार से इस कदर उचाट हो गया था कि इतना पैसा और नाम कमाना भी उन्हें मूर्खता लगी थी।

वह किसी और पर बोझ नहीं बनना चाहते थे। इसीलिए किसी तरह से यह आघात सहकर गुरुद्वारा साहिब की शरण में पहुंच गए थे।

करना भी क्या था…गुरुद्वारा साहिब में सेवा करते रहो…चौबीसों घंटे लंगर…खाने पीने की कोई कमी नही। दवाखाना में दवाईयां और हफ्तावार डॉक्टर मिल जाते थे। सराय में एक छोटा सा कमरा भी मिल गया था।

कितने ही लोगों ने मदद करने की पेशकश की थी।
“बच्चे आपसे कुछ छीन नहीं सकते। कानून आपको आपका सब कुछ वापिस दिलवा देगा। हमारे वकील साहब आप जैसे भले इंसान का केस फ्री में लड़ने को तैयार हैं।”
पर अगर अब सब कुछ वापिस मिल भी जाता तो परिवार की बगिया जो पतझड़ बनकर मुरझा चुकी होती, उसमें एक अकेला खड़ा हरा पेड़ बनकर भी मन कहां लगना था।

मन बहुत ही व्यग्र रहने लगा था इसीलिए अब वह अपने शहर में नहीं रहना चाहते थे और कहीं दूर चले जाना चाहते थे, जहां उन्हें कोई जानता ही न हो। अब उस शहर में रहने का फायदा ही क्या था जहां अपने पराये बन चुके थे। उनसे तो अच्छे पराये ही थे जो आज भी साथ निभाने को तैयार खड़े थे।

किसी भलेमानस ने जाते देखकर रोकने की बहुत कोशिश की थी और हारकर जबरदस्ती उनकी जेब में टिकट भर के पैसे डाल दिए थे।

रात होते होते मौसम सुहावना हो गया था। अब भीड़ भी बुरी नहीं लग रही थी।
हवा के झोंकों ने मानो मां बनकर बड़े ही प्यार से थपकी देकर न जाने कब सुला दिया था।

इतनी गहरी नींद तो बचपन में ही आती थी, जब छोटे से कस्बे में किराए के मकान में तंगहाली में रहा करते थे। बिजली अक्सर गुल रहती थी। सब छत पर ही सोते थे। बस बरसात के दिनों में नीचे बिना बिजली के उमस भरे घर में सोना पड़ता था, लेकिन मां की थपकी लगते ही निंदिया रानी अपनी गोद में ले लेती थी।

आज करीब साठ सालों बाद जब सारी इकट्ठा की हुई दौलत, शोहरत, परिवार सब एक ही झटके में छूट गया, तब ऐसा लगता था जैसे मां ने ही हवा का रूप लेकर अनकहे ही कानों में कह दिया हो… “मेरे लाल, सोच मत, सो जा।”
ट्रेन रात में रफ्तार पकड़ चुकी थी…मां रात भर जागकर उन्हें सुलाती रही थीं।

खटाक की आवाज और एक हल्के से झटके से उनकी आंखें खुल गईं। शायद कोई बड़ा स्टेशन आने वाला था और गाड़ी ने पटरी बदली थी।

सामने सूरज बादलों की ओट से झांककर अपनी लालिमा से उनके चेहरे को चमका रहा था।

इतनी गहरी नींद लेने के बाद उन्होंने स्वयं को इतना तरो ताजा कभी महसूस ही नहीं किया था।

शायद नवरात्रि की पहली रात उनके जीवन की नई शुरुआत बनकर आई थी और रातभर हवा के झोंकों के रूप में मां ने अपनी गोद मे लेकर जीवन भर की सारी थकान मिटा दी थी।

गाड़ी पटरी बदल रही थी, बादल भी छंट रहे थे और सूर्य अपनी पूरी आभा से मानो उनको नहला रहा था। उनकी बोझिल आंखों की थकान जा चुकी थी और उत्साह से भरी मुस्कान चेहरे पर आ चुकी थी।

अब उनका जीवन भी नई पटरी पर तेजी से प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। उनके जीवन में कोई बन्धन नहीं था…था
तो मां का आशीर्वाद जो रात में मिल चुका था।

उनका सब कुछ पीछे छूट रहा था, पर अनुभव और ज्ञान नहीं। वह उनके साथ था, जिसे हार मान चुके लोगों में बांटना था और उन्हें संसार में धन कमाने से अधिक संस्कार कमाना सिखाना था।

अतीत की कालिमा को छोड़ जीवन भविष्य की लालिमा की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा था।


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“ज्ञान” Knowledge

ज्ञान की अधिकता हो जाने पर ज्ञानी अपना ज्ञान बघारना शुरू कर देता है और वाहवाही मिलने पर अहंकार से फूलना शुरु कर देता है। यही ज्ञान ज्ञानी का निज जीवन भी सँवार सकता है और अहंकार होने पर उसे गर्त में भी डाल सकता है।When knowledgeable person start preaching, he start becoming arogant. He can improve his life with his knowledge but he should avoid ego.

ओ ज्ञानी न ज्ञान बघार,
पहले निज अंतर पहचान,
निकले शब्द बड़े ही भारी,
अहंकार में सनी जबान,
सुने किसी की कभी नहीं,
छेड़े केवल अपनी तान,
अपने ज्ञान की गठरी भारी,
अधिक भार से निकली जान,
बड़े बोल न बोल रे भाई,
इसमें नहीं तुम्हारी शान,
अधकल गगरी छलकत जाए,
भर ले गगरी फिर कर मान,
उलझे धागे पड़ गईं गाँठें,
जब से बढ़ गया अक्षर ज्ञान,
खोल जरा उलझी गांठों को,
अपने को पहले सा जान,
समय को न पहचान सका तू,
समय बड़ा ही है बलवान,
करे शिकार ज्ञान का पहले,
तोड़े बहुतों के अभिमान,
ज्ञान अज्ञान की छील के परतें,
नए सिरे से कर स्नान,
परम ज्ञान होगा प्रकाशित,
जब हो जाएगा अंतर्ध्यान।


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चैन की बंशी Happy Life

वास्तव में भाग्य प्रारब्ध पर ही आधारित होता है, परन्तु यह ध्रुव सत्य है कि अपने सत्कर्मों और अथक प्रयासों से धूमिल भाग्य को सुनहरे भाग्य में बदला जा सकता है।
It’s true that destiny is based on our previous activities, but this is the absolute truth that our sacret and relentless efforts are capable to turn foggy destiny into golden destiny.

ज्योतिष सीखी मैने भी,
बड़े जोर और शोर से,
देखे हाथ दूसरों के,
और माथे हर ओर से,
इक दिन मुझको मिली थी छुट्टी,
आपाधापी के दौर से,
न जाने क्या सोच के,
अपनी ही हथेली देखी गौर से,
बड़ा ही आश्चर्यचकित हुआ था,
अरे यह क्या घटित हुआ था,
रेखाओं के नाम पे बस इक,
कड़े जतन की रेखा थी,
बन्द मुट्ठी के भीतर वह तो,
अब तक ही अनदेखा थी,
उस रेखा को न देखा था,
जो जीवन का लेखा थी,
लगी समझ अब मुझको भी,
कुछ न होगा रेखाओं से,
रेखाएं तो बनतीं मिटती,
मेरे अपने कर्मों से,
धर्म श्रेष्ठ है रेखाओं से,
धर्म तो है सत्कर्मों से,
करता हूं अब कठिन परिश्रम,
बजती बंशी चैन से।

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“कपट”Flam




कुछ लोग अपने मन में दूसरे के लिए सदैव मैल रखते हैं और गाहे बगाहे उसे किसी न किसी तरह से दुख पंहुचाकर बहुत खुशी महसूस करते हैं। अगर इतना ही ध्यान वह अपने ऊपर दे दें तो खुद भी सुखी रहें दूसरे भी।
some people have poor nature for others and they feel happiness in other’s grief.They too can become happy like others, If they try to improve themselves.

मन भीतर है भरी कपट,
काम बिगाड़े बन लंपट,
कान भरे – भड़के – भड़काए,
अंतर भीषण अग्नि लपट,
मक्कारी में रहे लिपट,
स्वार्थ में अंधा रहे चिपट,
आए दिन करता खटपट,
दूजे का सुख रहा झपट,
सुन ले खोल के कान के पट,
छोड़ दे यह सब उठापटक,
कर ले मन की साफ सफाई,
नहीं तो तू जाएगा निपट,
इतनी जल्दी न तू निपट,
कर तौबा अब छोड़ कपट,
कर ले कुछ दुनिया की भलाई,
बस जा सबके दिल के निकट।


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“भोर” (Dawn)

सुबह सवेरे उठ के जो ताजगी महसूस होती है, उसका एहसास दिन भर रहता है। इसके उलट देर तक सोने से तन और मन दोनों में ही कुंठा और मनहूसियत बनी रहती है। आईये, आज से ही इस भोर का आनंद लेने का प्रण करते हैं।
The freshness that one feels after waking up in the morning remains the whole day. In contrast, late waking caused frustration both in body and mind remain for long. Come, let’s vow to enjoy this dawn from today itself.

भोर की वेला कितनी प्यारी,
कलरव करतीं चिड़ियां सारी,
खिलें पुष्प महकाएं क्यारी,
मंद बयार लगे अति न्यारी,
सूर्य प्रभा नित स्वर्ण सी चमके,
मैं क्यों न हो जाऊं वारी,
सात पहर हैं एक ओर,
चतुर्थ पहर है सब पे भारी,
जो कोई वेला उठे भोर की,
जिंदगी उसी ने है संवारी,
चित्त प्रसन्न रहे दिन भर ही,
बीमारी सब जाए मारी,
चल उठ जाग,
त्याग निंद्रा को,
कर ले खुशियों से तूं यारी।


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“बड़े बोल”(Spiel)

अपनी ओर से बातें जोड़कर मूल बात का स्वरूप कितना ही बदलने का प्रयत्न क्यों न किया जाए, वह दमहीन ही रहता है और सच बात का स्वरूप सर्वथा सत्य ही बना रहता है।
No matter how much we try to change the nature of the original matter by adding things on our behalf, it remains powerless and the nature of the truth remains completely true.

कुछ पढ़ा
कुछ गढ़ा,
कुछ था सच
कुछ मढ़ा,
कुछ था जुड़ा
कुछ जड़ा,
पर था फीका
रसहीन रहा,
जो उपरंत जुड़ा
दमहीन रहा,
जो था मिथ्या
वह गया बिखर,
बिन सोचे समझे
बिन जाने,
बिन निज अनुभव के
अनजाने,
वह तेजहीन ही
बना रहा,
था जो मूल
वह बचा रहा,
और अनंत काल तक
अमर रहा।


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“कहां है’ Where’s God “यहीं है” God is here

जिस प्रकार मृग अपनी ही कस्तूरी की सुगंध से आकर्षित होकर उसे हर कहीं ढूंढता फिरता है। इसी प्रकार हम स्वयं के भीतर प्रकाशित परम प्रकाश को निज घट में न झांक कर दसों दिशाओं में खोजते रहते हैं परंतु सही मार्गदर्शक के मिलते ही स्वयंमेव ही उस दिव्य प्रकाश की अनुभूति होने लगती है…इसी पर आधारित कविता प्रश्नोत्तर के रूप में प्रस्तुत है।
Just as an antelope is fascinated by its musk scent, he searches everywhere. In the same way, we do not see the divine light within us and search everywhere but as soon as the right guide is found, we begin to feel almighty within ourselves… This verse is based on this Q&A.

“कहां है” Where’s God देखता मैं सोचता,
कहां पे है,
किधर में है,
नहीं पता तेरा पता,
बता दे राह,
जिधर भी है,
तड़प रहा बिलख रहा,
मचल रहा यह दिल मेरा,
पूछा इससे पूछा उससे,
और न जाने किससे किससे,
उसी का तूं दे दे पता,
जिसे तेरा पता भी है।

“यहीं है” God is here
इधर भी है,
उधर भी है,
देखो जिधर,
वहीं पे है,
जमीं पे है,
जहां में है,
यहां भी है,
वहां भी है,
जब जिधर नजर पड़े,
वहीं पे है,
वहां पे है,
श्वांसों में है,
धड़कन में है,
इस पल में है,
इस क्षण में है,
रुक देख तनिक
स्वयं को ही,
वह तो तेरे
ह्रदय में है।


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“चले चलो”(Keep Going)

जब हमें मनोवांछित सफलता नहीं मिल पाती तो हम निराश होने लगते हैं और लोग भी कुछ न कुछ ताने मारते रहते हैं। यदि हम उन सभी नकारात्मक बातों को छोड़ कर नए जोश और उत्साह से बार बार प्रयत्न करते रहते हैं तो प्रसन्न रहने के साथ साथ, सफलता भी हमारे कदम चूमती है।
When we don’t get the desired success, we start getting frustrated and people also start taunting. If we leave all those negative things and try again and again with renewed vigor and enthusiasm then along with being happy, we achieve success too.

