“अजेय”(Invincible)

विपत्तियां किस पर नहीं आतीं, दुख किसको नहीं मिलता। यह तो हमारा मन ही है, जो पल में ही हार मान लेता है।
पर यदि हम उन विकट परिस्थितियों में भी अपनी विवेक बुद्धि से काम लें और मन को सकारात्मक सोचने को विवश कर दें तो दुख के घने बादलों में भी आशा की सुनहरी किरण दिखाई दे जाती है। सच ही कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

Who does not get misery, who does not get sorrow. It is our mind that concedes defeat in the moment.
But if we work with our wisdom and intellect even in those difficult circumstances and make the mind think positively, then in the thick clouds of sorrow, a golden ray of hope is seen. Truth has been told that the losers of the mind are the losers, the victories won by the mind.

मन थक पड़ा,
मन गिर पड़ा,
निराशाओं के भंवर जाल में,
उलझ पुलझ के अंधकार में,
भर भर के खूब सोच विचारा,
कहो मिटे कैसे अंधियारा,
सहज ही भीतर बिजली कौंधी,
बरस प्रेम हुई मिट्टी सौंधी,
सूखे बीजों में जान पड़ी,
हरियाली की आस बढ़ी,
सूख चुके मन के बीजों में,
कोपल इक नई फूट गई,
निर आसा के भंवर जाल में,
लता सुहानी बढ़ी नई ।

20 thoughts on ““अजेय”(Invincible)

  1. Very nice…
    मन ही शक्ती मन ही शीव, मन ही पंच तत्व का जीव ।
    जो इस मन को उन्मन करै, सो तीन लोक की बातें कहै।

    Liked by 1 person

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