“बलि” (Sacrifice)

जहां भारत के स्वर्णिम इतिहास में महान स्त्रियों का वर्णन आता है, जिन्होंने अपने जीवन को देश काल पर न्यौछावर कर दिया और अपने धर्म का पालन करते हुए कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जहां आज भी महान स्त्रियां देश को आगे बढ़ाने में जी जान से जुटीं हैं।
विडम्बना ही है कि आज भी समाज का कुछ संकुचित वर्ग बेटियों को बोझ समझता है।
इसे रोकने के लिए बहुत सारी सरकारी और निजी संस्थाएं प्रयासरत हैं। मेरी यह लघुकथा “बलि” इसी प्रयास में एक छोटा सा सहयोग है। अगर एक भी भ्रूण हत्या रुकती है तो मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।
The golden history of India is filled of description of great women, who sacrificed their lives on the country and never looked back while following her relesion. Where even today, great women are busy in taking the country forward.
The irony is that even today some narrow section of the society considers daughters as a burden.
Many government and private institutions are trying to stop this. My short story “Bali” is a small collaboration in this effort. If any feticide stops, I will consider myself blessed.

गुड़िया रानी मीठे सपनों की दुनिया में खोई हुई थी। छोटे – छोटे कपड़े, छोटी-छोटी रंग बिरंगी चूड़ियां, छोटी सी बिंदिया लगाए झूले में लेटी हुई थी। माँ बड़े प्यार से उसके सर को सहला कर झूला झुला रही थी। कितना सुखद लग रहा था….

अचानक गुड़िया को लगा कि माँ के जो हाथ उसको प्यार कर रहे थे अब वही उसका गला दबा रहे थे। अबोध कुछ और समझ पाती की डॉक्टर आँटी के नुकीले चाकू ने उस कोमल कली के खिलने के पहले ही उसके टुकड़े -टुकड़े कर दिए।

आज घर वाले बहुत खुश थे। होते भी क्यूँ न, डाक्टर साहिबा में इतनी बड़ी खुशी की खबर जो दे दी थी। आखिरकार तीन – तीन को निपटाने के बाद लम्बा इंतजार जो करना पड़ा था पूरे परिवार को। इसी खुशखबरी को पाने के लिए इतनी सारी बलियां जो देनी पड़ीं थीं।

अम्मा जी के पैर जमीन पर ही न पड़ते थे। अस्पताल से सीधे हलवाई की दुकान की राह पकड़ ली। घुटनों में गठिया के कारण सूजन रहती थी, टक – टक की आवाज भी करते थे, ठीक से चला भी न जाता था। पर आज बात ही ऐसी थी कि सारा दर्द भूल गया था।

लगभग दौड़ती भागती हलवाई की दुकान तक आ पहुचीं थीं। मन तो हुआ था कि दुकान के सारे लड्डू पैक करवा के पूरे मोहल्ले में बांट दें। पर यह सोचकर रह गईं कि इतनी मुश्किल से तो यह खुशी मिलने वाली है, कहीं किसी की बुरी नजर न लग जाए। जब मुन्ना हो जाएगा तो पूरे मोहल्ले को भोज करवा देंगे…उसमें क्या बड़ी बात है।

माँजी, खड़ी – खड़ी क्या सोच रहीं हैं? अम्मा जी हड़बड़ा कर बोलीं, रे मुए…एक किलो लड्डू पैक कर जल्दी…बकर – बकर न कर।

मुन्ने के पाँच महीने तो सुख से ईश्वर का नाम आराधते हुए बीत गए थे। प्रार्थना अनवरत जारी थी। पर अब जब केवल चार महीने का तप और बचा था कि अचानक एक रात सिसकियों की आवाज से वह चौंक उठा। अब सिसकियों की आवाजें बढ़ रहीं थीं। मुन्ना भय से कांप गया था और मन किसी अनहोनी की आशंका से ग्रसित हो उठा था।

जब तक कि कुछ समझता, किसी दूसरे के सुबकने की आवाज भी सुनाई देने लगी। इसी बीच किसी की दर्द भरी कराहटें सुनाई दीं और उसकी बन्द आँखों से ही अश्रुधारा बह चली। काफी देर बाद हिम्मत करके मन ही मन पूछा कि आप लोग कौन हैं, क्या हुआ है?