दबा दबा क्यों रहता है,
बोझ दिल पे सहता है,
दूसरों की बातों को,
साथ ले के चलता है,
इन झुकी सी नजरों से,
इन बोझिल कदमों से,
काम न चल पाएगा,
इन बुझे से जज्बों से,
उठ जाग – न भाग,
न छोड़ कठिन रास्तों को,
झाड़ दे लोगों की,
उन अनर्गल बातों को,
छोड़ दे फिकर विकर,
और चलाचल होश से,
संघर्ष कर स्वयं से ही,
और भर लबालब जोश से,
मिलेगी मुक्ति तुझे,
दमन के इस चक्र से,
छोड़ दे आसान राह,
और चलाचल फख्र से।


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“छोड़ दो”(Leave it)

क्रोध से दूसरे का कम, अपना अधिक नुकसान होता है। शरीर और मन पर दुष्प्रभाव तो पड़ता ही है, कभी कभी इस कारण धन की हानि भी सहनी पड़ती है। इसके आते ही इसकी विदाई करना ही जिंदगी को खुशहाल बनाता है।
Anger destroy ourselves more in comparison to others. This is not only bad for body and mind, sometimes it also causes loss of money. It’s farewell as soon as it arrives makes life happy.

क्यों खफा हो,
क्यों दुखी हो,
किससे है नाराजगी,
है चार दिन की चांदनी,
फिर कहां है जिंदगी,
गई है तन क्यों भृकुटी,
अकड़ है ज्यों हो लकड़ी,
भड़क के ज्वाला क्रोध की,
भस्म करती जाएगी,
तन मन और धन को भी,
राख में मिलाएगी,
वक्त जो कुछ भी मिले,
थोड़ी सी कर लो बंदगी
छोड़ दो यह गुस्सा वुस्सा,
आ जायेगी ताजगी,
मुस्कुरा लो खिलखिला लो,
यही तो है जादूगरी,
जिंदादिली से जो जियो,
खुशहाल होगी जिंदगी।


“एक” (One)

सबके ह्रदय रूपी मन्दिर में प्रकाशवान एक ही परमात्मा है। नाम चाहे जो रख लें, रूप चाहे जो देख लें, पर वह अनंत एक ही है।
There is only one God illuminated in everyone’s heart temple. Whatever you name, whatever you see but that infinite is only one.

एक ही तो
सत्य है,
एक ही तो
मुक्त है,
एक ही तो
व्याप्त है,
एक ही तो
व्यक्त है,
एक ही
धरा पे है,
आकाश में भी
एक है,
एक ही
ब्रह्माण्ड में है,
और परे भी
एक है,
एक ही से
दो बना है,
दो से ही
अनेक है,
अनेक ही
फैलाव सारा,
अंत में फिर
एक है,
एक ही
आधार है,
एक ही आनंद है,
एक ही में
सुख है सारा,
एक ही
परमानंद है।


“बढ़े चलो”(Go ahead)

न हार मानो, न ही रुको, न ही थको, चलो, आगे बढ़ो…लक्ष्य प्रप्ति निश्चित है।
Don’t give up, don’t stop, don’t be tired…Come on, go ahead … the goal is certain.

न रुको
तुम डटो,
प्रताप सूर्य
का बनो,
न थको
निसदिन चलो,
कण कण का तुम
उत्साह बनो,
ले सच का
ओट आसरा,
सच की दिशा
में ही बढ़ो,
ध्वजा को थाम
धर्म की,
काल अधर्म
का बनो,
नव ज्योति
कर प्रज्ज्वलित,
नवयुग का तुम
सृजन करो। – जसविंदर सिंह


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“विद्याधन” (Knowledge is money)

यह सच है कि धन से समस्त संसार चल रहा है, पर यह उससे भी बड़ा सत्य है कि विद्या से जो ज्ञान उपजता है वह कभी नाश नहीं होता। विद्याधन के साथ धन तो धन, यश भी खिंचा चला आता है।
It is true that the whole world is running with money. But it is even more true that the knowledge is never destroyed. With knowledge, wealth also comes with and fame.

नीरज और सरल यूं तो सगे भाई थे पर सामर्थ्य के हिसाब से बड़ा अंतर था दोनों में।

नीरज जहां एक बहुत बड़ा व्यवसायी था और अकूत सम्पत्तियाँ अर्जित करता हुआ धीरे – धीरे शहर की सबसे बड़ी आसामी बनता जा रहा था, वहीं सरल प्राइवेट नौकरी करता था और उसे अपने कम वेतन में ही महीने भर गुजारा करना पड़ता था। एक तो किराये का घर और ऊपर से गृहस्थी का बोझ….

कैसी विडम्बना थी…एक ही शहर में रहते हुए दोनों परिवार कभी – कभार सुख – दुख में ही मिल पाते थे। कभी नीरज भईया के यहाँ बड़े फंक्शन का न्यौता मिलने पर सरल का जीवन कठिन हो उठता।

यहां तो कम खर्च में भी काम चल जाता था पर नीरज भईया के यहां तो शहर की नामी गिरामी हस्तियों समेत बड़े – बड़े नेतागण भी आमंत्रित होते थे…इसीलिए उनके सारे फंक्शन शहर के सबसे बड़े होटलों और रिसॉर्ट्स में हुआ करते…लोक लाज के चलते एक दो माह का वेतन दिखावे की भेंट चढ़ जाता और साल भर का बजट गड़बड़ हो जाता।

कितने सुखी दिन थे बचपन के, जब दोनों में इतना प्यार था कि एक दूसरे के लिए जान छिड़कते…झगड़ते भी तो पल में हो एक हो जाते, तीन सालों का ही तो अंतर था दोनों में।

पापा अकेले पड़ जाते इसलिए उन्होंने नीरज को आठवीं से ही अपने साथ शोरूम ले जाना शुरू कर दिया था। पैसे कमाने का गुर नीरज में शुरू से ही था और जिम्मेदारी से बिजनेस सम्भालते उसकी पढ़ाई मुश्किल से बारहवीं तक ही हो पाई थी। उधर मां का लाडला सरल अपनी पढ़ाई लिखाई में ही व्यस्त रहता था।

कितना काला पन्ना था उन दोनों के जीवन के अध्याय का वह…जब उनके पापा रोज की तरह बैंक में रुपया जमां करने जा रहे थे और बदमाशों ने दिन दहाड़े गोली मारकर लूटपाट कर ली थी।
सीधी सादी मां यह सदमा सह न पाईं थीं और बीमार होकर जल्द ही पापा के पास चली गईं थीं।

उन दोनों का जीवन सुचारू रूप से चले, इसलिए रिश्तेदारों ने आनन फानन में ही नीरज की ग्रहस्थी बसवा दी थी और जो कम आयु में ही बड़ी भी हो गई थी।
भाभी जिन्हें सरल मां का दर्जा देता था, बोलतीं तो मीठा थीं पर उन्होंने पता नहीं क्या किया था कि भईया ने एक दिन साफ कह दिया था…

देखो सरल, अब हमसे और न हो पाएगा…तुम्हारे भतीजे को भी पालना है और हमारे खर्चे भी बहुत अधिक हैं… तुम्हारे लिए इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारा ब्याह करा देता हूँ और कुछ पैसे भी दे दूंगा और फिर जहाँ चाहे खुशी से रह लो।

कितनी आसानी से एक ही साँस में कह गए थे भईया। सरल स्वभाव का मां का लाडला कुछ कह ही न पाया था…बेचारे का मुंह सूखे बेर की तरह सूख गया था और जबान तालू में चिपक कर रह गई थी…नाखूनों से उंगलियों की पोरों को कुरेदता नजरें नीची किए किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया था वह…

एक तो नया नया ब्याह और ऊपर से किराए का घर…भईया ने तीन महीनों का किराया तो दे दिया था…आगे की चिंता थी। पत्नी को चाहकर भी सुख नहीं दे पा रहा था वह। विवाह के बाद घूमने का सपना पहला साल बीतते बीतते धूमिल होने लगा था।

सरल की पत्नी संयुक्ता बड़ी अच्छी लड़की थी। पढ़ी लिखी, समझदार और मितव्ययी। अपने साथ अपना लैपटॉप और प्रिंटर वगैरह भी ले आई थी जिसपे वह कम्प्यूटर ग्राफिक्स सीखा करती थी।

सरल को शुरु से ही लेखन का बहुत शौक था। साहित्य में उसकी बड़ी पकड़ थी। अक्सर रात में मौका मिलने पर एकाध कविता कहानी लिख देता और संयुक्ता को सुनाकर ही खुश हो जाता।

आज सरल को बहुत बड़ा सरप्राइज मिला था। संयुक्ता ने उसके लेखन को कम्प्यूटर में लिखकर प्रिंट कर लिया था और आज उसके प्रयासों के कारण एक बहुत बड़े पब्लिशर ने सरल की पुस्तक को प्रिंट करना स्वीकार कर लिया था। उसको तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका साहित्य अब मूर्त रूप लेने जा रहा है।

आज नीरज भईया आगे की पंक्ति में गणमान्य व्यक्तियों के साथ बैठे माननीय राज्यपाल जी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

समूचा ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। गेंदे के ताजे फूल मद्धिम रोशनी और कर्णप्रिय संगीत के साथ सुगंध बिखेर रहे थे।

आज राज्य भर के साहित्यकारों, कवियों और लेखकों में से चुने गए सरल को लेखन सर्वोच्च सम्मान दिया जाना था।
नीरज भईया चहक चहक कर सबको बता रहे थे…अरे सरल मेरा सगा छोटा भाई है।

आज इतना सम्मान मिलने के बाद सरल के ‘धन्यवाद के दो शब्द’ बोलने पर समूचा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था…पत्नी की प्रशंसा करते हुए कितना भावुक हो उठा था वह।

आज सच्चे अर्थों में विद्या का पलड़ा फिर से धन के पलड़े से भारी हो गया था और उसी विद्या से संयुक्ता ने सरल को संयुक्त कर दिया था।


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“कर्म” (Act)

निराश होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना आत्महत्या के समान है। पूरे उत्साह से काम में लग जाने से सफलता मिलना अवश्यम्भावी है।
Getting frustrated and leaving work is like suicide. It is inevitable to get success by working hard with full enthusiasm.

धरो धीर
मत हो अधीर,
रहो शांत
मिट जाए पीर,
करो कर्म
न करो शर्म,
सच पे डटो
है यही धर्म,
रहो शान्त
न करो क्रोध,
रहो प्रसन्न
मिटें अवरोध,
सोचो कम
तोड़ो सब भ्रम,
छोड़ो आलस्य
और करो श्रम,
होगी पूरी
तब तेरी आस,
जब दृढ़ होगा
मन में विश्वास।
– जसविंदर सिंह


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“सत्य” (Truth)

प्रार्थना

सत्य की परिभाषा हो तुम,
सदा सर्वदा ही सत्य हो तुम,
न तेरा आरम्भ होता,
और न ही होता है अंत,
सब कुछ तुम्हीं से है खिला,
सब कुछ तुम्हीं में है मिला,
सर्वत्र समाया है तुम्हीं में,
सर्वत्र में समाए हो तुम,
हर क्षण में जागृत हो तुम्हीं तुम,
कण कण में आच्छादित हो तुम,
चाशनी में झूठ की,
लिपटा हुआ है हर कोई,
सत्य का अनुभव करा दो,
सत्य हमें भी कर दो तुम।


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“विश्वास” (Belief)

चिकित्सा पद्धतियां चाहे जो भी हों, सबका अपना-अपना महत्त्व है। देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप जो उपलब्ध हों, वह अच्छी हैं। पर आयुर्वेद से तो हमारा अटूट संबंध पैदा होने से लेकर मृत्यु तक है, जैसे भोजन में प्रयोग होने वाले सभी मसालों का अपना-अपना बहुमूल्य स्वाद भी होता है और औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। इसी आयुर्वेद पर आधारित एक छोटी सी कहानी का आनंद लीजिए।
Every branch of medical pathy has an important role in itself. Those available according to place, time, situation are good. But our unbreakable relationship with Ayurveda is from birth to death, just like all the spices used in food, have their own precious taste and are also rich in medicinal properties. Enjoy a short story based on the Ayurveda.

