“विश्वास” (Belief)

चिकित्सा पद्धतियां चाहे जो भी हों, सबका अपना-अपना महत्त्व है। देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप जो उपलब्ध हों, वह अच्छी हैं। पर आयुर्वेद से तो हमारा अटूट संबंध पैदा होने से लेकर मृत्यु तक है, जैसे भोजन में प्रयोग होने वाले सभी मसालों का अपना-अपना बहुमूल्य स्वाद भी होता है और औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। इसी आयुर्वेद पर आधारित एक छोटी सी कहानी का आनंद लीजिए।
Every branch of medical pathy has an important role in itself. Those available according to place, time, situation are good. But our unbreakable relationship with Ayurveda is from birth to death, just like all the spices used in food, have their own precious taste and are also rich in medicinal properties. Enjoy a short story based on the Ayurveda.

हिमाचल के वह सुदूर का वह कस्बा मनोरम दृश्यों से सुशोभित था। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, चीड़ के बड़े-बड़े पेड़ तारपीन का तेल और गन्धविरोजा गोंद जैसी अमूल्य सौगातों को अपने भीतर सहेजे हुए जरा सी हवा चलने भी पर झूम उठते थे।

कभी तो वहाँ हरियाली ही हरियाली रही होगी, यह तो धीरे-धीरे घाटियों को साफ करके लोग बसते चले गए थे और अब तो यह भी न मालूम था कि सबसे पहले कौन आया था।

निशानी थी अगर कोई सबसे पुरानी तो वह थे अपने वैद्य रामदयाल जी। चट्टान काटकर बनाई गई तीन-चार बड़ी-बड़ी सीढ़ियां चढ़ कर सामने ही तो उनका हरियाली से भरा हुआ घर नजर आता था। न जाने क्या-क्या जड़ी-बूटियां लगा रखीं थीं उन्होंने। दिन भर कुछ न कुछ सुखाया पीसा करते थे।

गुलेरिया जी की पोस्टिंग संयोग से उस छोटे से कस्बे में हो गई थी। बड़े विद्वान थे वह। शहर के प्रबुद्ध वर्ग में गिने जाते थे। बड़े-बड़े डॉक्टरों से दोस्ती होने के कारण दवाओं का भी अच्छा खासा ज्ञान हो गया था।

कहाँ बड़े-बड़े शहरों में रहे और कहाँ वह छोटा सा कस्बा। सुविधाएं कम ही थीं वहां पर। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर एक छोटा सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था। डाक्टर कमोवेश ही मिलते थे…फार्मासिस्ट ही डॉक्टर थे।

खाने-पीने के शौकीन होने के कारण गुलेरिया जी का पेट अक्सर गड़बड़ ही रहता था। चूँकि जानकारी इतनी अधिक थी कि स्वयंमेव ही मेडिकल स्टोर से दवाएं ले लेते थे।

कितनी तेज झिड़का था उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारी को, जिसने उन्हें एक बार रामलाल जी से सलाह लेने की बात कर दी थी। एलोपैथी पे गर्व ही इतना था कि उनके सामने किसी और पैथी की बात आते ही बिफर जाते।

रात में पार्टी बड़ी जोर-शोर से चल रही थी। ऊपर पहाड़ी पर जाती सड़क के साथ लगती उनके सहकर्मी के घर की छत मीठे-मीठे पहाड़ी गानों से गूंज रही थी। लाईट्स आसपास के नजारों को और भी खूबसूरत बना रहीं थीं।

एक तो देर से पकती हुई पहाड़ी कढ़ी, दाल मखानी और ऊपर से मुरमुरी तंदूरी रोटियां। मंद बयार खाने की खुशबू को बढ़ा रही थी। साहब के लिए विशेष खान-पान का इंतजाम भी था, जिसका इतने दिनों बाद जम के मजा लिया था उन्होंने।

बड़े साहब अभी तक नहीं आए…जा के देखो तो उनके क्वार्टर में…सब ठीक तो है न…रात देर बहुत हो गई थी।


साहब, बड़े साहब तो पेट दर्द और सर दर्द से कराह रहे हैं, जल्दी चलिए…


हम शहर कैसे जा सकते हैं…सुबह हुई लैंड स्लाइड से सड़क तो बंद हो गई है…

मैं जितना ट्रीटमेंट कर सकता था, कर दिया…अब यह केस मेरे बस का नहीं… मेरी सलाह मानिए तो एक बार वैद्य जी के पास ले जाइए…फार्मासिस्ट ने सलाह दी।

रामदयाल जी तो थे ही दयालुता की प्रतिमूर्ति। बड़े जतन से दवाईयां तैयार कर कुछ बूंदें नाक में डालीं, कुछ मुंह में और न जाने क्या लेप सा लगाया था पेट पर।

शाम होते-होते गुलेरिया जी की कराहटें बन्द हो गईं। पेट की अकड़न और सरदर्द तो मानो छूमंतर ही हो गया था।

होश आते ही गुलेरिया जी ने पूछा, मैं किस नर्सिंग होम में हूँ…मैं उन डॉक्टरों को धन्यवाद कहना चाहता हूँ जिन्होंने मेरी जान बचा ली…

वैद्य रामलाल जी ने मुस्कुराते हुए उन्हें कम बोलने का इशारा किया और थोड़ा सा बाहर टहल के आने की सलाह दी।

गुलेरिया जी का दिल तो मानने को तैयार ही न था कि किसी और पैथी में भी इतनी सामर्थ्य हो सकती है कि इंसान की जान बच जाए।


पर कुछ तो ऐसा चुम्बकीय आकर्षण था वैद्य जी के शब्दों में कि न चाहते हुए भी उनको वैद्य जी का सानिध्य भाने लगा था और धीरे-धीरे यह समझ आना शुरू हो गया था कि कब क्या खाएं, क्या न खाएं और कितनी मात्रा में खाएं।

अब एलोपैथी के साथ-साथ वह आयुर्वेद के महत्व को भी जान चुके थे और वैद्य रामलाल जी ही अब उनके लिए सबसे बड़े डॉक्टर थे।


Need your valuable comments in ‘leave a comment’ box and please don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh, HP

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