“भोर” (Dawn)

सुबह सवेरे उठ के जो ताजगी महसूस होती है, उसका एहसास दिन भर रहता है। इसके उलट देर तक सोने से तन और मन दोनों में ही कुंठा और मनहूसियत बनी रहती है। आईये, आज से ही इस भोर का आनंद लेने का प्रण करते हैं।
The freshness that one feels after waking up in the morning remains the whole day. In contrast, late waking caused frustration both in body and mind remain for long. Come, let’s vow to enjoy this dawn from today itself.

भोर की वेला कितनी प्यारी,
कलरव करतीं चिड़ियां सारी,
खिलें पुष्प महकाएं क्यारी,
मंद बयार लगे अति न्यारी,
सूर्य प्रभा नित स्वर्ण सी चमके,
मैं क्यों न हो जाऊं वारी,
सात पहर हैं एक ओर,
चतुर्थ पहर है सब पे भारी,
जो कोई वेला उठे भोर की,
जिंदगी उसी ने है संवारी,
चित्त प्रसन्न रहे दिन भर ही,
बीमारी सब जाए मारी,
चल उठ जाग,
त्याग निंद्रा को,
कर ले खुशियों से तूं यारी।


Let’s share this positive and motivational poem with everyone… Regards, Jasvinder Singh

16 thoughts on ““भोर” (Dawn)

  1. उठ जाग मुसाफिर भोर भई,अब रैन कहाँ जो सोवत है
    जो सोवत है सो खोवत है
    जो जागत है सो पावत है।

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  2. Amrit wele bolya babiha ta dar suni pukaar……Guru ke pyarye bhagat jan amrit wela me jaag kar parmatma ko yaad kartye hain….Aap jo bhi likhtye hain us me parmatma jikar jaroor hota hai.💐💐💐💐💐God bless u💐💐💐💐💐

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