हिमाचल के वह सुदूर का वह कस्बा मनोरम दृश्यों से सुशोभित था। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, चीड़ के बड़े-बड़े पेड़ तारपीन का तेल और गन्धविरोजा गोंद जैसी अमूल्य सौगातों को अपने भीतर सहेजे हुए जरा सी हवा चलने भी पर झूम उठते थे।

कभी तो वहाँ हरियाली ही हरियाली रही होगी, यह तो धीरे-धीरे घाटियों को साफ करके लोग बसते चले गए थे और अब तो यह भी न मालूम था कि सबसे पहले कौन आया था।

निशानी थी अगर कोई सबसे पुरानी तो वह थे अपने वैद्य रामदयाल जी। चट्टान काटकर बनाई गई तीन-चार बड़ी-बड़ी सीढ़ियां चढ़ कर सामने ही तो उनका हरियाली से भरा हुआ घर नजर आता था। न जाने क्या-क्या जड़ी-बूटियां लगा रखीं थीं उन्होंने। दिन भर कुछ न कुछ सुखाया पीसा करते थे।

गुलेरिया जी की पोस्टिंग संयोग से उस छोटे से कस्बे में हो गई थी। बड़े विद्वान थे वह। शहर के प्रबुद्ध वर्ग में गिने जाते थे। बड़े-बड़े डॉक्टरों से दोस्ती होने के कारण दवाओं का भी अच्छा खासा ज्ञान हो गया था।

कहाँ बड़े-बड़े शहरों में रहे और कहाँ वह छोटा सा कस्बा। सुविधाएं कम ही थीं वहां पर। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर एक छोटा सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था। डाक्टर कमोवेश ही मिलते थे…फार्मासिस्ट ही डॉक्टर थे।

खाने-पीने के शौकीन होने के कारण गुलेरिया जी का पेट अक्सर गड़बड़ ही रहता था। चूँकि जानकारी इतनी अधिक थी कि स्वयंमेव ही मेडिकल स्टोर से दवाएं ले लेते थे।

कितनी तेज झिड़का था उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारी को, जिसने उन्हें एक बार रामलाल जी से सलाह लेने की बात कर दी थी। एलोपैथी पे गर्व ही इतना था कि उनके सामने किसी और पैथी की बात आते ही बिफर जाते।

रात में पार्टी बड़ी जोर-शोर से चल रही थी। ऊपर पहाड़ी पर जाती सड़क के साथ लगती उनके सहकर्मी के घर की छत मीठे-मीठे पहाड़ी गानों से गूंज रही थी। लाईट्स आसपास के नजारों को और भी खूबसूरत बना रहीं थीं।

एक तो देर से पकती हुई पहाड़ी कढ़ी, दाल मखानी और ऊपर से मुरमुरी तंदूरी रोटियां। मंद बयार खाने की खुशबू को बढ़ा रही थी। साहब के लिए विशेष खान-पान का इंतजाम भी था, जिसका इतने दिनों बाद जम के मजा लिया था उन्होंने।

बड़े साहब अभी तक नहीं आए…जा के देखो तो उनके क्वार्टर में…सब ठीक तो है न…रात देर बहुत हो गई थी।


साहब, बड़े साहब तो पेट दर्द और सर दर्द से कराह रहे हैं, जल्दी चलिए…


हम शहर कैसे जा सकते हैं…सुबह हुई लैंड स्लाइड से सड़क तो बंद हो गई है…

मैं जितना ट्रीटमेंट कर सकता था, कर दिया…अब यह केस मेरे बस का नहीं… मेरी सलाह मानिए तो एक बार वैद्य जी के पास ले जाइए…फार्मासिस्ट ने सलाह दी।

रामदयाल जी तो थे ही दयालुता की प्रतिमूर्ति। बड़े जतन से दवाईयां तैयार कर कुछ बूंदें नाक में डालीं, कुछ मुंह में और न जाने क्या लेप सा लगाया था पेट पर।

शाम होते-होते गुलेरिया जी की कराहटें बन्द हो गईं। पेट की अकड़न और सरदर्द तो मानो छूमंतर ही हो गया था।

होश आते ही गुलेरिया जी ने पूछा, मैं किस नर्सिंग होम में हूँ…मैं उन डॉक्टरों को धन्यवाद कहना चाहता हूँ जिन्होंने मेरी जान बचा ली…

वैद्य रामलाल जी ने मुस्कुराते हुए उन्हें कम बोलने का इशारा किया और थोड़ा सा बाहर टहल के आने की सलाह दी।

गुलेरिया जी का दिल तो मानने को तैयार ही न था कि किसी और पैथी में भी इतनी सामर्थ्य हो सकती है कि इंसान की जान बच जाए।


पर कुछ तो ऐसा चुम्बकीय आकर्षण था वैद्य जी के शब्दों में कि न चाहते हुए भी उनको वैद्य जी का सानिध्य भाने लगा था और धीरे-धीरे यह समझ आना शुरू हो गया था कि कब क्या खाएं, क्या न खाएं और कितनी मात्रा में खाएं।

अब एलोपैथी के साथ-साथ वह आयुर्वेद के महत्व को भी जान चुके थे और वैद्य रामलाल जी ही अब उनके लिए सबसे बड़े डॉक्टर थे।


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”पछतावा” (Repentance)

अपना देश अपना ही होता है। रोटी चाहे चुपड़ी हो या सूखी, ताजी हो या बासी, अपने देश की ही अच्छी। विदेशों में सब कुछ मिल सकता है पर अपने देश की धरती की गोद नहीं। संकट काल में विदेशों में रहते हुए अंत समय में पछताने के सिवा कुछ नहीं बचता।

कौशल कंवल जब से चीन आए थे, मजे ही मजे थे।

कितना परेशान होते थे वह अपने देश में। कहने को तो मातृभूमि थी पर जब से फैक्ट्री संभाली थी, परेशान ही रहते थे।

होते भी क्यों न, उनके सारे के सारे दोस्त विदेशों में ही तो सैटल हो गए थे। लगभग सभी सफल व्यवसाई थे। वहां की इतनी तारीफें करते रहते कि अपने देश में हर ओर गंदगी और हर चीज में कमियां ही कमियां नजर आने लग गईं थीं।

कहां उच्च कोटि के शहर और कहां अपने देश के। गंदगी केवल शहरों में ही होती तो शायद सह लेते। पर अब तो हर जगह में ही कमी दिखती थी। फिर चाहे वह सरकारी विभाग हों या फिर आम जनमानस।

फिर कितनी ही जिद्द करने के बाद पापा ने चीन जा के लिए सैटल होने के लिए हामी भर दी थी। लेकिन इकलौते बेटे के जाने के बाद और बनी बनाई फैक्ट्री उजड़ने के बाद सदमे से उनकी मृत्यु हो गई थी।

उनकी मृत्यु के बाद कौशल जी ने अपनी मां को अपने साथ ले जाने की बड़ी जिद्द की थी, पर मां ने भारी मन से न बोल दिया था।

चीन कितना सुंदर था, वहां के लोग कितने सयाने थे। इंडस्ट्रियल एरिया में उनके पहुंचते ही उस क्षेत्र विशेष के मेयर अपनी टीम के साथ उनका स्वागत करने पहुंच गए थे। कौशल जी कितने हैरान हो गए थे जब मेयर ने उन्हें होटल में बैठे बिठाए बिना कहीं भी जूते घिसे एक ही दिन में सारे विभागों के अधिकारियों से मिलवा दिया था और दूसरे ही दिन उन्हें फैक्टरी के लिए जमीन आवंटित कर दी गई थी। सारी की सारी सुविधाएं एक साथ इतनी जल्दी, यह तो अपने देश में संभव ही न था।

कर्मचारी और लेबर कितने कर्मठी थे, केवल त्योहारौं में ही छुट्टी लेते थे और ओवरटाईम भी खूब जम के करते थे। अब तो मौज ही लग गई थी।

धीरे-धीरे पूरा परिवार ही वहां सैटल हो गया था। मां के गुजर जाने के बाद अब अपने देश में बचा ही क्या था, तो सारी जमीनें जायदादें बेचकर वहीं विलासता पूर्वक ऐश में जिंदगी व्यतीत हो रही थी।

चूंकि अब बड़े बड़े व्यवसायियों और नेताओं से पार्टियों में मिलना जुलना होता ही रहता था तो अब साग सब्जी भी फीकी लगनी शुरू हो गई थी। अब तो धीरे धीरे सी फूड से लेकर लगभग सभी तरह के पशु पक्षियों के अनोखे स्वाद जिव्हा की स्वाद ग्रंथियों में रच बस से गए थे।

जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन, जैसा पिए पानी, वैसी बोले बानी।


अपना देश तो कुछ यूं बुरा सा लगने लगा था कि सोशल मीडिया पर भी देश प्रेम की बातें सुनकर मुंह बिचका लेते और बड़े गर्व से सबसे कहते…अरे जाओ…कहां चाईना और कहां इंडिया…सपने देखो…सात जन्मों में भी भारत कभी यहां का मुकाबला नहीं कर सकता।


यह बात और थी कि उनकी फैक्ट्री का सारा माल भारत में ही खपत होता था। फिर भी वह चाईना का गुणगान करते न थकते। वहां रहकर बड़े अरबपतियों में उनकी गिनती जो होने लगी थी।


इधर सालों से कुंभकरणीं नींद में मृत्यु शैया पर पड़े भारत ने अचानक ही मानो संजीवनी बूटी चख ली थी।

सरकार बदलते ही देश ने खड़े होकर अंगड़ाई ली और खुद पर जमीं धूल को झाड़ते हुए स्वयं को फिर से व्यवस्थित किया।


बुजुर्ग होता जा रहा भारत अब फिर से युवा हो चुका था। उसकी सुंदरता की चमक पूरे ग्लोब को प्रभावित कर रही थी। इधर भारत तेजी से विकसित हो रहा था और उधर चाईना की सांसें फूल रहीं थीं।


अरे अब भी समय है, लौट आ, मेरी बात मान, वह बहुत मक्कार देश है। वहाँ के लोग बड़े धूर्त हैं, न जाने कब क्या हो जाए, यहाँ बहुत कुछ बदल चुका है। घर वापसी पर तेरी कम्पनी को सरकार पूरी मदद करेगी…मामा जी ने लाख समझाया था पर कौशल जी की आंखों में तो शंघाई की चकाचौंध भरी हुई थी।

अब तो वह किसी रिश्तेदार को भी घास नहीं डालते थे और किसी का फोन आने पर अनमनी बातें करके उसे टाल देते थे।


आज कितनी बड़ी पार्टी दी थी उन्होंने शहर के सबसे मंहगे सैवन स्टार होटल में। शंघाई के लगभग सभी बड़े व्यवसाई और बड़े बड़े नेता मंत्री भी शामिल हुए थे। इतने बड़े प्रोजेक्ट हासिल करने की खुशी जो थी।


सभी ने खाने की कितनी तारीफ की थी, पर असली मजा तो चमगादड़ के खून से बनी वाईन में ही आया था, जब उसमें आग लगाकर फूंक मारकर सिप करके मंत्री जी ने पार्टी की शुरुआत की थी तो मेहमानों की जोरदार तालियों से समूचा टैरेस गूँज उठा था।


क्या बात है…जी एम लुई शुंग अभी तक क्यों नहीं पहुँचे, क्या हो गया? सर अभी-अभी खबर आई है कि वह आईसीयू में एडमिट हैं और केवल वही नहीं शहर का कोई भी आईसीयू खाली नहीं है, सभी तेजी से भर रहे हैं।

तभी सरकारी आदेश आया कि आप सभी तुरंत फैक्ट्री खाली करिए और अपने अपने घर जाइए। हमें फैक्ट्री सील करने का आदेश मिला है।

अरे यह क्या ड्राइवर…गाड़ी कैसे चला रहे हो…अरे अरे…संभाल कर चलो बेवकूफ!
अरे सर जरा सामने तो देखिए दूर-दूर तक लोग लड़खड़ा कर गिरते दिखाई दे रहे हैं।
अरे यह भगदड़ कैसी…यार जल्दी घर पहुंचाओ।
अरे सर देखा आपने, कैसे पुलिस वालों ने चार पाँच लोगों को गोली मार दी। आखिरी हो क्या रहा है कुछ समझ में नहीं आ रहा…सुबह तक तो सब ठीक था…इतनी जल्दी यह क्या हो गया।


बाहर निकलो! जोरदार कड़क आवाज सुनते ही कौशल जी का कलेजा कांप उठा। पुलिस ने ड्राइवर का टेंपरेचर देखते ही उसे बाहर खींच कर गोली मार दी। अरे अरे यह क्या कर रहे हो, मुझे जानते नहीं मैं कौन हूं? सॉरी सर आप गाड़ी लेकर जल्दी घर जाईए और हां अपना पहचान पत्र गले में लटका लीजिए…नहीं तो आगे कोई और आपको न पहचान पाया और आपको बुखार निकला तो तुरंत गोली मार देगा।