हम तीनों तुम्हारी बड़ी बहनें हैं। हम सब तुमसे पहले घर पहुँच कर तुम्हारा स्वागत करने वालीं थीं। तुम्हें गोद में खिलाने वालीं थीं। तुम पर अपनी सारी दुनिया न्यौछावर करने वालीं थीं…पर ऐसा हो न सका…डाक्टर आँटी के नुकीले औजारों ने हमारे अविकसित बदन को क्षत- विक्षत करके हमें मार डाला।

मुन्ने की समझ से बाहर था कि की माँ – बाप तो अपनी संतान की रक्षा के लिए पूरे संसार से भिड़ जाते हैं, फिर मेरी बहनों को क्यों नहीं बचाया?

हमें माफ कर दो भईया, हम तो तुम पर अपना प्यार लुटाने आईं थीं, पर तुम्हें सामने पाकर बर्दाश्त न कर सकीं। अपना दुखड़ा तुम्हें सुना दिया और तुम्हें परेशान कर दिया। तुम सदा खुश रहना और माँ – बाप की सेवा करते रहना। हम भले ही तुम्हारे साथ संसार में न रह पाएंगी तो क्या, हमारा प्यार और आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा। सदा खुश रहो, अलविदा।

मुन्ने के आने में अब अधिक समय नहीं बचा था, इसलिये पूरे जोर – शोर से स्वागत की तैयारियां चल रहीं थीं। पूरे घर का रंग – रोगन हो चुका था। झाड़ – फानूस से घर को सजाया जा रहा था। बरामदे के बीचोंबीच सुंदर सा झूला लटका दिया गया था। छोटे – छोटे कपड़े बनाने शुरू कर दिए गए थे। पूरा घर खिलौनों से भर गया था। भव्य भोज के आयोजन की पूरी तैयारी चल रही थी…आखिरकार बात छोटी थोड़ी न थी…इतने लम्बे इंतजार के बाद लड़का जो होने वाला था…।

मुन्ने का मन उद्विग्न हो चला था। वह अपनी बड़ी बहनों की हत्या का कलंक अपने माथे पर लेकर जिंदगी नहीं जीना चाहता था। अब वह इस स्वार्थी दुनिया में हत्यारों के परिवार का अंग नहीं बनना चाहता था। उसका स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरने लगा था।

बड़े – बड़े डॉक्टरों को दिखा दिया गया था। सारी कोशिशें बेकार होती नजर आतीं थीं।

मुन्ने की प्रार्थना छूट चुकी थी, नींद टूट चुकी थी। जिस कोमल हृदय की धड़कनों से पूरा घर धड़कने वाला था, उसी हृदय को आघात पहुंच रहा था। कोमल मस्तिष्क की कोमल नसों में रक्त जमना शुरू हो रहा था।

अब बहू को कोई हलचल महसूस ही न होती थी। अब तो हिलता – डुलता भी न था, न ही लात मारता था। एक ही जगह भार रखा महसूस होता था।

आज तो जैसे भूकंप आ गया हो, धरती फट गई हो। पूरे मोहल्ले में कोहराम मचा हुआ था।

बलि प्रथा रोकने के लिए मुन्ना ने स्वयं की ही बलि दे दी थी।


अगर यह कहानी जरा सी भी आप के दिल को छूती महसूस हो रही है तो आप अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें,धन्यवाद। जसविंदर सिंह, हिमाचल प्रदेश

23 thoughts on ““बलि” (Sacrifice)

  1. So kyon manda aakhiye jit jammeh raajaan arthaat…usko bura kaisye keh saktye hain jo raja maharaja ko janam deti hai… Hirdye ko chhu gai aap ki kahani👌🏻👌🏻💐💐💐💐💕

    Liked by 1 person

  2. बेटियां हैं मान, बेटियां अभिमान,
    बन्द हो यह कुप्रथा, बेटियां देश की शान

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s