सांझ की सुबह Dawn of Dusk

सांझ को दिल थोड़ा घबराया,
पड़ा सोच – कुछ समझ न आया,
कुछ हल्का सा पीया – खाया,
कुछ पढ़ा – सुना – कुछ गुनगुनाया,
पर अनमने मन को रास न आया,
युक्ति हुई न कोई कारगर,
दिल को अपने डूबता पाया,
सब बात भुला – करके साहस,
जोर लगा के भीतर मन का,
परदा सांझ का जरा उठाया,
था घोर अंधेरा – दिखता न था,
मीलों घण्टों खुद को भटकाया,
चूर हुआ पर हार न मानी,
मद्धिम प्रकाश नजर था आया,
रात्रि कालिमा भंग हो गई,
फटी पौ – सूरज चढ़ आया,
अब जान लिया था मैने भी,
सांझ को दिल था क्यों घबराया,
बिछड़ के अपने ही प्रकाश से,
सुख और किसी में नहीं था आया,
पर उस सांझ का अंत मधुर था,
अब था मुझको समझ में आया।


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