लगभग कांपते हुए गाड़ी चलाते हुए कौशल जी तेजी से शहर के सबसे सुंदर इलाके में बने अपने विला में समां जाने को बेताब हो रहे थे।

गाड़ी थी कि चल ही नहीं रही थी, लहराई जा रही थी, मानो आज ही चलानी सीखी हो। इतने लोगों को सड़क पर बदहवास होकर गिरते और पुलिस की गोली से मरते उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।

पूरे हफ्ते शहर में सन्नाटा पसरा रहा था। दिन में तो गोली चलने की आवाज आती ही रही थी। रात को भी मिलिट्री के जूतों की आवाजें भी गोलियों की आवाज के साथ सुनाई देतीं रहीं थीं। दहशत इतनी बढ़ गई थी कि खिड़कियों से झांकने की भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी।

आखिरकार पूरा जोर लगाने पर कौशल जी के एक विश्वासपात्र मंत्री ने धीरे से फोन पर बताया था कि एक खतरनाक वायरस बनाकर हम पूरी दुनिया को विश्व युद्ध के बिना ही जीतना चाहते थे। पर दुर्भाग्य से वह यहीं फैल गया और अब तक लाखों लोगों की जानें जा चुकी हैं। गरीबों, बूढ़ों, बीमारों और लाचारों को चुन चुन कर मारा जा रहा है, ताकि और इंफेक्शन न फैले।

धीरे धीरे चाईना की सच्चाई कौशल जी के सामने आने लगी पर तब तक उनका लगभग सत्तर प्रतिशत स्टाफ खतरनाक वायरस की लपेट में आकर प्राण गवां चुका था।

फैक्ट्री बंद हुए अब लगभग तीन महीने हो चुके थे। अरबों का नुकसान हो चुका था। शुरू के दिनों में कौशल जी ने हजारों नोटों को ऊपर वाले माले से सड़कों पर यह लिख कर फेंका था कि हमें रोटी दो, दवा दो, नहीं तो हम मर जाएंगे।

कितनी बड़ी त्रासदी थी, जिस देश की तारीफ करते न थकते थे, अब वहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। न ही ठीक से खाने को मिल रहा था और न ही दवाईयां।

अभी धीरे-धीरे हालात सुधरने शुरू हुए ही थे कि वहां के प्रशासन ने साफ बोल दिया…आप लोगों ने गलवान घाटी में हमारे ऊपर अटैक करके साठ सत्तर मिलिट्री वालों को मार दिया। अब हमसे कोई उम्मीद मत रखिएगा।

यह क्या हो गया था? साठ वर्षों के जीवन काल में कभी इतना परेशान नहीं होना पड़ा था, जितना इन छह महीनों में। दिमाग चकरघिन्नी बन कर रह गया था।

अरे यह क्या! सपने में नहीं सोचा था कि तृतीय विश्व युद्ध होगा। इधर अपने देश ने और उधर अमेरिका ने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर चाईना पर अटैक कर दिया था, जिसकी त्रासदी कौशल जी को झेलनी पड़ गई थी।

सरकार ने अपना असली रंग दिखा दिया था। उनके सारे अकाउंट सीज कर दिए गए थे। फैक्ट्री और सभी जमीनें जयदादें आपातकाल के नाम पर छीन लीं गईं थीं।

अब तक चाईना का युद्ध में बड़ा भारी नुकसान हो चुका था। उधर पूरा का पूरा चाईना मृत्यु शैया पर पड़ा एड़ियां रगड़ कर अंतिम सांसे ले रहा था और इधर कौशल जी…।

कांपते हाथों से बेटे का हाथ पकड़कर धीरे से बोल रहे थे वह। कुछ शब्द तो मुंह में ही फंस कर रह गए थे। ओठों ने फुसफुसा कर अपने प्यारे भारत देश लौट जाने का वचन मांगा था। अब था भी क्या यहां पर, सब कुछ तो युद्ध की भेंट चढ़ चुका था। सरकार कंगली हो चुकी थी। कौशल जी का सभी कुछ छीन कर युद्ध की अग्नि में झोंक दिया गया था। आज उनकी डबडबाई आंखों से बेबसी के आंसू अनवरत बहे जा रहे थे।

आज उनको वह पुराने दिन याद आ रहे थे। कितनी हरियाली थी उनके घर में भी और फैक्ट्री में भी। कितना बढ़िया शुद्ध शाकाहारी जीवन जीते थे और खुशियां फल बन कर उनके मम्मी पापा की हरी भरी बगिया में लटकीं रहतीं थीं। जब जी चाहता, लपक कर तोड़ते और खुश हो जाते।

परिवार की देश वापसी की हामी भरने पर कौशल जी को इतना संतोष हो गया कि अब जीते जी न सही पर मृत्योपरांत उनकी अस्थियां अपने देश की पतित पावन नदियों में बह कर शायद पवित्र हो जाएंगी और उनकी मातृभूमि की माटी उन्हें क्षमा कर देगी।


यदि यह लघुकथा पसंद आई हो तो कमेंट और शेयर जरूर करें, धन्यवाद जसविंदर सिंह, हिमाचल प्रदेश

“दुआ” (Prayer)

जब किसी को भीख मांगने की आदत पड़ जाती है, तो वह हर जगह ठोकर खाता है। दरअसल हम सभी भिखारी हैं जो हर दिन भगवान से कुछ न कुछ चाहते हैं। लेकिन मांगने के साथ-साथ हमें बांटना भी आना चाहिए और किसे मिलता है…आइए देखें…
When someone gets used to begging, he stumbles everywhere. Actually we all are beggars who demands something from God every day. But along with demanding, we should also learn to distribute and who gets….Let’s see…

सुना है दुआओं में
बड़ी ताकत होती है,
सुन लीं जाएं तो
बड़ी इनायत होती है,
जो पास नहीं होता
उसी की तो चाहत होती है,
किसी की दुआओं में पैसा,
किसी के औलाद होती है,
सौगातों की चाहत से ही तो
फरियाद होती है,
मिलतीं नहीं हैं उनको
जिनके दिलों में खार होती है,
जो देना नहीं जानते,
सिर्फ लेने की चाह होती है,
रब उनकी नहीं सुनता
जिनकी सोच बेकार होती है,
सच तो यह है
जिन्हें मांगना भी नहीं आता,
मासूमियत में उन्हीं की
पूरी चाह होती है,
जिनके होते हैं दिल साफ
आईने की तरह,
उनकी तो बिन बोले ही
पूरी हर मुराद होती है।

Have heard that prayers have the big power,
It is a great grace, if God listen someone’s,
We want those which we don’t have,
Someone prayer for money,
Someone prayer for children,
We do prayer to fulfil our wishes,
But their prayers are not fulfilled,
who have deceit in their hearts,
God never listen to those, whose thinking is not good,
Those who do not know to give,
Only want to take,
Truth is this
God fulfills the desires of those,
Who are innocent by nature and dont know to demand everytime,
His every wish is fulfilled by the God,
Whose heart is clean like glass.


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“प्रेम” (Love)

तेरी प्रकृति इतनी सुंदर है तो तूं कितना सुंदर होगा…..
If your nature is so beautiful, how beautiful you will be…..

हो कुसुमलता इतराती सी,
जो मस्त पवन लहराती सी,
पल पल प्रतिपल पलछिन प्रतिक्षण,
जीवन की आस बढ़ाती सी,
हों कमल पंखुड़ी खिली खिली,
हों ताल के बीच सुहाती सी,
नभ के तारे थल के जुगनू,
हो रात्रि चमक बढ़ाती सी,
हो चाँदनी पूनम चन्दा की,
सागर को मोहित करती सी,
हों ओस की बूंदें फूलों पर,
हर बूंद में किरण चमकती सी,
जल के भीतर कलरव करती,
हो बादल की परछाईं सी,
हो पर्वत श्रृंखला नीली सी,
हो बर्फ की चादर ओढ़ी सी,
हो मधुबन घाटी फूलों की,
सब धरा को हो महकाती सी,
इन सबमें कहीं मैं खो जाऊँ,
तेरे प्रेम में ही मुस्काती सी।


आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा है….साथ ही साथ शेयर भी कर दीजिएगा…😊🙏आभार, जसविंदर सिंह, हिमाचल प्रदेश

“इंद्रधनुष” (Rainbow)

हर एक की जिंदगी उतार चढ़ाव से भरी होती है। कभी पर्वत के शिखर तक चढ़ जाती है तो कभी सागर के तल तक उतरती जाती है। यदि हम ईश्वर को प्रत्यक्ष मानकर स्वयं पर दृढ़ विश्वास रखें और सत्कर्म करते रहें तो एक न एक दिन सफलता अवश्य प्राप्त हो जाती है।
Each one’s life is full of ups and downs. sometimes climbing to the top of the mountain, Sometimes descending to the bottom of the ocean. If we believe in God and have strong faith in ourselves and continue to do true efforts then one day success is definitely attained.

सैंकड़ों लीटर पानी सहेजकर झोंपड़े का छप्पर इतना भारी हो गया था कि कभी भी टपक पड़ने को तैयार था। बारिश थी कि तीन दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

बिरजू इसी आस में प्याज की छोटी – छोटी पकौड़ियाँ तल रहा था कि शायद कोई भूला बिसरा इस वीरानी सी सड़क से गुजरे और चाय पकौड़ी खाए तांकि उसकी रोजी – रोटी का प्रबंध हो सके।

जुलाई सूखा ही बीत गया था, अगस्त काटे न कटता था। इतनी भीषण गर्मी पहले तो न पड़ती थी। बारिश हो ही नहीं रही थी। यूं तो सितम्बर की शुरुआत से ही बादल आते जाते रहे, मगर बरसते न थे।

पहले आस पास के गांव के लोग चायपान के लिए आते रहते थे। पर खेती सूखी हुई थी और फालतू खर्च करने के लिए ग्रामीणों के पास पैसा ही कहाँ था।


बिरजू यदा कदा झोंपड़े से बाहर निकल कर धूप से बचने के लिए माथे पर टोपी की तरह हाथ रखकर ऊपर चमकते आकाश को मायूसी से देखा करता और बड़ी मायूसी से वापिस आ कर धम्म से बैंच पर बैठ जाता और ठण्डी भट्ठी को शून्य निगाहों से यूँ घूरता रहता मानो उसकी निगाहों से ही ठण्डी भट्ठी में फिर से तपिश बढ़ जाएगी।

कहाँ तो सूखा ही सूखा, कहाँ न थमने वाली बारिश। कहाँ तो बादल थे ही नहीं और कहाँ एक के बाद एक न जाने कहाँ से आते जा रहे थे मानो, गरीब की भट्ठी ठण्डी करने के साथ – साथ उसके पेट की भट्ठी भी ठण्डी करके ही मानेंगे।

रात के करीब आठ बज रहे होंगे। ग्राहक न होने के कारण बिरजू ने दो दिन से भट्ठी नहीं सुलगाई थी। पर अब जब हिम्मत करके थोड़ी सी पकौड़ियाँ तलनी शुरू ही कीं थीं कि अचानक एक बड़ी सी कार उसके सामने आकर रुकी।

हल्का सा शीशा नीचे करते हुए सेठ जी ने कुछ पूछना चाहा, पर मूसलाधार बारिश की मोटी – मोटी बूंदों की टपटपाहट ने उनकी आवाज को जैसे दबा ही दिया। सेठ जी ने गाड़ी झोंपड़े के बिल्कुल साथ सटा दी और तेजी से दौड़कर भीतर आ गए।

परेशान तो बहुत दिखते थे पर भूख से व्याकुल भी थे। यकायक कढ़ाई से आती खुशबू से वह और सब भूल गए और तेजी से बोले….भाई, जल्दी से गरमागरम पकौड़ियाँ खिला दे…बड़ी भूख लगी है।

बिरजू की आंखों में आँसू आ गए। वाह परमेश्वर, जब तक मैने हिम्मत हारकर भट्ठी नहीं जलाई थी, तब तक कोई भी ग्राहक नहीं आया था और आज जैसे ही पहला घान तलना शुरू ही किया था कि आपने इतने बड़े सेठ जी को भेज दिया….धन्य हो प्रभु।

भाई, बहुत ही स्वाद पकौड़ियाँ हैं, कुछ और भी है खाने को….सेठ जी ने अदरक वाली चाय सुड़कते हुए पूछा।

जी साहब, अभी सत्तू भर के छोटी – छोटी लिट्टियाँ आलू बैंगन टमाटर के चोखे के साथ बना देता हूं….उत्साहित होते हुए बिरजू बोला।

