“कहां है’ Where’s God “यहीं है” God is here

जिस प्रकार मृग अपनी ही कस्तूरी की सुगंध से आकर्षित होकर उसे हर कहीं ढूंढता फिरता है। इसी प्रकार हम स्वयं के भीतर प्रकाशित परम प्रकाश को निज घट में न झांक कर दसों दिशाओं में खोजते रहते हैं परंतु सही मार्गदर्शक के मिलते ही स्वयंमेव ही उस दिव्य प्रकाश की अनुभूति होने लगती है…इसी पर आधारित कविता प्रश्नोत्तर के रूप में प्रस्तुत है।
Just as an antelope is fascinated by its musk scent, he searches everywhere. In the same way, we do not see the divine light within us and search everywhere but as soon as the right guide is found, we begin to feel almighty within ourselves… This verse is based on this Q&A.

“कहां है” Where’s God देखता मैं सोचता,
कहां पे है,
किधर में है,
नहीं पता तेरा पता,
बता दे राह,
जिधर भी है,
तड़प रहा बिलख रहा,
मचल रहा यह दिल मेरा,
पूछा इससे पूछा उससे,
और न जाने किससे किससे,
उसी का तूं दे दे पता,
जिसे तेरा पता भी है।

“यहीं है” God is here
इधर भी है,
उधर भी है,
देखो जिधर,
वहीं पे है,
जमीं पे है,
जहां में है,
यहां भी है,
वहां भी है,
जब जिधर नजर पड़े,
वहीं पे है,
वहां पे है,
श्वांसों में है,
धड़कन में है,
इस पल में है,
इस क्षण में है,
रुक देख तनिक
स्वयं को ही,
वह तो तेरे
ह्रदय में है।


Please share and subscribe http://www.keyofallsecret.com Regards, Jasvinder Singh

4 thoughts on ““कहां है’ Where’s God “यहीं है” God is here

  1. सत्यवचन। मनुष्य अपने ह्रदय में न झांक कर इधर उधर ईश्वर को खोजता रहता है। अंतरात्मा को झझकोरने वाली पंक्तियाँ हैं आपकी इस रचना में।

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