“तरंग” Positive Waves

निराशा हमें अवसाद के पाताल में खींच कर ले जाती है…जिससे आने वाले समय में हम कहीं के नहीं रह पाते। समय रहते ही सुचेत हो के नई ऊर्जा के साथ फिर से जुट जाने से सफलता की तरंगें स्वयंमेव ही उठने लगतीं हैं।

मन दबा दबा कुचला सहमा,
डरा डरा सा क्यों है,
अलसाया मुरझाया,
सकुचाया सा क्यों है,
लुका छिपा सा यूं,
गिरा पड़ा क्यों है,
क्या है टीस दिल में,
जुबां दबी क्यों है,
पलकें हुईं हैं बोझिल,
सूखे होंठ क्यों हैं,
माथे पे हैं लकीरें,
ग्रीवा झुकी क्यों है,
तूं इतने दिनों से पीछे,
सहमा सा खड़ा क्यों है,
न कर स्वीकार हार को,
हार अभी तो हुई नहीं है,
देख खुशी से भीतर अपने,
अभी तो सुबह हुई नई है,
न छोड़ दामन आशाओं का,
अभी तो आशा जगी नई है,
छोड़ दे आहें खोल ले बाहें,
अभी तो किरणें खिली नई हैं,
छेड़ दी वीणा मन के भीतर,
अभी तरंगे उठी नई हैं।


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11 thoughts on ““तरंग” Positive Waves

  1. Nar ho na nirash karo man ko kuch kaam karo kuch kaam karo…………Nai nai umangon ka sanchaar kartye rahye khushiyon ki tarangye khud hi aa……..👍🏼👍🏼💐💐💐💐💐💕

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