सिलबट्टा देखे कितना जमाना बीत गया था…अब तो घर में सारा काम मशीनों से ही होता था। सभी कुछ था, इतने बड़े आदमी जो थे…पर कुछ नहीं था तो मन की शांति।

बिरजू सिलबट्टे पर प्याज मिर्चा धनिया लहसुन को पीसकर चटनी बना रहा था…बट्टे को तेजी से आगे – पीछे होते देखकर सेठ जी अपने अतीत में खो गए।

कैसे वह भी एक समय अपनी छोटी सी दुकान में सिलबट्टे पर मस्त चटनी पीसा करते थे। उनके हाथ का चाय नाश्ता करने के लिए भारी भीड़ जुटी रहती थी। सरकारी फैक्ट्री के ठीक सामने उनके पिता ने बड़ी मशक्कत के साथ झोंपड़ा डाला था और धीरे – धीरे उसकी जगह छोटी सी दुकान बना ली थी जो बाद में छोटा सा रेस्टोरेंट बन गई थी।

बेटा पढ़ लिखकर कर कृषि वैज्ञानिक बन गया था और अपने शहर को छोड़कर बेटे बहू के साथ बड़े शहर आना पड़ा था। किसी के पास उनसे बात करने का समय ही न था।

लीजिए सेठ जी !
गरमा गरम लिट्टी चोखा तैयार है…चटनी के साथ….इसी के साथ विचारों की तन्द्रा भंग हुई….हैं…हां – हां…क्या खुशबू है…बिल्कुल मेरी वाली…

मूसलाधार पानी अनवरत बरस रहा था… पर अब बिरजू के मन में खुशी और मुख पर संतोष भरी मुस्कान थी।

साहब, आप इतनी अंधेरी और मौसम की मारी रात में कहाँ जाएंगे।
क्या बताऊँ भाई, मैं दूसरे शहर गया हुआ था। वापसी में अंधेरा और तेज बारिश की वजह से रास्ता भटक गया और पता नहीं कहां से होता हुआ तुम तक आ पहुंचा।
साहब, किसी ने सच ही कहा कि “जहाँ दाने, वहाँ खाने”
सच ही कहते हो भाई, ” दाने- दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम”…..मैं न भटकता तो इतने बढ़िया खाने से वंचित रह जाता…थोड़ा मुस्कुराते हुए सेठ जी बाहर की तरफ देखते हुए बोले, पर चेहरे पर चिंता भी साफ झलक रही थी।

वक़्त भी करता है क्या – क्या सितम,
कभी पैसा न था पर नहीं था कोई गम,
सिलबट्टे पे जीवन पिसता तो था,
दिन – रात पसीना छलकता तो था,
तपते कढ़ाऐ सी उबलती तो थी जिंदगी,
पर जिंदगी पे कोई रोष न था,
अब शहर में घर है गाड़ी तो है,
धन है दौलत है विलासिता तो है,
साथ हैं सब पर नहीं है परिवार का संग,
है तो बीमारी कमजोर है हर अंग..

क्या सोचने लगे सेठ जी, मेरी मानिए तो रुक जाइए और आज रात यहीं काट लीजिए, भोर होते ही रवाना हो जाइएगा। तख्ते के कोने में रखा बिस्तर झाड़कर करीने से बिछाता बिरजू बोला।

ठीक कहते हो भाई, मैं भी इसी चिंता में था…तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद।
तीन तरफ से खुले झोंपड़े में ठण्डी हवा के झोंके हल्की सी फुहार ऊपर डाल जाते थे, फिर भी सेठ जी खूब गहरी नींद में सोए। बिरजू बेंच पर दरी बिछाकर सो गया था।

सुबह पौ फटते – फटते बारिश धीमी होने लगी थी। अब केवल हल्की फुहार ही पड़ रही थी। सूर्यदेव हल्की सी लालिमा लिए इंद्रधनुष बनाने की तैयारी कर रहे थे। बादल हौले – हौले सिमट रहे थे।

सह्रदय बिरजू के अपनेपन ने सेठ जी का दिल जीत लिया था। उसकी दुर्दशा ने उन्हें विचलित कर दिया था। अब उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था बिरजू को अपने साथ ले जाके हाईवे लिट्टी – चोखा ढाबा खोलने का।

बारिश थम चुकी थी। चारों ओर मिट्टी की सौंधी खुशबू फैल चुकी थी। सेठ जी और बिरजू मोटी – मोटी रोटियां और हरी चटनी बनाते हुए इंद्रधनुष को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन दोनों के जीवन का रीतापन भरने वाला था। उनका फीका हो चुका जीवन अब फिर से इंद्रधनुष के सतरंगी रंगों से भरने वाला था।


Please comment and share this short story….. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“ईर्ष्या” (Jealous)

हम दुखी क्यों रहते हैं, क्योंकि हम हमेशा दूसरों से अपनी तुलना करते रहते हैं। अगर हम दूसरों से अपनी तुलना बन्द करके सारा ध्यान स्वयं पर केंद्रित कर दें और आगे बढ़ने की कोशिश करें तो हम खुश तो रहेंगे ही, आगे भी बढ़ेंगे। Why we remain unhappy, because we always compare ourselves to others. If we stop comparing ourselves to others and focus all attention on ourselves and try to move forward, we will be happy, we will also move forward.

पतंगें दो थीं,
इक इसकी थी,
इक उसकी थी,
इक और थी,
कहीं दूर थी,
छोटी ही सही,
पर दिखती थी,
इसकी भी उड़ी,
उसकी भी उड़ी,
मैं क्यों नीचे,
वह क्यों ऊपर,
यह सोच थी,
उन दोंनों में जड़ी,
ईर्ष्या आई,
रह न पाईं,
फिर दोनों ही,
आपस में भिड़ीं,
इसका मांझा तो पक्का था,
उसका मांझा भी कम न था,
इतना ऊपर उड़ने पर भी,
सन्तोष नहीं हो पाता था,
मैं तो खुश हूँ,
पर क्यों खुश वह,
यह गम ही तो सताता था,
जो दूर थी वह,
अकेली ही सही,
पर ऊपर उठती जाती थी,
थी मस्त पवन,
थी प्रेम में वह,
मन ही मन में,
मुस्काती थी,
इसकी भी लड़ी,
उसकी भी भिड़ी,
मन में थी जलन,
बढ़ती ही रही,
कुछ दाँव चले,
कुछ पेंच चले,
मन में कटुता,
बढ़ती ही रही,
ऊपर नीचे के चक्कर में,
उड़ गए चिथड़े,
दोनों ही फटीं,
हुआ अंत बुरा,
उन दोनों का,
इसकी भी कटी,
उसकी भी कटी,
जो दूर में थी,
वह छोटी सी,
अब आँखो से न दिखती थी,
वह मस्त गगन में उड़ती थी,
ऊपर ही ऊपर बढ़ती थी।

There were two kites, belonged to different people. A another kite looked small from a distance. Both of them had the same mindset that another’s kite shouldn’t go above my kite. Jealous increased and they both trying to make each other fall down. Though thread of the both kites was very strong. Both were not satisfied even after reaching such a height. They were sad to see the growth of each other. On the other hand the third kite, which was alone, was filled with love, smiling at the heart, flying in the cool air. Jealousy increased and they both faught with each other. Bitterness was kept growing in their hearts. Both started fighting badly and both fell down after cutting each others thread. The alone kite, which had never faught with anyone, kept flying in the sky with great joy.


If you like this post of mine, please comment and don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“वापसी” (Return)

कोरोना ने बहुत कुछ छीना है। पर अगर हार न मानी जाये तो जीत होनी तय है….इसी पे आधारित एक लघुकथा कविता के साथ….
Corona has snatched a lot. But if we don’t give up then victory is sure to happen…. Presenting a short story with poem based on this….

क्या यार…आज भी कोई सनसनाहट नहीं…लगता है आज भी कोई गाड़ी नहीं चलने वाली…आज फिर पेट भर खाए बिना सब जागेंगे…पटरी से कान सटाए हुए सुंदर मन ही मन बुदबुदा उठा। सिग्नल आज भी लाल थे….मानो गाड़ी को न रोक रहे हों….भाग्य को को ही रोक रहे हों। मायूस हो सुंदर घर की तरफ चल पड़ा।

बड़े शहर में आने के बाद तो सुंदर की मौज हो गई थी। कहां गांव में खेतीबाड़ी करके बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी नसीब हो पाती थी और यहां तो मेहनत से ज्यादा मिल जाता था, तभी तो वह अपने परिवार को भी अपने संग लिवा लाया था।

रेलवे स्टेशन के आऊटर के पास बनी झुग्गी – झोंपड़ियों में से एक में परिवार संग रहता था वह। रेलवे स्टेशनों की तरह उस आऊटर पर भी कभी रात न होती थी। कभी कोई आने वाली गाड़ी रुकती तो कभी जाने वाली।

आऊटर के पास खड़े सिग्नल मुस्कुराकर ट्रेनों को चलने – रुकने का इशारा किया करते थे। कभी हरे होते तो कभी लाल। इन्हीं की रोशनी से पटरियां रात भर चमकती रहतीं थीं।

वहां का कोई भी निवासी कभी नौकरी ढूंढने नहीं जाता था….जाना भी क्यों कर था….सभी अपना – अपना काम जो करते थे। बच्चे हों या जवान, सभी कुछ न कुछ बेचा करते थे। जैसे ही कोई गाड़ी रुकती, सभी उस पर टूट पड़ते और कुछ न कुछ कमाई करके खुशी – खुशी घर आ जाते।

सुंदर की सयानी पत्नी छोटे – छोटे समोसे और चटपटी चटनी बनाती। गाड़ी रुकते ही सुंदर जोर से चिल्लाता….

मेरा है छोटू समोसा खास,
इसकी चटनी है झक्कास,
खुशबू इसकी बड़ी सुहानी,
ट्रेन हो जाती है दीवानी…

कभी – कभी सड़क के किनारे बने पिज्जा कॉर्नर से छोटे – छोटे पिज्जा भी लाकर बेचता…जो हाथों हाथ बिक जाते।
पीछे – पीछे उसके दोनों लड़के बर्फ वाली बाल्टी में कोल्ड ड्रिंक लेके दौड़ते….जीवन बड़े मजे में कट रहा था, न जाने किसकी नजर लग गई।

सुना था जोर बड़ा रेलवे ‘इंजन’ में है,
पर अब जाना जोर तो “निरंजन” में है… जिसके एक छोटे से किटाणु ने सारे के सारे इंजन रोक दिये।

पटरियों के किनारे बना घर,
अब सूना – सूना सा क्यों लगता है,
जहां दिन – रात खटकतीं थीं पटरियां,
अब खटके बिना जी न लगता है,
जहां शोर इतना होता था,
बात नहीं हो पाती थी,
इशारों से चलता था काम,
आंखें ही सब समझातीं थीं,
कभी खटर – पटर,
कभी धमक – धमक,
कभी धड़क – धड़क,
कभी भड़क – भड़क,
इक आती थी,
इक जाती थी,
इक रूकती थी,
इक चलती थी,
जब देखो सीटी बजती थी,
अब आंखों से ही ओझल हैं,
अब जीवन कितना बोझिल है,
पटरी सूनी जो हो गई है,
जीवन की रेखा थम गई है,
कौन जाने किस घड़ी देवदूत कब आएंगें,
बुत बने खड़े से यह सिग्नल,
फिर लाल – हरे हो जाएंगे।

अब बच्चों का दुख बर्दाश्त न होता था। बहुत से लोग अपने गॉंव की ओर पलायन कर रहे थे। सुंदर ने भी कठिन फैसला लिया और जिन पटरियों ने दिन रात कमाई करवाई, उन्हीं पे आज चल के गाँव की ओर जाने को मजबूर हो गए।

हजारों मुश्किलों को सहते गाँव तो पहुँच गए, पर अब करें क्या। इतने छोटे से खेत में क्या कर पाएंगे।

पर जहां चाह, वहाँ राह। सुंदर ने हार न मानी। उसने परिवार संग मिलकर एक मिट्टी का तन्दूर बनाया और बगल के शहर से समान लाकर छोटे – छोटे पिज्जा बनाने शुरू कर दिए।

अब ‘सुंदर पिज्जा’ न केवल गाँव वालों को भाता है बल्कि आसपास के गाँवों से भी काफी डिमांड आने लगी है और उसके बदरंग होते जीवन में फिर से नए रंग भरने लगे हैं। लाल हो चुके सिग्नल फिर से हरे हो कर उसके भाग्य की रेखा को रंगबिरंगी रोशनी से भर रहे हैं।


If you like this positive story as well as poem of migrants, please comment and share.. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“श्री गणेश” (Sri Ganesh)

गणेश जी के हर अंग से हमें कुछ न कुछ सीख मिलती है। यदि हम ध्यान से देखें तो हर एक अंग विशेष ज्ञान देता है….उसी का वर्णन इस कविता में समाहित है।
We learn something from every part of Lord Ganesha. If we look carefully, each organ gives special knowledge …. The description of that is contained in this poem.

श्री गणेश जय गणेश,
दे हमें प्रेरणा,
दे हमें प्रेरणा,
मस्तक विशाल की,
दे बड़ी सोच,
महान विचार की,
दे हमें प्रेरणा,
कर्ण विशाल से,
सुनें कर्ण खोल के,
सुनें सदा ही ध्यान से,
दे हमें प्रेरणा,
छोटी सी आंख से,
लक्ष्य ही दिखे सदा,
प्राप्त लक्ष्य को करें,
दे हमे प्रेरणा,
अपनी बड़ी सी सूंड़ से,
उचित अनुचित सूंघ सकें,
उचित को ही ग्रहण करें,
दे हमें प्रेरणा,
उदर विशाल से,
बकें न ज्ञान अज्ञान को,
पचा सकें विचार को,
दे हमें प्रेरणा,
प्रिय मोदक मिष्ठान से,
सात्विक आहार हो,
और स्वस्थ रहें सदा,
दे हमें प्रेरणा,
लघु वाहन मुष्क से,
विजय करें इच्छाओं पर,
कुतरें उन्हें ही सदा,
दे हमें प्रेरणा,
अपने शस्त्र पाश से,
अज्ञान और तिमिर रूपी,
बन्धनों से मुक्त हों,
दे हमें प्रेरणा,
सत्कर्मों से युक्त हों,
श्री गणेश जय गणेश,
तेरी सदा ही जय हो।


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“विस्मरण” (Oblivion)

हम भले ही इस जन्म में कितनी ही ऊंचाइयों को छू लें, कितना ही सुखी क्यों न हो जाएं, पर भीतर एक खालीपन, एक रीतापन, कुछ कमीं, कुछ तड़प सदैव महसूस होती है। इसीलिए सुख भोगते हुए भी, आनंद की कमी हमेशा रहती है।
कारण एक ही है, ईश्वर को किए हुए वायदे को भूलना…..जो हम गर्भ में करके आए थे और जन्म लेते ही भूल गए…
विस्मरण को स्मरण में बदलते ही खालीपन भरने लगता है। No matter how much we achieved in our life, no matter how happy we are, but there is always an emptiness, some deficiencies, some yearning. That’s why, even while enjoying happiness, there is always a lack of pleasure. The reason is same, we’ve made promise to God in the womb and forgot as soon as we were born…
As soon as forgetfulness changes into remembrance, emptiness begins to fill.

चावल के दाने से लेकर,
दो बित्तों तक बड़ा किया,
गर्भ में तुझको पाला पोसा,
और धरा पर खड़ा किया,
करी व्यवस्था दूध की,
प्रथम तुझे आहार दिया,
बचपन तूने खेल बिताया,
यौवन का अंहकार किया,
उतरा यौवन ढली जवानी,
अधेड़ावस्था पार किया,
हुआ जीर्ण बदन अब तेरा,
जीवन का उपहास किया,
भूल गया जब तूँ भीतर था,
अंधकारमय जीवन था,
नौ माह तक तूँ कष्ट में लटका,
नर्क में तेरा डेरा था,
की प्रार्थना हे भगवन,
मुझे बचा इस जाल से,
उलझ गया हूँ पुलझ गया हूँ,
ले उबार जंजाल से,
रख ले मुझको बचा ले जीवन,
अब तूँ मुझको पाल ले,
करता हूँ वादा मैं तुमसे,
बाहर जब मैं जाऊंगा,
फँसूंगा न किसी और कृत्य में,
सुमिरन करता जाऊँगा,
भूल गए जो याद करो,
सोचो और विचार करो,
अभी नहीं बिगड़ा कुछ बंदे,
सुमिर के निज कल्याण करो।

“जाने दे” (Let it go)

हम अक्सर पुरानी बातों को अपने सर पर कूड़े की तरह ढोते रहते हैं और वह कूड़ा कब हमें कुंठित और बीमार कर देता है, हमें पता भी नहीं चलता। उस कूड़े की टोकरी को फेंककर आगे बढ़ जाना चाहिए।
We often carry old things like garbage on our head and when that waste makes us frustrated and sick, we do not even know. That garbage basket should be thrown and proceeded.

जो बीत गई
वह बात गई,
जो बात गई,
उसे जाने दे,
जिसमें था गम
और तेरी उदासी,
वह रात गई
उसे जाने दे,
मनहूस समझ
न उसे पकड़,
बहला ले दिल
उसे जाने दे,
आँसू थे जहाँ पर
नमक भरे,
उन्हें पोंछ के
मीठा खाने दे,
था कभी जो गम
कर उसको कम,
अब रीत नई
अपनाने दे,
जो खुशी मिले,
ले उसे पकड़,
था जो भी बुरा,
मिट जाने दे,
धागा गाँठें बन
उलझा था,
न वक्त गंवा
सुलझाने में,
जो रुका था पानी
बन कीचड़,
उसे छोड़ जरा
बह जाने दे,
माथे पे कितने सारे बल,
उन्हें झाड़ जरा
गिर जाने दे,
यह होंठ जो तेरे
लटके हैं,
उन्हें खुल के तूँ
मुस्काने दे,
कोई ढूंढ बहाना
खुशियों का,
खुद को खुशियाँ
बन जाने दे।


Please comment if you like this post and please don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“बलि” (Sacrifice)

जहां भारत के स्वर्णिम इतिहास में महान स्त्रियों का वर्णन आता है, जिन्होंने अपने जीवन को देश काल पर न्यौछावर कर दिया और अपने धर्म का पालन करते हुए कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जहां आज भी महान स्त्रियां देश को आगे बढ़ाने में जी जान से जुटीं हैं।
विडम्बना ही है कि आज भी समाज का कुछ संकुचित वर्ग बेटियों को बोझ समझता है।
इसे रोकने के लिए बहुत सारी सरकारी और निजी संस्थाएं प्रयासरत हैं। मेरी यह लघुकथा “बलि” इसी प्रयास में एक छोटा सा सहयोग है। अगर एक भी भ्रूण हत्या रुकती है तो मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।
The golden history of India is filled of description of great women, who sacrificed their lives on the country and never looked back while following her relesion. Where even today, great women are busy in taking the country forward.
The irony is that even today some narrow section of the society considers daughters as a burden.
Many government and private institutions are trying to stop this. My short story “Bali” is a small collaboration in this effort. If any feticide stops, I will consider myself blessed.

गुड़िया रानी मीठे सपनों की दुनिया में खोई हुई थी। छोटे – छोटे कपड़े, छोटी-छोटी रंग बिरंगी चूड़ियां, छोटी सी बिंदिया लगाए झूले में लेटी हुई थी। माँ बड़े प्यार से उसके सर को सहला कर झूला झुला रही थी। कितना सुखद लग रहा था….

अचानक गुड़िया को लगा कि माँ के जो हाथ उसको प्यार कर रहे थे अब वही उसका गला दबा रहे थे। अबोध कुछ और समझ पाती की डॉक्टर आँटी के नुकीले चाकू ने उस कोमल कली के खिलने के पहले ही उसके टुकड़े -टुकड़े कर दिए।

आज घर वाले बहुत खुश थे। होते भी क्यूँ न, डाक्टर साहिबा में इतनी बड़ी खुशी की खबर जो दे दी थी। आखिरकार तीन – तीन को निपटाने के बाद लम्बा इंतजार जो करना पड़ा था पूरे परिवार को। इसी खुशखबरी को पाने के लिए इतनी सारी बलियां जो देनी पड़ीं थीं।

अम्मा जी के पैर जमीन पर ही न पड़ते थे। अस्पताल से सीधे हलवाई की दुकान की राह पकड़ ली। घुटनों में गठिया के कारण सूजन रहती थी, टक – टक की आवाज भी करते थे, ठीक से चला भी न जाता था। पर आज बात ही ऐसी थी कि सारा दर्द भूल गया था।

लगभग दौड़ती भागती हलवाई की दुकान तक आ पहुचीं थीं। मन तो हुआ था कि दुकान के सारे लड्डू पैक करवा के पूरे मोहल्ले में बांट दें। पर यह सोचकर रह गईं कि इतनी मुश्किल से तो यह खुशी मिलने वाली है, कहीं किसी की बुरी नजर न लग जाए। जब मुन्ना हो जाएगा तो पूरे मोहल्ले को भोज करवा देंगे…उसमें क्या बड़ी बात है।

माँजी, खड़ी – खड़ी क्या सोच रहीं हैं? अम्मा जी हड़बड़ा कर बोलीं, रे मुए…एक किलो लड्डू पैक कर जल्दी…बकर – बकर न कर।

मुन्ने के पाँच महीने तो सुख से ईश्वर का नाम आराधते हुए बीत गए थे। प्रार्थना अनवरत जारी थी। पर अब जब केवल चार महीने का तप और बचा था कि अचानक एक रात सिसकियों की आवाज से वह चौंक उठा। अब सिसकियों की आवाजें बढ़ रहीं थीं। मुन्ना भय से कांप गया था और मन किसी अनहोनी की आशंका से ग्रसित हो उठा था।

जब तक कि कुछ समझता, किसी दूसरे के सुबकने की आवाज भी सुनाई देने लगी। इसी बीच किसी की दर्द भरी कराहटें सुनाई दीं और उसकी बन्द आँखों से ही अश्रुधारा बह चली। काफी देर बाद हिम्मत करके मन ही मन पूछा कि आप लोग कौन हैं, क्या हुआ है?

हम तीनों तुम्हारी बड़ी बहनें हैं। हम सब तुमसे पहले घर पहुँच कर तुम्हारा स्वागत करने वालीं थीं। तुम्हें गोद में खिलाने वालीं थीं। तुम पर अपनी सारी दुनिया न्यौछावर करने वालीं थीं…पर ऐसा हो न सका…डाक्टर आँटी के नुकीले औजारों ने हमारे अविकसित बदन को क्षत- विक्षत करके हमें मार डाला।

मुन्ने की समझ से बाहर था कि की माँ – बाप तो अपनी संतान की रक्षा के लिए पूरे संसार से भिड़ जाते हैं, फिर मेरी बहनों को क्यों नहीं बचाया?

हमें माफ कर दो भईया, हम तो तुम पर अपना प्यार लुटाने आईं थीं, पर तुम्हें सामने पाकर बर्दाश्त न कर सकीं। अपना दुखड़ा तुम्हें सुना दिया और तुम्हें परेशान कर दिया। तुम सदा खुश रहना और माँ – बाप की सेवा करते रहना। हम भले ही तुम्हारे साथ संसार में न रह पाएंगी तो क्या, हमारा प्यार और आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा। सदा खुश रहो, अलविदा।

मुन्ने के आने में अब अधिक समय नहीं बचा था, इसलिये पूरे जोर – शोर से स्वागत की तैयारियां चल रहीं थीं। पूरे घर का रंग – रोगन हो चुका था। झाड़ – फानूस से घर को सजाया जा रहा था। बरामदे के बीचोंबीच सुंदर सा झूला लटका दिया गया था। छोटे – छोटे कपड़े बनाने शुरू कर दिए गए थे। पूरा घर खिलौनों से भर गया था। भव्य भोज के आयोजन की पूरी तैयारी चल रही थी…आखिरकार बात छोटी थोड़ी न थी…इतने लम्बे इंतजार के बाद लड़का जो होने वाला था…।

मुन्ने का मन उद्विग्न हो चला था। वह अपनी बड़ी बहनों की हत्या का कलंक अपने माथे पर लेकर जिंदगी नहीं जीना चाहता था। अब वह इस स्वार्थी दुनिया में हत्यारों के परिवार का अंग नहीं बनना चाहता था। उसका स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरने लगा था।

बड़े – बड़े डॉक्टरों को दिखा दिया गया था। सारी कोशिशें बेकार होती नजर आतीं थीं।

मुन्ने की प्रार्थना छूट चुकी थी, नींद टूट चुकी थी। जिस कोमल हृदय की धड़कनों से पूरा घर धड़कने वाला था, उसी हृदय को आघात पहुंच रहा था। कोमल मस्तिष्क की कोमल नसों में रक्त जमना शुरू हो रहा था।

अब बहू को कोई हलचल महसूस ही न होती थी। अब तो हिलता – डुलता भी न था, न ही लात मारता था। एक ही जगह भार रखा महसूस होता था।

आज तो जैसे भूकंप आ गया हो, धरती फट गई हो। पूरे मोहल्ले में कोहराम मचा हुआ था।

बलि प्रथा रोकने के लिए मुन्ना ने स्वयं की ही बलि दे दी थी।


अगर यह कहानी जरा सी भी आप के दिल को छूती महसूस हो रही है तो आप अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें,धन्यवाद। जसविंदर सिंह, हिमाचल प्रदेश

“सच” (Truth)

अक्सर सुनी सुनाई बातें सच नहीं होतीं।
सच्चाई कुछ और ही होती है, बयान कुछ और ही की जाती है। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, जो जो बात सुनता जाता है, अपने ढंग से कुछ घटा बढ़ा कर बोल देता है। इस कारण परिवार, समाज और यहां तक कि देश भी टूटने की कगार पर आ जाते हैं। इसलिए बात को आराम से सुन कर समझना चाहिए और अपनी तरफ से बिना कुछ जोड़े घटाए ही बोलना चाहिए।
Often the things heard are not true. The truth is different, the statement is made differently. One after the other, the third after the other, whoever listens, speaks a little in his own way. For this reason, family, society and even the country fall on the verge of breakdown. That is why one should listen comfortably and understand and speak without subtracting a few from your side.

कहा कुछ गया,
सुना कुछ गया,
कुछ याद रहा,
कुछ भूल गया,
जो याद रहा,
वह बड़ा हुआ,
जो भूल गया,
वह पड़ा रहा,
जो पड़ा रहा,
वह दबा रहा,
जो दबा रहा,
वह दफन हुआ,
जो सच था,
वही तो दफन हुआ,
जो गढ़ा गया,
वह तो बढ़ता ही रहा,
कुछ झड़ता कुछ जुड़ता बड़ा हुआ,
जो बड़ा हुआ,
वह दिखता रहा,
यूं ही बात से बात निकलती रही,
था कुछ और और ही बनती रही,
धीरे धीरे ही सही,
सच सामने आता रहा,
झूठ तो झूठ था,
जाता रहा,
जो सच था,
रहा और आगे बढ़ा,
सच तो यह है,
सच ही सच्चा रहा।

If you like my posts, please comment and share, Regards

“कृपा”(Grace)

भगवान की कृपा से ही कोई कुछ लिख सकता है। कलम वही कहानी कह रही है (One can write something only with God’s grace. Pen is telling the same story)

अवगुन से थी मैं भरी हुई,
वासनाओं से सनी हुई,
जीवन की आपाधापी की,
धूल मिट्टी में जमीं हुई,
निर्जन स्थल पर पड़ी हुई,
स्याही थी मेरी जमीं हुई,
धड़कन थी मेरी खड़ी हुई,
निसदिन थी मैं निस्तेज हुई,
अरी सखी मैं क्या बतलाऊँ,
मूर्छा में थी मैं सोई हुई, इक दिन मालिक की कृपा हुई,
घटना अंतर में घटित हुई,
आँखों में मेरी चमक हुई,
किरणें प्रकाश का पुंज हुईं,
उनकी ही कृपा के चलते,
अब मैं लिखती जाती हूँ,
हाथ पकड़ कर वह लिखवाते,
मैं इठलाती गाती हूँ।

I was loaded with demerits,
Stained with lusts,
Life was a vain run,
Frozen in dust and soil,
Lying on a lonely place,
My ink was frozen,
My heart was stop beating,
I was languishing day by day,
How do I tell you friend,
I was unconscious,
One day the God was pleased,
Some positive happened inside,
My eyes flashed,
Rays become the beam of light,
Due to God’s grace,
Now I keep writing,
He Holds my hands during writing,
Now I keep singing joyfully.

“मैं रहता हूँ उस देश में”

मैं रहता हूँ उस देश में,
जहाँ नानक की भक्ति है,
गुरु गोबिंद की शक्ति है,
जहाँ धर्म की आन की खातिर,
शीश लुटाए जाते हैं,
जहाँ पे मांओं के बच्चे,
चक्की में पिसाए जाते हैं,
जहाँ पे नन्हे नन्हे प्राण,
भालों पे नचाए जाते हैं,
जहाँ फतेह जोरावर सिंह,
दीवारों में चिनाए जाते हैं,
जहाँ गुरु अर्जुन देव जी,
अंगारों पे बिठाए जाते हैं,
जहाँ पे भाई मतीदास,
आरों पे चढ़ाए जाते हैं,
जहाँ पे भाई मनी सिंह,
अंग-अंग कटवाए जाते हैं,
जहाँ चांदनी चौक में गुरु,
शीश लुटाए जाते हैं,
जहाँ गीदड़ से परिवर्तित कर,
सिंह सजाए जाते हैं,
जहाँ पे सन्तों के द्वारा,
भगवान मिलाए जाते हैं,
हाँ, मैं रहता हूँ उस देश में।

“आलू” (Potato)

मेरी इस हास्य कविता का आनंद लीजिए। 😊

मैं सीधा भोला भाला,
आलू था मोटा लाला,
गालें थीं मेरी लालम लाल,
नाम पहाड़ी मस्त थी चाल,
लाड प्यार से बड़ा हुआ था,
ठेले पे मैं खड़ा हुआ था,
ठेला घूम रहा था जब तो,
हाथ बांध मैं अकड़ रहा था,
तभी किसी ने हाथ बढ़ाया,
बड़े प्यार से मुझे उठाया,
मैं तो कुछ भी समझ न पाया,
झोले में झटपट समाया,
नहला धुला के मुझको छीला,
डर से मैं हो गया था पीला,
बड़ी छुरी से मुझको काटा,
तन बदन को ऐसे बांटा,
बोला बगल में रखा आटा,
ले अब कर ले सैर सपाटा,
नाम का ही तो था मैं राजा,
बजा दिया था मेरा बाजा,
खाने से मुझे क्या है लाभ,
निकले तोंद हो जाये जुलाब,
मुझमें भरी है खूब मिठास,
होगी शुगर फूलेगी सांस,
अरे अब तो तुम डर जाओ जी,
मुझको न तुम खाओ जी,
हरी भरी सब्जी भी खाओ,
सेहत स्वस्थ बनाओ जी।


अगर आपको यह हास्य कविता अच्छी लगी है तो please comment और share करें और जिनके छोटे बच्चे हैं, उनसे तो जरूर share करें। Regards

“भादो” (Bhado)

लघु कथा (Short Story)

समय यही कोई सुबह के छः बज रहे होंगे। रात भर के उमस से भरे छोटे से टैंट से निकलकर आकाश पास ही बुझे हुए अलाव के पास चला गया, जो रात में ही जलाया गया था।

राख को एक छोटी सी डंडी से हटाकर देखा तो लकड़ी कोयला बन कर अभी भी थोड़ी-थोड़ी सुलग रही थी। हल्की सी चोट से ही सुलगते कोयले से राख झड़ गई और सुर्ख अंगारे दिखने लगे। उन्हीं के साथ खेलते खेलते आकाश अतीत की गहराइयों में समाता चला गया।

उसकी नई नई शादी हुई थी। उसकी पत्नी बरखा अपने नाम के अनुरूप ही जिधर से निकल जाती, सौंधी खुशबू फैला जाती।

बरखा ने अपने मां बाप को कभी एहसास ही ना होने दिया था कि वह लड़का नहीं लड़की है। शुरू से ही उसका मन आकाश की बुलंदियों को छू लेना चाहता था। उसका एडमिशन भी एक बड़े अच्छे से सैनिक स्कूल में हो गया था।

आज बरखा बहुत खुश थी, होती भी क्यों न, पहली बार फाईटर प्लेन जो उड़ा कर आई थी। अब वह अपने मां बाबूजी की ही बेटी न थी। पूरे देश की बेटी थी।

आकाश बचपन से ही नई-नई खोजें करना चाहता था, पर लैब में नहीं। उसका मन तो हरियाली में ही रमता था। तभी तो वह उच्च शिक्षा लेकर डी आर डी ओ में वनस्पति वैज्ञानिक बन गया था और अपनी टीम के साथ देश भर के जंगलों – पहाड़ों पर नित्य नई खोजें किया करता था।

शादी के बाद तो दोनों को जैसे पंख से लग गए थे। दोनों अपने-अपने नाम के अनुरूप ही थे। आकाश का भावुक हृदय बहुत विशाल था और बरखा तो मानो आकाश के लिए ही बनी थी। क्या खूब जोड़ी थी उन दोनों की, दोनों बहुत खुश थे।

आकाश के ऊपर तो जैसे बिजली ही गिर गई हो। मानो करंट ने उसके तन-बदन को झिंझोड़ कर रख दिया हो। खबर थी ही ऐसी, बरखा का फाईटर प्लेन महासागर के ऊपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

हजार कोशिशों के बाद भी उसका कोई पता न चल सका था। मानो बेदर्द सागर ने उसकी बरखा को लील लिया हो और वापस लौटाने की कोई गुंजाईश ना हो।

जैसे भादो के महीने में हर पल बदलता मौसम भ्रमित करता रहता है, लगता है अभी बरसेगा और पल में ही धूप निकल आती है। मानो भादो के बादल लुका छुपी कर रहे हों। कुछ ऐसा ही उसके जीवन में भी घटित हो रहा था।

पर आकाश को पूरा भरोसा था कि कभी न कभी सूर्य अपनी रश्मियों से सागर में समाई बरखा को उठा लेगा और वह फिर से उसके सूने जीवन की हरियाली बन कर उसके ऊपर बरस जाएगी।

सहसा अंगारे से उड़कर एक हल्की सी चिंगारी ने आकाश के हाथ पर पड़ कर उसे मानो सोते से जगा दिया हो। सूने मन से अंगड़ाई लेता हुआ वह उठ खड़ा हुआ।

तभी टैंट के भीतर से किसी की हर्ष मिश्रित आवाज आई। आकाश! वायरलैस पे हेडक्वार्टर से संदेश आया है कि विंग कमांडर बरखा की खोज पूरी हो गई है। अब वह स्वस्थ और सुरक्षित हैं और एयरफोर्स वाले उन्हें जल्द लेकर तुम्हारे घर आने वाले हैं।

आकाश की बुझी आंखें फिर से चमक उठीं। मुस्कुराकर सर उठा कर ऊपर देखा तो भादो की काली घटाएं उमड़ घुमड़ कर आ रही थी और इस बार मानों आकाश पर झमाझम बरस कर उन दोनों के नाम को सार्थक बना देना चाहती थीं।

“विजयी भव:” (Be Victorious)

भारतीय सेना का इतिहास सदैव स्वर्णिम रहा है। ऐसा उत्साह, दिलेरी, वीरता, रणकौशल किसी और सेना में नहीं है। भारत की सेनाओं ने सदैव नए नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। ऐसे वीर सैनिकों को नमन।
The history of the Indian Army has always been golden. No other army has such enthusiasm, courage, bravery, and tact. Indian armies have always set new records. Greetings to such brave soldiers.

अपने मन में
अपने तन में
नवऊर्जा का संचार करो,
कर कस कमर
रण में उतर
शत्रु का संहार करो,
बासठ पैंसठ
और इकहत्तर
तुमने ही जितवाया था,
चट्टानों के सीने पे चढ़
विजय दिवस मनवाया था,
लोमड़ पड़ोसी के घर घुस
स्ट्राइक करके आया था,
घाटी में गलवान की
बलवान का रूप दिखाया था,
अब आन पड़ा संकट भारी
चाल चीन की है सारी,
करने को अंतिम प्रहार
अब ब्रम्हास्त्र उठाना है,
चमगादड़िस्तानों की जड़ों को
धरा से ही मिटाना है।


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“एहसास” (Feelings)

शादी के बाद जब लड़की का मायका छूटता है तो कैसा एहसास होता है….
इन्हीं एहसासों को दर्शाती एक छोटी सी कविता…
How does one feel when a girl leaves her house after marriage ….
A small poem reflecting these feelings …

अपने माँ बाप को छोड़ के जाना,
इक अजनबी को अपना बनाना,
कैसा एहसास है,
जहां कली खिली और बड़ी हुई,
जिस घर की है चाहत दिल में बसी,
उस अँगने को छोड़ के जाना,
कैसा एहसास है,
जहां कदम कदम पर फूल बिछे,
कांटे कभी दामन छू न सके,
उस बगिया से दूर हो जाना,
कैसा एहसास है,
भईया का चुटिया पकड़ना और सताना,
सखियों संग खिलखिलाना खूब बतियाना,
उस घर को छोड़ के जाना,
कैसा एहसास है,
जहां राखी पर मिलते हैं
प्रेम भरे आश्वासन,
उस भईया की सूनी कलाई को
छोड़ के जाना,
कैसा एहसास है,
जहां पली बढ़ी और बड़ी हुई,
अपने पैरों पे खड़ी हुई,
उसी घर से बिछड़ जाना,
हाय, कैसा एहसास है।

“बाल गोपाल”(Sri Krishna)

Bal Gopal

हे बाल गोपाल
हे दीन दयाल,
हे मनमोहन
हे मदन गोपाल,
घुंघराले कुंतल असंख
मस्तक सुशोभित मोरपंख,
नयन कमल
दिव्य अवलोकन
उन्नत ललाट
पर्यवलोकन,
दिव्य आलोकित प्रभामण्डल
सर्व सृष्टि समाहित महामण्डल,
वाणी मधुर बरसे अमृत
मन हों निर्मल हों आनंदित,
बंसी मधुर रखी अधर
सुन ध्यान रमैं हे अक्षधर,
मुस्कान मोहक अति मधुर
छाए बहार निस दिन प्रचुर,
ठुमकत चलैं घुंघरू बजैं
हतप्रभ तकैं गोकुल सजैं,
माता बिलोएं प्रेम से
मटकी का माखन अति प्रिय,
छवि मनोहर हे हरि
तुझमें ही मेरा दिल बसै।।

“केसरी”(Kesri)(Saffron)

केसरी रंग हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। केसरिया सात्विक माना गया है। सूर्योदय हो या सूर्यास्त, केसरिया रंग अपनी छटा बिखेरता ही है। अग्नि की आभा में भी केसरिया रंग की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। केसरी जो लाल और पीले रंगों का मिश्रण है, इसे देखते ही सारी निराशाएं मिट जाती हैं। यह नवीनता और सृजनता का प्रतीक है।

(Saffron color is an integral part of our life. Saffron is considered virtuous. Whether it is sunrise or sunset, the saffron color spreads its shadow. Saffron color also plays an important role in aura of fire. Saffron, which is a mixture of red and yellow colors, dissipates all disappointments upon seeing it. It is a symbol of newness and creativity.)

हवाओं का रुख है
दिशा केसरी में,
चला चल खिंचा चल
दिशा केसरी में,
सुना है पवन
केसरी हो गई है,
बहा चल पवन संग
दिशा केसरी में,
डूब जा केसरी में
लगा प्रेम गोता,
समंदर की लहरें
हुई केसरी हैं,
सूर्योदय पूर्व का
केसरी है,
आभूषण स्वर्ण के
केसरी हैं,
कश्मीर का केसर
केसरी है,
पकी गेहूँ खलिहानों में
केसरी है,
नवीनता सृजनता
घटित हो रही है,
ध्वजा केसरी हैं
गुंबद केसरी हैं,
सर्वत्र केसरी है
सर्वत्र ईश्वरी है।

“आस”(Hope)

लघुकथा (Short Story)

भी रेगिस्तान भी तो समुंद्र रहा होगा। सागर की लहरें वहां भी तो हिलोरें भरती रही होंगी। तभी तो जल की जगह आज रेत की लहरों का सूखा समुंद्र चारों ओर दिखाई देता है। शायद इसीलिए रेगिस्तान में भटकते लोगों को मृगतृष्णा के कारण रेत की लहरें भी सागर की लहरों की मानिंद दिखाई देती हैं।
से ही रेगिस्तानी इलाके के दूरदराज में बसे पुराने गांवों में से एक गांव था वह। ज्यादातर मिट्टी से बने कच्चे मकान थे। केवल एक ही मकान पक्का था, जो अब देखरेख न हो पाने के कारण जर्जर होता जा रहा था।
दो – तीन कमरों के मकान के दालान में छोटी सी चारदीवारी थी, जिसके बीचों बीच लगे किवाड़ की कुण्डी आधी तो चमकती थी, पर आधी जंग से जंग हार रही थी और बापू की निगाहें उस कुण्डी को अपलक निहारती रहतीं थीं।
दालान में एक अदद पेड़ था, जो अक्सर शान्त ही रहता था और उसी के बगल में एक हैंडपंप था, जिसकी आवाज अब कम ही आती थी।
भी कोई आहट होती तो किवाड़ पहले ही चीं चीं कर बता देता…..पेड़ की पत्तियाँ हौले से सरसरा जातीं और नल से भी इस आस में पानी की दो बूंदे टपक जातीं कि कोई तो होगा अपना सा। जो भीतर कदम रखेगा और बापू को प्रणाम करके मुस्कुराते हुए अपना मैडल बापू के गले में पहना देगा…..कभी तो वह दिन आएगा।
स घर के पुरखों ने भी जंगें लड़ीं थीं….बेटे ने भी….जो लगभग बीस साल पहले नई नई वर्दी पहनकर ऊँट की सवारी करता हुआ शान से बार्डर की ओर पहरेदारी करने निकला था….पर लौटा नहीं।
रेगिस्तान में भी नमी न थी और बापू की आंखों में भी सूखे की कोई कमी न थी, जिनमें अब नमी आने की सम्भावना भी न के बराबर ही थी।
मौसम करवट बदल रहा था। रातें ठण्डी होने लगीं थीं। मौसम की मानिंद बापू की आस भी ठण्डी पड़नी शुरू हो गई थी और एक दिन बापू ने फौजी बेटे के आने की आस छोड़ दी। अब कोई आस शेष न बची थी।
ज पहली बार बापू ने स्वयं को बड़ा ही हल्का महसूस किया…क्योंकि भार तो इच्छाओं का ही होता है।
जैसे जैसे शाम ढलती जा रही थी, बापू अवचेतन में समाते जा रहे थे।
खिरकार अगले जन्म में नई प्रेरणा, नई चेतना और नई ऊर्जा के साथ उन्हें फौजी की वर्दी जो चाहिए थी।।



“अजेय”(Invincible)

विपत्तियां किस पर नहीं आतीं, दुख किसको नहीं मिलता। यह तो हमारा मन ही है, जो पल में ही हार मान लेता है।
पर यदि हम उन विकट परिस्थितियों में भी अपनी विवेक बुद्धि से काम लें और मन को सकारात्मक सोचने को विवश कर दें तो दुख के घने बादलों में भी आशा की सुनहरी किरण दिखाई दे जाती है। सच ही कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

Who does not get misery, who does not get sorrow. It is our mind that concedes defeat in the moment.
But if we work with our wisdom and intellect even in those difficult circumstances and make the mind think positively, then in the thick clouds of sorrow, a golden ray of hope is seen. Truth has been told that the losers of the mind are the losers, the victories won by the mind.

मन थक पड़ा,
मन गिर पड़ा,
निराशाओं के भंवर जाल में,
उलझ पुलझ के अंधकार में,
भर भर के खूब सोच विचारा,
कहो मिटे कैसे अंधियारा,
सहज ही भीतर बिजली कौंधी,
बरस प्रेम हुई मिट्टी सौंधी,
सूखे बीजों में जान पड़ी,
हरियाली की आस बढ़ी,
सूख चुके मन के बीजों में,
कोपल इक नई फूट गई,
निर आसा के भंवर जाल में,
लता सुहानी बढ़ी नई ।

“चाँदनी”(Moonlight)

“चाँदनी”

इक रात चाँदनी मेरे आँगन में आई, हौले से वह मेरी पलकों में समाई,
मैं अपलक खड़ा निहारता रह गया उसे,
मैं अवाक था मगर मेरे दिल ने पूछा,
ऐ चाँदनी तुम यहाँ कैसे आई हो,
क्या मेरे लिए कोई सौगात लाई हो,
जब आँख खुली तो पाया मैंने,
चाँदनी सी चमकती इक मूरत थी वहाँ,
रात चाँदनी से मेरे दिल ने पूछा था जहाँ, पास गया और अपलक देखा,
मूरत वह ममतामयी थी,
कोई और नहीं माँ थी मेरी,
मुझे जिसकी बहुत जरूरत थी।

संकल्प शक्ति (Willpower)

कभी-कभी हमारे भीतर विचारों का अंतर्द्वंद चलता रहता है। पर यदि संकल्प शक्ति हो तो आसानी से मन पर विजय पाई जा सकती है।(Sometimes there is a conflict of thoughts within us.  But if you have the power to resolve, then the mind can easily be conquered.)


आज मन था कुछ गमगीन,
कवितायें लिख दीं तीन,
मन बुझा बुझा सा बोझिल था,
चिंता के जाल में उलझा था,
कलम ने उठ कुछ लिखना चाहा,
पर मन को यह सब न भाया,
उसे तो करनी मनमानी थी,
उसकी तो यह जन्मजात निशानी थी,
पर हिम्मत कर कलम बोली,
वैसे तो मेरी सांसें फूलीं,
तुझसे कौन जीत सका है,
हर कोई तो तुझसे थका है,
पर अब मैं तुझसे हार न मानूं,
मुझे झुका तो मैं जानूं,
तूं चाहता लिखूँ गम की गज़ल,
कर दूं सबकी आंखें सजल,
पर मेरी नहीं यह नीयत है,
मेरी हरी भरी तबीयत है,
डिस्चार्ज न मैं हो पाऊंगी,
कोरे कागज के सीने पे,
नित ऊर्जा भरती जाऊंगी।

jeevan ka rahasya

जीवन का रहस्य ( Secret of Life)

इस कविता में जीवन की सच्चाई और रहस्यों को प्रकाशित करने का प्रयत्न किया है, पसंद आये तो अवश्य comment और Share करें, धन्यवाद। 

In this poem, I’ve tried to publish the truth and secrets of life, if you like, then comment and share, thank you.

जीवन का रहस्य

जीवन है इक कठिन चढ़ाई, 
            जिसपे चढ़ते जाना है। 
जीवन है इक आग का दरिया,
             प्रेम का जल बरसाना है। 
जीवन है इक दुख का सागर, 
            सत्य की नाव चलाना है। 
जीवन है इच्छाओं की झाड़ी, 
            संयम से कटवाना है। 
जीवन है इक अहम का पत्थर, 
            सेवा से हनवाना है। 
जीवन है इक मेघनाथ, 
            जिसे लक्ष्मण से मरवाना है। 
जीवन है रावण का पुुतला,
            राम से शीश कटवाना है। 
जीवन है माया का बन्धन,
            मोहपाश खुुलवाना है। 
जीवन है सुुंदर सी दलदल, 
            लेट के पार कर जाना है। 
जीवन है इक मात्र भुलावा, 
            सत्य का चेत कराना है। 
जीवन है इक झूठा शोर, 
            इसे अनहद नाद सुनवाना है।
जीवन है मृत्यु का साथी, 
            जिसे अमर कर जाना है। 
जीवन हैै यह अहं बुद्धि, 
            सतगुरु की बुद्धि अपनाना है। 
अहं तोड़कर – मोह छोड़कर, 
            जीवन का सब सार समझ, 
तेरे चरणों में लग जाना है। 
            हे प्रभु अब दया करो, 
दया करो प्रभु दया करो, 
            मुझे तुझमें ही मिल जाना है।

varmala

वरमाला (Varmala)

जीवन की प्यारी बगिया में,
हंसो खेलो मुस्कुराओ, 
प्यार की मीठी खुशबू से,
एक नया सिलसिला बनाओ,
हो न कोई गम जहां,
आओ हम चल पड़ें वहां,
जीवन की प्यारी कलियों से ,
आओ हम तुम पुष्प खिलाएं,
पुष्प हों इतने प्यारे के वो,
वरमाला खुद ही बन जाएँ ।


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Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

last wishes key of all secret

अंतिम स्मृतियाँ (Last Memories)

यह एक पत्ते की छोटी सी कहानी है, जो अपने परिवार से बिछड़ कर धरा पर आन पड़ा है और अंतिम सांसे गिन रहा है। उसके नेत्रों  के सामने सारी यादें चलचित्र बनकर उभर रही हैं। उसका एक मार्मिक चित्रण इस छोटी सी कविता में समाहित है। यदि कविता अच्छी लगे तो कमेंट और शेयर कर दिजिए ,धन्यवाद।

(This is a short story of a leaf, who is separated from his family and lies on the earth and is counting the last breath.  All the memories are playing in front of his eyes as a movie.  A poignant portrayal of it is contained in this short poem. If the poem looks good, please comment and share, thanks)

अंतिम स्मृतियाँ (Last Memories)

यह टूटा हुआ पत्ता पूछे,
पहले मैं भी था हरा – हरा,
सारे पत्तों संग खेला करता,
मेरा भी था परिवार बड़ा,
जब बच्चों ने झूला डाला,
तब सावन का लगा पता,
पींग मारते झूले पे,
जब आते ऊपर बच्चे,
सचमुच कितना अच्छा लगता,
झूम उठते हम सब पत्ते,
सूख गया आयु पूरी कर,
लटक गया बूढ़ा बनके,
साथ मेरा सबने छोड़ा,
जोश जवानी में तनके,
फिर पत्ते की आंखें मूंदीं,
मन उतर गया गहरे तल में,
सांसें टूटीं छूटा दामन,
अंतिम हिचकी ली नश्वर ने l


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Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh