अपना पराया

जीवन भर हम लोगों को परखते ही रह जाते हैं कि यह अपना है या पराया…यहां अपने पराये और पराये अपने बन मिलते –  बिछड़ते रहते हैं। यहां तो हरदम संग चलने वाला दम भी अंत मे पराया हो जाता है…

कोई कहे अपना – कोई पराया,
किसी को कुछ भी समझ न आया,
सब कोई कर्म है अपना लाया,
भोग के हर कोई जग से जाया,
किसको कहें यह है मेरा अपना,
नहीं अपना – अपना ही साया,
जब जन्मा था – हाथ था खाली,
जो पाया सब छोड़ के जाया,
मिले जो संगी – साथी जग में,
अंत में संग न कोई जाया,
सुख में गुड़ में चींटे बन चिपके,
दुख में नजर न कोई आया,
ढूंढे बहुत सहारे व्यर्थ ही,
अंत सहारा भीतर पाया,
अपना हमदम अपने भीतर,
अंतिम दम तक साथ निभाया।


उलझन Confusion

हम अक्सर इन्हीं उलझनों से घिरे रहकर परेशान और उदास रहते हैं कि संसार में वह ऐसा क्यों है और मैं…जिस दिन यह सब छोड़कर हम सत्कर्मों में लग जाते हैं, उसी दिन से उलझनों की गांठे सुलझना शुरू हो जातीं हैं…
We are often troubled and sad by being surrounded by these confusions that why every person and personality is so different…The day we leave all this and engage in good deeds, from that day the knots of confusion start to unravel.

सबकी अपनी अपनी बुद्धि,
सबके पास है अपना मन,
कोई तरसे दाने दाने को,
किसी के घर है धन ही धन,
कोई कलूटा काला बदसूरत,
किसी का स्वर्ण सा दमके तन,
किसी के मुख से झड़ते फूल,
कोई फुंफकारे काढ़ के फन,
कोई फाड़े कपड़े सबके,
कोई सबके लिए सज्जन,
सबके अपने कर्म – अपना स्वभाव,
छोड़ दे तूं सारी उलझन,
कर सत्कर्म – बन पावन – तप के,
सदा नहीं रहता जीवन।


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दो अक्टूबर

दो अक्तूबर को भारत में,
दो सुगंधित फूल खिले,
पर जीवन भर राहों में,
कांटें ही उनको बिछे मिले,
विपरीत परिस्थितियों में ही,
वह जीवन भर घिरे रहे,
पर कभी उन्होंने हार न मानी,
संघर्षों में लगे रहे,
बापू का स्वदेशी का नारा गूंजा,
जब चरखे का चक्र चला,
हर इक जन तक खादी पहुंचा,
और विदेशी वस्त्र जला,
जय जवान जय किसान कहा
शास्त्री जी ने,
किसानों का उचित सम्मान किया,
उनके पराक्रम के चलते सेना ने,
पाकिस्तान परास्त किया,
आओ हम भी लग जाएं,
उनके सपने सच करने में,
रंगें देशभक्ति में खुद को,
जुट जाएं देश को विकसित करने में,
जल-थल-वायु करें साफ,
स्वच्छ भारत का लें संकल्प,
स्वस्थ तन-मन रखने में,
स्वच्छता का नहीं है कोई विकल्प,
अब लग जाएं हम स्वच्छता में,
आभा से हर कोना दमके,
छा जाएं जग के नभ पे,
बन के सूरज भारत चमके ।


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हिंदी Hindi

भारतीय संस्कृति थी विश्व में फैली,
संस्कृत ही प्रथम भाषा थी,
हिंदी इसकी मुंहबोली बेटी थी,
और भारत की परिभाषा थी,
इस पर काले बादल छाए,
घनघोर विष की वर्षा लाए,
अरबी फारसी उर्दू आदि ने,
इस पर गहरा आघात किया,
अंगेजों की अंग्रेजी ने,
इसको लगभग समाप्त किया,
पर विद्वानों ने अनवरत,
इसका भी उपचार किया,
लेकर इसको साथ चले,
फिर से इसका प्रचार हुआ,
राग छुपे हैं इसमें सारे,
इसमें छुपा समस्त संगीत,
नहीं है बनता इसके बिन,
सुगम मनोहर कोई गीत,
जन जन के प्राणों में बसती,
साहित्यकारों की है मीत,
इक दिन ऐसा आएगा फिर से,
यह विश्व पटल पर छाएगी,
भारत होगा विश्व गुरु,
विश्व भाषा हिंदी कहलाएगी,
हिंदी ही बोली जाएगी,
हिंदी ही बोली जाएगी।


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मानसिक आजादी Mental Freedom

आजाद होते हुए भी हम कहीं न कहीं से विदेशी संस्कृतियों के जाल में फंसे हुए हैं। वह हमारी पवित्र पुरातन संस्कृति को तेजी से अपना रहे हैं और हम उनकी। इस जाल को काटकर हमें मानसिक रूप से स्वतंत्र होना होगा।

तोड़ गुलामी की जंजीरें,
आजादी की अलख जगाई,
देश – कौम के मतवालों ने,
अपनी – अपनी बली चढ़ाई,
वर्तमान हम गौर से देखें,
आजाद नहीं हैं आज भी हम,
पाश्चात्य संस्कृति सर चढ़ बोले,
अपना सब कुछ भूल गए हम,
कभी हुआ करता था भारत,
आज अभी से दो गुना,
कितना कुछ छिन गया है हमसे,
अब हो गया यह बौना,
ज्ञान समस्त लेकर हमसे ही,
पश्चिम आगे और बढ़ा,
हमसे ही सब छीन- छान कर,
उन्नति के शिखर पे जा चढ़ा,
दे अपनी भौंडी असभ्यता,
नव पीढ़ी को बर्बाद किया,
संस्कृति सभ्यता ले भारत की,
ह्रदय से अंगीकार किया,
अब भी समय है चेत जाओ,
तोड़ गुलामी की जंजीरें मन से,
नवयुग का निर्माण करो,
स्वयं को आजाद करो।।


चलते रहिए Keep going

हम अपनी जिंदगी में कितनी ही हद तक परेशान भले ही क्यों न हो जाएं, गमों के बोझ तले भले कितना ही क्यों न दब जाएं। पूरी हिम्मत से फिर से आगे बढ़ने पर कामयाबी जरूर मिलती है।
Even if we get disturbed to some extent in our life, no matter how much we get buried under the burden of sorrows. Success is definitely achieved if you move forward again with full courage.

दिल में जले चिराग को,
बुझने न दीजिए,
जिंदगी को खुद पे बोझ,
बनने न दीजिए,
जमाने की ठोकरों से,
लड़खड़ा भले ही जाईए,
बुरे वक्त के दरिया में,
डूबीए – उतराईए,
उठिए…हिम्मत तो कीजिए,
खुद को सम्भालिए,
चलने से ही तो है जिंदगी,
कदम बढ़ाईए,
चलना न कम कीजिए,
चलते ही जाईए,
जिस्म तो है एक जरिया,
केवल इसे न देखिए,
ताकत का जरिया तो है रूह,
रूह में उतर के तो देखिए,
आगे है रोशन राह,
आगे चल के तो देखिए।


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भेषधारी

झूठे भेषधारी जनता को बेवकूफ बनाकर अपनी झोलियां तो भर सकते हैं पर भीतर से वह भी भयभीत ही रहते हैं… वहीं सच्चे संत सच की राह पर चलकर अपने प्रभु संग आनंदित रहते हैं।

जिसने पहना कपड़ा बढ़िया,
वही हो गया संत,
पता नहीं है चाहे उसको,
मिलता कैसे कंत,
करे कर्म कृतघ्न वाले,
रहता सदा ही जंत,
मन भर के वह भोग करे,
भोगे भोग अनंत,
नहीं जानता अपने बारे,
कब हो जाएगा अंत,
बक्के बक बक दे उपदेश,
होत नहीं करमवंत,
लूटे जन को धर्म नाम पे,
होत जाए धनवंत,
रखे चाहे भेष अनेकों
नहीं बनता पतवंत,
होता मिलन उसी का प्यारे,
जो होता सतवंत।


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जागो Wake up

हमारी पूरी जिंदगी जोड़ – घटाव यानी सुख का पीछा करने में ही बीत जाती है और हम असली सुख देने वाले को बिसारते रहते हैं, परन्तु सोते से जागने और सच्चे सुख को पाने की शुरुआत कभी भी हो सकती है।

उम्र बढ़ती रही,
मैं बिगड़ता रहा,
लालसा बढ़ती रही,
मैं बढ़ाता रहा,
मासूमियत छोड़ कर,
वह बचपन की,
जवानी में गोते लगाता रहा,
मैं जोड़ता रहा,
तमाम उम्र बहुत कुछ,
पर अनमोल सांसें गंवाता रहा,
मैं समझता रहा,
गहरे समंदर में खुद को,
पर कीचड़ में खुद को लिपटाता रहा,
दुनिया को हर पल निहारा किया,
पर खुद से ही,
नजरें चुराता रहा,
जो न करना था,
वह ही किया उम्र भर,
जो था करना,
उसी से किनारा मैं करता रहा,
गर अब भी जाग जाऊं,
सोते से आज भी,
मिलेगा वह जो,
हर क्षण है,
दिल में धड़कता रहा।


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बीज Seed

पृथ्वी पर हरियाली का आरंभ होने से पहले धरती में बीज कहां से आए, यह एक परम् आश्चर्य है एवं उन लघु बीजों के भीतर में कौन सी शक्ति छुपी बैठी है जो समय आने पर इतना विशाल रूप धारण करके सबकी पालना करती है।
Before the beginning of greenery on earth, where did the seeds come from in the earth, it is a great wonder and what power is hidden among those small seeds, which when the time comes, takes such a huge form and sustains everyone.

बीज हैं आते पौधों से,
पौधे हैं आते बीजों से,
यह क्रम यूं ही चलता रहता है,
न जाने कितने युग से,
नहीं है कोई जान सका,
आए यह बीज कहां से,
क्या पहले से ही थे ढेरों,
या आए हैं उस एक से,
आरंभ हुआ है जीवन का,
इन अनगिनत बीजों से,
देते जीवन जीवों को,
बन फूल – फसल – फल – सब्जी से,
शुद्ध वायु – लकड़ी देते,
अपनी पावन हरियाली से,
होता आश्चर्य कैसे बनता,
वृक्ष विशाल लघु बीजों से,
लग जाते नव निर्माण में,
ज्यों ही मिलते धरती मां से,
नमन उसे जो देता शक्ति,
बीजों को भीतर से।


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मैं रहता हूँ उस देश में

मैं रहता हूँ उस देश में,
जहाँ नानक की भक्ति है,
गुरु गोबिंद की शक्ति है,
जहाँ धर्म की आन की खातिर,
शीश लुटाए जाते हैं,
जहाँ पे मांओं के बच्चे,
चक्की में पिसाए जाते हैं,
जहाँ पे नन्हे नन्हे प्राण,
भालों पे नचाए जाते हैं,
जहाँ फतेह जोरावर सिंह,
दीवारों में चिनाए जाते हैं,
जहाँ गुरु अर्जुन देव जी,
अंगारों पे बिठाए जाते हैं,
जहाँ पे भाई मतीदास,
आरों पे चढ़ाए जाते हैं,
जहाँ पे भाई मनी सिंह,
अंग-अंग कटवाए जाते हैं,
जहाँ चांदनी चौक में गुरु,
शीश लुटाए जाते हैं,
जहाँ गीदड़ से परिवर्तित कर,
सिंह सजाए जाते हैं,
जहाँ पे सन्तों के द्वारा,
भगवान मिलाए जाते हैं,
हाँ, मैं रहता हूँ उस देश में।


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आज विश्व पर्यावरण दिवस (5th June 2021) के अवसर पर नालागढ़ साहित्य कला मंच की online कवि गोष्ठी में भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि श्री यशुदीप सिंह जी (DFO) और विशिष्ट अतिथि श्री बलबीर भारद्वाज जी (APRO) थे। सभी प्रबुद्ध साहित्यकारों की पर्यावरण पर आधारित रचनाएं सराहनीय थीं।

काश

“विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष” कभी – कभी लगता है कि हमारी पृथ्वी जैसी थी, वैसी ही शुद्ध फिर से हो जाए। परन्तु इसके लिए सभी को अपने – अपने स्थान पर इसके लिए विशेष प्रयत्न करने होंगे।

जब हम न थे – जब तुम न थे,
जब धरा हरी और भरी सी थी,
कितना जल था – कितनी प्रकृति,
ऊंचे पर्वत – गहरे समुंद्र,
सारी नदियां कल – कल करतीं,
चहुं ओर थे वन – हरियाली थी,
न नगर ही थे – न डगर ही थे,
न सीमा थी – न देश ही थे,
वर्षा सिंचित करती रहती,
मिट्टी सारी सोंधी सी थी,
न गैसें थीं – न प्रदूषण,
था पवित्र वातावरण,
काश – अब भी ऐसा हो जाए,
यह मानवता संभल जाए,
लोलुपता सब मिट जाए,
यह वन संपदा बढ़ जाए,
शुद्ध पवन चहुं ओर बहे,
सब महामारियां मिट जाएं,
हर मन में निश्चय हो जाए,
हर घर में पौधे लग जाएं,
घर – घर हरियाली लहराए,
स्वर्ग सी पृथ्वी हो जाए,
सबके मन फिर से खिल जाएं।


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समय Time

समय को समझने के लिए व्यक्ति को समय में खो जाना पड़ता है…
One has to be lost itself into time to understand time….

अनंत काल से अनंत काल तक,
घण्टा समय का बज रहा है,
न जाने किस घड़ी – किस क्षण से,
चक्का इसका चल रहा है,
एक से लेकर बारह तक यह,
लगा के चक्कर घूम रहा है,
कभी न रुकता – कभी न थमता,
अद्भुत शक्ति से भरा हुआ है,
पैदा किया है इसने हर क्षण,
हर युग में मौजूद रहा है,
नहीं है गणना इसकी कोई,
कब से चक्र यह घूम रहा है,
कहीं न आता – कहीं न जाता,
पर हर कहीं यह देख रहा है,
सभी हैं निकले इसमें से ही,
सब कुछ इसी में सिमट रहा है,
समय बड़ा बलवान है – सच है,
समय पे सब कुछ घट रहा है,
झांकें इसमें ज्योतिष – गणितज्ञ,
हर विषय इसी से निकल रहा है,
जिसने जान लिया है इसको,
वही ज्ञान को प्राप्त हुआ है।


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समय Time

समय को समझने के लिए व्यक्ति को समय में खो जाना पड़ता है…
One has to be lost itself into time to understand time….

अनंत काल से अनंत काल तक,
घण्टा समय का बज रहा है,
न जाने किस घड़ी – किस क्षण से,
चक्का इसका चल रहा है,
एक से लेकर बारह तक यह,
लगा के चक्कर घूम रहा है,
कभी न रुकता – कभी न थमता,
अद्भुत शक्ति से भरा हुआ है,
पैदा किया है इसने हर क्षण,
हर युग में मौजूद रहा है,
नहीं है गणना इसकी कोई,
कब से चक्र यह घूम रहा है,
कहीं न आता – कहीं न जाता,
पर हर कहीं यह देख रहा है,
सभी हैं निकले इसमें से ही,
सब कुछ इसी में सिमट रहा है,
समय बड़ा बलवान है – सच है,
समय पे सब कुछ घट रहा है,
झांकें इसमें ज्योतिष – गणितज्ञ,
हर विषय इसी से निकल रहा है,
जिसने जान लिया है इसको,
वही ज्ञान को प्राप्त हुआ है।


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सांझ की सुबह Dawn of Dusk

सांझ को दिल थोड़ा घबराया,
पड़ा सोच – कुछ समझ न आया,
कुछ हल्का सा पीया – खाया,
कुछ पढ़ा – सुना – कुछ गुनगुनाया,
पर अनमने मन को रास न आया,
युक्ति हुई न कोई कारगर,
दिल को अपने डूबता पाया,
सब बात भुला – करके साहस,
जोर लगा के भीतर मन का,
परदा सांझ का जरा उठाया,
था घोर अंधेरा – दिखता न था,
मीलों घण्टों खुद को भटकाया,
चूर हुआ पर हार न मानी,
मद्धिम प्रकाश नजर था आया,
रात्रि कालिमा भंग हो गई,
फटी पौ – सूरज चढ़ आया,
अब जान लिया था मैने भी,
सांझ को दिल था क्यों घबराया,
बिछड़ के अपने ही प्रकाश से,
सुख और किसी में नहीं था आया,
पर उस सांझ का अंत मधुर था,
अब था मुझको समझ में आया।


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तुलना Comparison

वैसे तो मनुष्य का स्वभाव आरम्भ से ही दूसरों से अपनी तुलना करने का रहा है। वह या तो दूसरे से श्रेष्ठ बनना चाहता है या दूसरे को श्रेष्ठ बनते देखते हुए देख कर मन ही मन कुढ़ता है।
पर जो दूसरों से अपनी तुलना नहीं करता…वास्तव में वही श्रेष्ठ होता है।
From the very beginning human nature has been to compare himself with others. He either wants to be superior to the other, or seeing the other becoming superior, he become upset.
But the one who does not compare himself to others … Actually he is the best.

आजकल तो जिसको देखो,
तुलना करने बैठा है,
पास में हो कुछ या न हो,
न जाने क्यों ऐंठा है,
बोले बातें ज्ञान भरी,
भीतर कितना रीता है,
हांके गप्पें बड़ी बड़ी,
समझे खुद को नेता है,
करता अभिनय बात बात में,
जैसे कि अभिनेता है,
देख सफलता औरों की,
मन ही मन में जलता है,
मटमैला मन सना मैल से,
एकाकी में रोता है,
रख के भीतर बुरे विचार,
ऊपर तन को धोता है,
छोड़ दे ईर्ष्या,
कर मत कुंठा,
काहे विष को पीता है,
भंवर जाल में फंस के इसके,
बारम्बार जन्मता है,
कर सन्तोष उसी में प्यारे,
जितनी तेरी क्षमता है,
मान उसी में सुख
जितनी कि,
आवश्यक आवश्यकता है,
पर सुख देखन छोड़ के भाई,
कर सन्तोष जो लेता है,
देता भगवन उसी को प्यारे,
जो सम भाव से रहता है।


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अंतर् दर्शन

ईश्वर के पावन स्वरूप का सम्पूर्ण वर्णन न ही कोई पुस्तक कर सकती है और न ही कोई मनुष्य, चाहे उसने दर्शन पा भी लिए हों। और अपने भीतर उसी को उनके पवित्र दर्शन हो सकते हैं, जिसने स्वयं को ईश्वर के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया हो।

अर्धचन्द्र
संग बिन्दी मस्तक,
देख हुआ
सब जग नतमस्तक,
दमके तेज
तुम्हारा ऐसा,
नेत्र हुए
जाते हैं चकमक,
लगा रहे जो
केवल तुझमें,
नहीं दिखा है
कोई अब तक,
कोई विरला
होता जग में,
जिसके द्वार
तू देता दस्तक,
नहीं समझ पाता है
तुझको,
लगा के बुद्धि
कोई विचारक,
वर्णन करे
समूचा तेरा,
नहीं है ऐसी
कोई पुस्तक,
वर्णन तेरे
अंतर् दर्शन का,
नहीं है आता
किसी के लब तक,
कृपा करे अपनी
जिस ऊपर,
केवल वही है
पहुंचे तुझ तक,
करो कृपा हे नाथ
अब मुझ पर,
द्वार खड़ा है
तुमरा बालक,
हे दीन दयाल
अनाथ के नाथ,
तुम स्वामी
मैं तुमरा सेवक।


कृपया मेरी वेबसाईट पे विजिट करके मुझे प्रोत्साहित करें…धन्यवाद http://www.keyofallsecret.com

लौट आ ऐ बचपन

होश संभालने के बाद से लेकर जब तक हम मासूम रहते हैं…वह अवस्था कितनी अच्छी होती है…वह समय कितना मधुर होता है…जैसे जैसे समझ बढ़ती जाती है, उस मधुरता का रस भी सूखने लगता है। काश, फिर से वही निस्वार्थ मस्ती भरा बचपन फिर से लौट आए…

ऐ बचपन तू लौट के आ,
जब मिलजुल के सब रहते थे,
अपना भी था परिवार बड़ा,
फूल खुशी के खिलते थे,
न कोई किसी की भाभी थी,
न कोई किसी का देवर था,
न किसी से कोई रंजिश थी,
न किसी के मुख पे तेवर था,
न जीजा थे न साली थी,
न घरवाली मतवाली थी,
दादा दादी की पलकों की,
छांव खूब घनेरी थी,
रोज कथा कहानी सुनते,
पलकों की छांव में रहते थे,
खुशी गमीं के मौकों पर,
रिश्तेदार जो आते थे,
हिस्सा बन कर हम सबका,
परिवार में ही घुल जाते थे,
पापा की आंखों के डर से,
अनुशासन में सब रहते थे,
मम्मी की लाड लडैया में,
छोटे सपने सच होते थे,
भईया दीदी की पकड़ के उंगली,
मेले में घूम के आते थे,
लड़ते भी थे भिड़ते भी थे,
पर अंत में भूल सब जाते थे,
हर शाम मोहल्ले के बच्चों संग,
खूब मस्तियां करते थे,
हर खेल को खेला करते थे,
कपड़े मिट्टी में सनते थे,
न ट्यूशन थी न लेक्चर था,
न ऑनलाइन का चक्कर था,
गाढ़ी लस्सी संग मक्खन था,
शुद्ध घी और शक्कर था,
बहुत याद आती है तेरी,
असली जीवन तो तुझमें था,
ऐ बचपन फिर लौट के आ,
यौवन से तू बढ़कर था।


सांसें Breath

हम पर बड़ी मेहरबानी है कि हमें सांसों का तोहफा मिला हुआ है। इससे पहले कि यह खत्म हो जाएं, हम ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करें और सभी के लिए अपने दिल में मोहब्बत और हमदर्दी रखें।
Almighty God has given all of us precious gift in the form of breaths. We should all thank God and should keep compassion in our hearts for all beings.

वक्त का लम्हा कुछ ऐसे ही,
आगे से गुजर जाता है,
और मैं बेबस खड़ा,
बस देखता रह जाता हूँ,
जिंदगी से सांसें कुछ,
और निकल जातीं हैं,
मैं यूं ही ठगा सा,
खड़ा रह जाता हूँ,
उलटता पलटता हूँ,
ख्यालों को अपने,
अंजाने ही,
ढेरी सी लगाता चला चला जाता हूँ,
इक ख्याल को नापता हूँ,
तौलता हूँ इक को,
खुद ही उसमें उलझ पुलझ जाता हूँ,
इक ढेरी तो सिमटती नहीं,
दूजी में फिर से खो जाता हूँ,
अपनी अक्ल के घोड़ों से,
दौड़ खूब लगवाता हूँ,
जान के भी अंजान ही रहता,
समझ नहीं कुछ पाता हूँ,
जितनी बार हैं गिरतीं पलकें,
मौत को गले लगाता हूँ,
ताज्जुब होता है तब मुझको,
जब खुद को फिर से जिंदा पाता हूँ,
मोहब्बत तुम्हें भी है मुझसे,
यही कयास लगाता हूँ,
तभी तो इक के जाते ही,
दूजी सांस ले पाता हूँ।


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सत्य का दीप Lamp of Truth

यदि हमें अपने समस्त प्रारब्ध की स्मृति हो जाए तो हो सकता है कि हम लज्जा से स्वयं से ही दृष्टि न मिला पाएं। तो क्यों न हम इस बार स्वंय में सुधार लाकर अपना स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित करें।
If we get power to memorise our all previous lives, may be we become shy for our misdeed.
So why don’t we ensure our golden future by improving ourselves in this present life.

दृष्टि दर्पण से मिलाकर,
देख ले अंतर पतित,
जन्मों जन्मों का किया,
जो हो गया है विस्मृत,
स्मृत जो हो जाएगा तो,
हो जाएगा फिर लज्जित,
कर ले तौबा दुष्कर्मों से,
दिल से कर ले प्रायश्चित,
छोड़ दे लालच,
और कितना करेगा एकत्रित,
कर ले अध्ययन गहन,
विचार कर ले संकुचित,
अब न कर अपना पराया,
स्वयं में हो प्रतिष्ठित,
कर के खेती प्रेम की,
सच को कर ले अंकुरित,
तोड़ बेड़ी सीमाओं की,
कर स्वयं को असीमित,
मांज धूमिल अंतःकरण,
और कर ले उज्जवलित,
जला के दीप सत्य का,
कर ह्रदय में प्रज्ज्वलित।


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प्रेम गली Alley of Love

परम् सत्ता का कोई अलग घर नहीं है। उसके घर का रास्ता हमारे घर में ही है… आवश्यकता है तो उस गली, उस रास्ते को खोज निकालने की, जिसे सन्तों ने प्रेम का मार्ग बताया है। उसी प्रेम पथ पर अग्रसर होना ही हमारा भविष्य है।
There is no separate house of Almighty God . The way to his house is situated inside us….there is need to find that alley, that path, which is named by Saints “the path of love”. Walking on the same love path is our future.

ली तेरी मिली नही,
ढूंढती मैं थक गई,
करे जतन सारे मगर,
अंत में मैं रुक गई,
मान ली है हार मैने,
और न चल पाऊंगी,
ढूंढने तुझे बता,
अब किधर को जाऊंगी…

पगली रुक जा जरा,
मत दौड़ तू,
थम जा जरा,
न भाग तू इधर उधर,
गली गली शहर शहर,
ढूंढने से यूं मुझे,
ढूंढ न तू पाएगी,
ईंट पत्थरों के घर में,
बस भटकती जाएगी,
डुबकियां लगाएगी,
परिक्रमा को जाएगी,
घूम घूम फिर घूम के,
स्वयं को वहीं पे पाएगी,
जिस समय तू स्वयं से,
मित्रता कर पाएगी,
अपने ही संग में मुझे,
बैठा हुआ तू पाएगी,
नहीं गली मेरी कोई,
इस नगर या उस नगर,
अपनी गली में झांक ले,
मुझमें ही तू समाएगी।


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खुशियां Happiness

अक्सर हम खुशियों को बाहर ढूंढते फिरते हैं। इसमें क्षणिक खुशियां तो मिल जातीं हैं पर फिर से वही उदासी हमें घेर लेती है। जबकि इसके विपरीत खुशियां तो हमारे भीतर सदा से ही विद्यमान हैं… आवश्यकता है उन्हें भीतर से ही खोज निकालने की। प्रस्तुत है हल्के फुल्के हास्य के साथ यह कविता… Often we search happiness outside and we get success but for a short time and again the same sadness surrounds us. While on the contrary, happiness always exists within us… There is need to find it from within…Presenting poetry with light hearted humor…

आज मैने खुशियां,
ढूंढ़ने की थी ठानी,
मल्टीप्लेक्स में पिक्चर देखी,
मैने ‘राजा जानी’,
हाल में जाकर ली थी,
मैने बोतल पानी,
इतनी मंहगी पेटिस तो,
मैने नहीं थी खानी,
अनमने मन से वहाँ से,
मैने की रवानी,
घुस गया बढ़िया रेस्टोरेंट में,
जेब थी पड़ी गंवानी,
खुशियां मिलीं न मुझको,
उल्टे याद आ गई नानी,
क्यों न पार्क में,
पेड़ पे चढ़ के,
लटक के झूलूं टहनी,
ज्यों ही चढ़ के पेड़ पर मैने,
लात बढ़ा कर तानी,
गिरा जोर से धम्म से नीचे,
अब नहीं रही जवानी,
देख नजारा पास में आई,
एक बुजुर्ग परनानी,
कहां पे खुशियां ढूंढ़ रहा तूं,
कर कर के मनमानी,
वह तो तेरे भीतर ही हैं,
बाहर कहां मनानीं,
सोच ध्यान से,
खोज ले भीतर,
बन कर के तूं ज्ञानी,
तेरे ही भीतर हैं मालिक,
और है संग भवानी,
खुरच उदासी फेंक दे कूड़ा,
खुशियां स्वयं आ जानीं।


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तुम्हीं तुम हो

हम सबका का एक ही सहारा परब्रह्म पारमेश्वर हैं। सारे आसरे त्याग कर उनसे प्रेम करते ही वह हम सबको अपनी शरण में ले लेते हैं।
Hum sabka ek hi sahara Parbramha Parameshvar hain. Saare aasare tyaag kar unase prem karate hi woh hamen apni sharan mein le lete hain.

तुम्हीं तुम हो
मेरे लिए,
ब्रम्हांड में भी हो,
और पार भी हो,
सर्वज्ञ हो,
मर्मज्ञ हो,
देवी मेरी,
मेरे देव हो,
तुम्हीं तुम हो दाता मेरे,
रखवाले मेरे तुम हो,
शब्द तुम्हीं,
तुम्हीं गीत हो,
वाद्य तुम्हीं,
संगीत भी हो,
घण्टी में तुम्हीं,
बंशी में तुम हो,
डमरू में तुम्हीं,
हर नाद में तुम हो,
रागों में राग हो,
तुम्हीं बैराग्य हो,
तुम्हीं मेरी पुस्तक,
तुम्हीं मेरा ज्ञान हो,
अंखियों में सदा,
बसे तुम हो,
जिधर देखूं,
तुम्हीं तुम हो,
मेरी सदा से,
तुम्हीं प्रीत हो,
मैं खण्डों में विभाजित हुआ जा रहा,
टूटता बिखरता बहा जा रहा,
हे करुणा के सागर,
समेटो मुझे,
तुम्हीं तुम सम्पूर्ण हो,
अखण्ड हो,
तुम्हीं तुम हो,
तुम्हीं तुम हो।

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मजबूत बनो Be Strong

आजकल निराशा जीवन में पाँव पसारती जा रही है और आज का मानव सब सुख भोगते हुए भी इस गहरे दलदल में फँसता जा रहा है। इसका कारण भी वही स्वयं है और इसका निवारण भी उसी के पास है। आईए, स्वयं को जानें, अपने मन से भार उतारें और हल्के होकर स्वयं पर विजय प्राप्त करके प्रसन्नता की पवन में उड़ने का आनंद लें।
Nowadays, despair is spreading in life and the human being is getting stuck in this deep marsh even after luxry life. Only he is responcible for his depression and he have the solution to overvome this too. Come, get to know yourself, take the weight off your mind and feel lightly yourself and enjoy flying in the wind of happiness.

क्या खो गया है तेरा इतना,
जो तूं इतना रोए है,
मिला तो तुझको तब भी करता,
जब तूं चादर तान के सोए है,
चिंताओं की बांध पोटली,
सर पर अपने ढोए है,
काटे फसल वही अब जैसी,
पहले से ही बोए है,
देख ध्यान से दुनिया को,
हर पल ही यहां कोई मोए है,
रो मत संभाल श्वांसों की मटकी,
जो हर पल ही चोए है,
कर कर्म महान और सुमिर नाम,
जिसे करता विरला कोए है,
बने भविष्य उसी का उज्ज्वल,
जो हर पल मन को धोए है,
सुखी वही है इस जग में,
हर हाल में जो खुश होए है,
कर युद्ध स्वयं से जीत ले मन,
संग दुनिया तेरे होए है।


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खुदा God

अब तक मुझे दिखा नहीं,
गल्ती मेरी,
उसकी नहीं,
चिलमन है आँखों में मेरी,
वह नहीं पर्दानशीं,
गल्ती है कानों की मेरी,
अब तक सुनी न धुन बंशी,
जुदा नहीं,
खफा नहीं,
नहीं है गुमशुदा कहीं,
यूँ है तो वह हर कहीं,
अभी यहीं,
सदा यहीं,
यह रुकावट बेवजह नहीं,
इसका भी है इलाज यहीं,
मन बात करता फिर रहा,
चौबीसों घँटे लड़ रहा,
कालिख है खुद पे मल रहा,
धूल में है सन रहा,
जो देखा इसको साफ कर,
हर इक को दिल से माफ कर,
तब जाना,
के क्यूं दिखा नहीं,
अब तक मुझे खुदा कहीं,
देखा पलट के खुद को जब,
जाना के है खुदा यहीं।


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धागा Thread

यूँ तो हल्का फुल्का,
दुबला पतला मैं धागा हूँ,
फिरकी पे लिपटा रहता,
खुद में सिमटा रहता हूँ,
दूकानों पर डिब्बों के भीतर,
खड़ा पड़ा रहता हूँ,
रंग अनेकोंनेक लिए,
चहुं ओर नजर आता हूँ,
सूती रेशमी टेरीकॉट,
नाइलॉन में दिख जाता हूँ,
हर कपड़े के भीतर दिखता,
सब कुछ ढंक जाता हूँ,
नींबू मिर्चा डाल गले,
नजरबट्टू बन जाता हूँ,
भरवां सब्जी के ऊपर बंध,
स्वाद बढ़ा जाता हूँ,
सुई हो हाथ में या मशीन में,
संग सदा रहता हूँ,
काम वफादारी से करता,
सब में बिंध जाता हूँ,
दिल से दिल के बीच पुली का,
काम भी कर जाता हूँ,
मोह से बुनकर रिश्तों को,
पक्का करता जाता हूँ,
धागा बन विश्वास का मैं,
दूरी हर इक मिटाता हूँ,
भाई के हाथ पे बंध के मैं,
बहना से प्यार बढ़ाता हूँ,
सच कहता हूं,
सच का भी बंधन मैं बन जाता हूँ,
प्रेम के रस में सन के मैं,
प्रभु को भी संग लिवा लाता हूँ।


“तरंग” Positive Waves

निराशा हमें अवसाद के पाताल में खींच कर ले जाती है…जिससे आने वाले समय में हम कहीं के नहीं रह पाते। समय रहते ही सुचेत हो के नई ऊर्जा के साथ फिर से जुट जाने से सफलता की तरंगें स्वयंमेव ही उठने लगतीं हैं।

मन दबा दबा कुचला सहमा,
डरा डरा सा क्यों है,
अलसाया मुरझाया,
सकुचाया सा क्यों है,
लुका छिपा सा यूं,
गिरा पड़ा क्यों है,
क्या है टीस दिल में,
जुबां दबी क्यों है,
पलकें हुईं हैं बोझिल,
सूखे होंठ क्यों हैं,
माथे पे हैं लकीरें,
ग्रीवा झुकी क्यों है,
तूं इतने दिनों से पीछे,
सहमा सा खड़ा क्यों है,
न कर स्वीकार हार को,
हार अभी तो हुई नहीं है,
देख खुशी से भीतर अपने,
अभी तो सुबह हुई नई है,
न छोड़ दामन आशाओं का,
अभी तो आशा जगी नई है,
छोड़ दे आहें खोल ले बाहें,
अभी तो किरणें खिली नई हैं,
छेड़ दी वीणा मन के भीतर,
अभी तरंगे उठी नई हैं।


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“समाया” Inside

कितने आश्चर्य की बात है कि ईश्वर रोम रोम में समाया हुआ है और रोम रोम ईश्वर में…जो बुद्धि से परे तो है किंतु प्रेम के वश में है।

तेरे भीतर जग समाया,
तू सबके भीतर समाया,
इन नैनों से दिखता जो भी,
वह सब है तेरी ही छाया,
सबकी अपनी सीमा रेखा,
सबकी अपनी अपनी काया,
एक असीमित तो तू ही है,
सब कोई तेरा ही साया,
अणु घूमे परमाणु घूमे,
घूमे ग्रह नक्षत्र बिन पहिया,
करें परिक्रमा तेरी ही सब,
खूब निराली तेरी माया,
स्थिर है तो एक तू ही है,
कहीं न आया कहीं न जाया,
यह कहे मेरा वह कहे मेरा,
सबको अपना ही सुख भाया,
सबके भीतर एक तू ही है,
कौन है अपना कौन पराया,
सब कोई ढूंढे तुझको ही,
यहां न पाया वहां न पाया,
जिसने प्रेम किया खुद मिटकर,
उसी के भीतर तू प्रगटाया।


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लालच Greed

जो है…उसके महत्त्व का भान नहीं है…जो नहीं है…उसे पाने की भरपूर चाहत है। इसी और पाने की ललक जब लालच का रूप ले लेती है तो पतन भी कर देती है। इसीलिए अधिक लालच करके फंसने से बचना चाहिए।

चना भले ही सूखा था,
दुबला पतला बूढ़ा सा था,
झुर्रियों से था भरा हुआ,
छोटा पिचका नन्हा सा था,
पर फुर्ती में अव्वल था,
छिटक के दौड़ लगाता था,
ठोस था तन से और बदन से,
जोर बड़ा आवाज में था
पर कुछ पाने की चाहत थी,
इसीलिए वह खुश न था,
प्यास सताती थी सुख की,
जनम जनम का प्यासा था,
इक दिन खा के तरस किसी ने,
दिया उसे पानी में डाल,
पानी के बर्तन में डल के,
चने का मन था हुआ निहाल,
फूल फाल के हो गया कुप्पा,
गालें हो गईं लालमलाल,
इतना पानी मिलने पर भी,
प्यास नहीं बुझ पाती थी,
अतृप्त रहा था सुबहो तक,
तृप्ति कहां हो पाती थी,
और अधिक लालच में आ के,
हुआ चने का बुरा ही हाल,
रखा किसी ने आग पे बर्तन,
दिए मसाले ऊपर डाल
उबल आग पर बड़ी जोर से,
किया स्वयं से एक सवाल,
क्यों थोड़े पानी से ही,
काम नहीं चल पाया था,
रात रात भर सोख के पानी,
और क्यों मन ललचाया था,
न पड़ता इतना लालच में,
न पड़ता मुझपे यह जाल,
संग सदा मैं रहता सबके,
कभी न आता मेरा काल,
ओ बंधू ओ मित्र सुनो सब,
बुरा है लालच का जंजाल,
छोड़ो इसको सुख से जीओ,
भीतर बाहर रहो निहाल।


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कालिमा से लालिमा की ओर From dark to light

वक्त को करवट बदलते पल भर भी नहीं लगता। चहकते जीवन पे कब उदासी छा जाए…महकती खुशबू कब फीकी पड़ जाए…किसी को पता नहीं।
इन असीम दुःखों की भट्ठी से तपकर जो बाहर निकल आता है, नियति उसके लिए नए आयाम प्रस्तुत कर देती है…नई राहें उसके स्वागत में विकल्पों के ताजे फूल बिछा देती है।
Time changes in a moment. When does sadness prevail in life…when life become dark…nobody knows.
One who struggle with darkness of life, destiny present new dimensions for him to grow again.

गाड़ी धीरे धीरे पटरियों पर रगड़ खाकर चायं चूं की आवाजें निकालती हुई हिचकोले लेती चली जा रही थी। एक तो पैसेंजर ट्रेन और ऊपर से इतनी भीषण भीड़। वह तो शुक्र था कि नवरात्रि के दिनों में मौसम थोड़ा बदलने लगता है।

यात्रा लंबी थी। वह सभ्य से दिखने वाले बाबूजी सुबह करीब ग्यारह बजे से ही खिड़की के बगल में लकड़ी के फट्टों वाली सीट पर बड़ी मुश्किल से बैठे हुए थे। कमर तो अकड़ ही रही थी…पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी। भीड़ के कारण गर्मी से और भी बुरा हाल था।

हरे भरे खेतों में चलती मंद बयार कभी कभार खिड़की के रास्ते हल्के से मुंह पर टकराकर मानो चिढ़ाती और तड़पा कर चली जाती थी।

दोपहर तीन बजे तक बड़ी भूख लगती रही थी। वह तो भला हो कुछ लोगों का, जो देवदूत बनकर खिड़की से रोटियों के ऊपर सब्जी और अचार रखकर पकड़ा गए थे और गाड़ी छूटते छूटते पानी का पाउच भी गोदी में डाल गए थे…कितना स्वादिष्ट लंगर था।

डूबता सूरज सामने ही था और गाड़ी बड़ी देर तक किसी छोटे से हॉल्ट पर खड़ी रही थी। उनकी खिड़की के अधटूटे पल्ले से सीधी धूप चेहरे पर पड़ कर आंखों को चौंधिया रही थी। अब तो सब्र का बांध टूट रहा था…कब रात हो और कब यात्रा थोड़ी सुखमय हो।

जितने भी स्टेशनों पर गाड़ी रुकती थी, भीड़ घटने की बजाए बढ़ती जाती थी, मानो आज ही सबको अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचना जरूरी था।

वक्त भी कैसी करवट लेता है। जिस इंसान के पास रेलगाड़ी खरीदने की हैसियत हो, वह आज उसी पैसेंजर ट्रेन में धक्के खाने को मजबूर था।

कितना खुशनसीब समझते थे वह अपने आप को। भरा पूरा परिवार, विदेशों तक फैला कारोबार, भली सी पत्नी, दो शादीशुदा बेटे और अब तो दादा भी बन गए थे।

बेटे बहुओं ने कितनी जिद्द करके विदेश यात्रा पर छुट्टियां मनाने भेज दिया था। फाईव स्टार क्रूज पर लग्जरी सुईट में पत्नी के साथ कितना सुहाना समय बीत रहा था।

एक बड़े धमाके के साथ क्रूज तेज झटके के साथ रुका था…शायद किसी बड़ी चट्टान से टकरा गया था। डेक की रेलिंग से विशाल समुंद्र में खूबसूरत सूर्यास्त को निहारती पत्नी अपने आप को संभाल नहीं पाई थीं…उनके हाथों से पत्नी का हाथ छूट गया था और वह अचानक से समुंद्र में जा समाई थीं।

पता नहीं क्या बात थी कि न ही किसी बच्चे ने फोन उठाया था और न ही किसी स्टाफ ने। दुख और निराशा के साथ यात्रा छोड़कर वापिस आने पर गार्ड ने क्षमा मांगते हुए घर के अंदर जाने नहीं दिया था। उनके भोलेपन का फायदा उठाकर बेटों बहुओं ने गहरा षडयंत्र रचकर उन्हें दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका था।

मन संसार से इस कदर उचाट हो गया था कि इतना पैसा और नाम कमाना भी उन्हें मूर्खता लगी थी।

वह किसी और पर बोझ नहीं बनना चाहते थे। इसीलिए किसी तरह से यह आघात सहकर गुरुद्वारा साहिब की शरण में पहुंच गए थे।

करना भी क्या था…गुरुद्वारा साहिब में सेवा करते रहो…चौबीसों घंटे लंगर…खाने पीने की कोई कमी नही। दवाखाना में दवाईयां और हफ्तावार डॉक्टर मिल जाते थे। सराय में एक छोटा सा कमरा भी मिल गया था।

कितने ही लोगों ने मदद करने की पेशकश की थी।
“बच्चे आपसे कुछ छीन नहीं सकते। कानून आपको आपका सब कुछ वापिस दिलवा देगा। हमारे वकील साहब आप जैसे भले इंसान का केस फ्री में लड़ने को तैयार हैं।”
पर अगर अब सब कुछ वापिस मिल भी जाता तो परिवार की बगिया जो पतझड़ बनकर मुरझा चुकी होती, उसमें एक अकेला खड़ा हरा पेड़ बनकर भी मन कहां लगना था।

मन बहुत ही व्यग्र रहने लगा था इसीलिए अब वह अपने शहर में नहीं रहना चाहते थे और कहीं दूर चले जाना चाहते थे, जहां उन्हें कोई जानता ही न हो। अब उस शहर में रहने का फायदा ही क्या था जहां अपने पराये बन चुके थे। उनसे तो अच्छे पराये ही थे जो आज भी साथ निभाने को तैयार खड़े थे।

किसी भलेमानस ने जाते देखकर रोकने की बहुत कोशिश की थी और हारकर जबरदस्ती उनकी जेब में टिकट भर के पैसे डाल दिए थे।

रात होते होते मौसम सुहावना हो गया था। अब भीड़ भी बुरी नहीं लग रही थी।
हवा के झोंकों ने मानो मां बनकर बड़े ही प्यार से थपकी देकर न जाने कब सुला दिया था।

इतनी गहरी नींद तो बचपन में ही आती थी, जब छोटे से कस्बे में किराए के मकान में तंगहाली में रहा करते थे। बिजली अक्सर गुल रहती थी। सब छत पर ही सोते थे। बस बरसात के दिनों में नीचे बिना बिजली के उमस भरे घर में सोना पड़ता था, लेकिन मां की थपकी लगते ही निंदिया रानी अपनी गोद में ले लेती थी।

आज करीब साठ सालों बाद जब सारी इकट्ठा की हुई दौलत, शोहरत, परिवार सब एक ही झटके में छूट गया, तब ऐसा लगता था जैसे मां ने ही हवा का रूप लेकर अनकहे ही कानों में कह दिया हो… “मेरे लाल, सोच मत, सो जा।”
ट्रेन रात में रफ्तार पकड़ चुकी थी…मां रात भर जागकर उन्हें सुलाती रही थीं।

खटाक की आवाज और एक हल्के से झटके से उनकी आंखें खुल गईं। शायद कोई बड़ा स्टेशन आने वाला था और गाड़ी ने पटरी बदली थी।

सामने सूरज बादलों की ओट से झांककर अपनी लालिमा से उनके चेहरे को चमका रहा था।

इतनी गहरी नींद लेने के बाद उन्होंने स्वयं को इतना तरो ताजा कभी महसूस ही नहीं किया था।

शायद नवरात्रि की पहली रात उनके जीवन की नई शुरुआत बनकर आई थी और रातभर हवा के झोंकों के रूप में मां ने अपनी गोद मे लेकर जीवन भर की सारी थकान मिटा दी थी।

गाड़ी पटरी बदल रही थी, बादल भी छंट रहे थे और सूर्य अपनी पूरी आभा से मानो उनको नहला रहा था। उनकी बोझिल आंखों की थकान जा चुकी थी और उत्साह से भरी मुस्कान चेहरे पर आ चुकी थी।

अब उनका जीवन भी नई पटरी पर तेजी से प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। उनके जीवन में कोई बन्धन नहीं था…था
तो मां का आशीर्वाद जो रात में मिल चुका था।

उनका सब कुछ पीछे छूट रहा था, पर अनुभव और ज्ञान नहीं। वह उनके साथ था, जिसे हार मान चुके लोगों में बांटना था और उन्हें संसार में धन कमाने से अधिक संस्कार कमाना सिखाना था।

अतीत की कालिमा को छोड़ जीवन भविष्य की लालिमा की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा था।


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“ज्ञान” Knowledge

ज्ञान की अधिकता हो जाने पर ज्ञानी अपना ज्ञान बघारना शुरू कर देता है और वाहवाही मिलने पर अहंकार से फूलना शुरु कर देता है। यही ज्ञान ज्ञानी का निज जीवन भी सँवार सकता है और अहंकार होने पर उसे गर्त में भी डाल सकता है।When knowledgeable person start preaching, he start becoming arogant. He can improve his life with his knowledge but he should avoid ego.

ओ ज्ञानी न ज्ञान बघार,
पहले निज अंतर पहचान,
निकले शब्द बड़े ही भारी,
अहंकार में सनी जबान,
सुने किसी की कभी नहीं,
छेड़े केवल अपनी तान,
अपने ज्ञान की गठरी भारी,
अधिक भार से निकली जान,
बड़े बोल न बोल रे भाई,
इसमें नहीं तुम्हारी शान,
अधकल गगरी छलकत जाए,
भर ले गगरी फिर कर मान,
उलझे धागे पड़ गईं गाँठें,
जब से बढ़ गया अक्षर ज्ञान,
खोल जरा उलझी गांठों को,
अपने को पहले सा जान,
समय को न पहचान सका तू,
समय बड़ा ही है बलवान,
करे शिकार ज्ञान का पहले,
तोड़े बहुतों के अभिमान,
ज्ञान अज्ञान की छील के परतें,
नए सिरे से कर स्नान,
परम ज्ञान होगा प्रकाशित,
जब हो जाएगा अंतर्ध्यान।


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चैन की बंशी Happy Life

वास्तव में भाग्य प्रारब्ध पर ही आधारित होता है, परन्तु यह ध्रुव सत्य है कि अपने सत्कर्मों और अथक प्रयासों से धूमिल भाग्य को सुनहरे भाग्य में बदला जा सकता है।
It’s true that destiny is based on our previous activities, but this is the absolute truth that our sacret and relentless efforts are capable to turn foggy destiny into golden destiny.

ज्योतिष सीखी मैने भी,
बड़े जोर और शोर से,
देखे हाथ दूसरों के,
और माथे हर ओर से,
इक दिन मुझको मिली थी छुट्टी,
आपाधापी के दौर से,
न जाने क्या सोच के,
अपनी ही हथेली देखी गौर से,
बड़ा ही आश्चर्यचकित हुआ था,
अरे यह क्या घटित हुआ था,
रेखाओं के नाम पे बस इक,
कड़े जतन की रेखा थी,
बन्द मुट्ठी के भीतर वह तो,
अब तक ही अनदेखा थी,
उस रेखा को न देखा था,
जो जीवन का लेखा थी,
लगी समझ अब मुझको भी,
कुछ न होगा रेखाओं से,
रेखाएं तो बनतीं मिटती,
मेरे अपने कर्मों से,
धर्म श्रेष्ठ है रेखाओं से,
धर्म तो है सत्कर्मों से,
करता हूं अब कठिन परिश्रम,
बजती बंशी चैन से।

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“कपट”Flam




कुछ लोग अपने मन में दूसरे के लिए सदैव मैल रखते हैं और गाहे बगाहे उसे किसी न किसी तरह से दुख पंहुचाकर बहुत खुशी महसूस करते हैं। अगर इतना ही ध्यान वह अपने ऊपर दे दें तो खुद भी सुखी रहें दूसरे भी।
some people have poor nature for others and they feel happiness in other’s grief.They too can become happy like others, If they try to improve themselves.

मन भीतर है भरी कपट,
काम बिगाड़े बन लंपट,
कान भरे – भड़के – भड़काए,
अंतर भीषण अग्नि लपट,
मक्कारी में रहे लिपट,
स्वार्थ में अंधा रहे चिपट,
आए दिन करता खटपट,
दूजे का सुख रहा झपट,
सुन ले खोल के कान के पट,
छोड़ दे यह सब उठापटक,
कर ले मन की साफ सफाई,
नहीं तो तू जाएगा निपट,
इतनी जल्दी न तू निपट,
कर तौबा अब छोड़ कपट,
कर ले कुछ दुनिया की भलाई,
बस जा सबके दिल के निकट।


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“भोर” (Dawn)

सुबह सवेरे उठ के जो ताजगी महसूस होती है, उसका एहसास दिन भर रहता है। इसके उलट देर तक सोने से तन और मन दोनों में ही कुंठा और मनहूसियत बनी रहती है। आईये, आज से ही इस भोर का आनंद लेने का प्रण करते हैं।
The freshness that one feels after waking up in the morning remains the whole day. In contrast, late waking caused frustration both in body and mind remain for long. Come, let’s vow to enjoy this dawn from today itself.

भोर की वेला कितनी प्यारी,
कलरव करतीं चिड़ियां सारी,
खिलें पुष्प महकाएं क्यारी,
मंद बयार लगे अति न्यारी,
सूर्य प्रभा नित स्वर्ण सी चमके,
मैं क्यों न हो जाऊं वारी,
सात पहर हैं एक ओर,
चतुर्थ पहर है सब पे भारी,
जो कोई वेला उठे भोर की,
जिंदगी उसी ने है संवारी,
चित्त प्रसन्न रहे दिन भर ही,
बीमारी सब जाए मारी,
चल उठ जाग,
त्याग निंद्रा को,
कर ले खुशियों से तूं यारी।


Let’s share this positive and motivational poem with everyone… Regards, Jasvinder Singh

“बड़े बोल”(Spiel)

अपनी ओर से बातें जोड़कर मूल बात का स्वरूप कितना ही बदलने का प्रयत्न क्यों न किया जाए, वह दमहीन ही रहता है और सच बात का स्वरूप सर्वथा सत्य ही बना रहता है।
No matter how much we try to change the nature of the original matter by adding things on our behalf, it remains powerless and the nature of the truth remains completely true.

कुछ पढ़ा
कुछ गढ़ा,
कुछ था सच
कुछ मढ़ा,
कुछ था जुड़ा
कुछ जड़ा,
पर था फीका
रसहीन रहा,
जो उपरंत जुड़ा
दमहीन रहा,
जो था मिथ्या
वह गया बिखर,
बिन सोचे समझे
बिन जाने,
बिन निज अनुभव के
अनजाने,
वह तेजहीन ही
बना रहा,
था जो मूल
वह बचा रहा,
और अनंत काल तक
अमर रहा।


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“कहां है’ Where’s God “यहीं है” God is here

जिस प्रकार मृग अपनी ही कस्तूरी की सुगंध से आकर्षित होकर उसे हर कहीं ढूंढता फिरता है। इसी प्रकार हम स्वयं के भीतर प्रकाशित परम प्रकाश को निज घट में न झांक कर दसों दिशाओं में खोजते रहते हैं परंतु सही मार्गदर्शक के मिलते ही स्वयंमेव ही उस दिव्य प्रकाश की अनुभूति होने लगती है…इसी पर आधारित कविता प्रश्नोत्तर के रूप में प्रस्तुत है।
Just as an antelope is fascinated by its musk scent, he searches everywhere. In the same way, we do not see the divine light within us and search everywhere but as soon as the right guide is found, we begin to feel almighty within ourselves… This verse is based on this Q&A.

“कहां है” Where’s God देखता मैं सोचता,
कहां पे है,
किधर में है,
नहीं पता तेरा पता,
बता दे राह,
जिधर भी है,
तड़प रहा बिलख रहा,
मचल रहा यह दिल मेरा,
पूछा इससे पूछा उससे,
और न जाने किससे किससे,
उसी का तूं दे दे पता,
जिसे तेरा पता भी है।

“यहीं है” God is here
इधर भी है,
उधर भी है,
देखो जिधर,
वहीं पे है,
जमीं पे है,
जहां में है,
यहां भी है,
वहां भी है,
जब जिधर नजर पड़े,
वहीं पे है,
वहां पे है,
श्वांसों में है,
धड़कन में है,
इस पल में है,
इस क्षण में है,
रुक देख तनिक
स्वयं को ही,
वह तो तेरे
ह्रदय में है।


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“चले चलो”(Keep Going)

जब हमें मनोवांछित सफलता नहीं मिल पाती तो हम निराश होने लगते हैं और लोग भी कुछ न कुछ ताने मारते रहते हैं। यदि हम उन सभी नकारात्मक बातों को छोड़ कर नए जोश और उत्साह से बार बार प्रयत्न करते रहते हैं तो प्रसन्न रहने के साथ साथ, सफलता भी हमारे कदम चूमती है।
When we don’t get the desired success, we start getting frustrated and people also start taunting. If we leave all those negative things and try again and again with renewed vigor and enthusiasm then along with being happy, we achieve success too.

दबा दबा क्यों रहता है,
बोझ दिल पे सहता है,
दूसरों की बातों को,
साथ ले के चलता है,
इन झुकी सी नजरों से,
इन बोझिल कदमों से,
काम न चल पाएगा,
इन बुझे से जज्बों से,
उठ जाग – न भाग,
न छोड़ कठिन रास्तों को,
झाड़ दे लोगों की,
उन अनर्गल बातों को,
छोड़ दे फिकर विकर,
और चलाचल होश से,
संघर्ष कर स्वयं से ही,
और भर लबालब जोश से,
मिलेगी मुक्ति तुझे,
दमन के इस चक्र से,
छोड़ दे आसान राह,
और चलाचल फख्र से।


Let’s express your views about this motivational poem and please don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh

“छोड़ दो”(Leave it)

क्रोध से दूसरे का कम, अपना अधिक नुकसान होता है। शरीर और मन पर दुष्प्रभाव तो पड़ता ही है, कभी कभी इस कारण धन की हानि भी सहनी पड़ती है। इसके आते ही इसकी विदाई करना ही जिंदगी को खुशहाल बनाता है।
Anger destroy ourselves more in comparison to others. This is not only bad for body and mind, sometimes it also causes loss of money. It’s farewell as soon as it arrives makes life happy.

क्यों खफा हो,
क्यों दुखी हो,
किससे है नाराजगी,
है चार दिन की चांदनी,
फिर कहां है जिंदगी,
गई है तन क्यों भृकुटी,
अकड़ है ज्यों हो लकड़ी,
भड़क के ज्वाला क्रोध की,
भस्म करती जाएगी,
तन मन और धन को भी,
राख में मिलाएगी,
वक्त जो कुछ भी मिले,
थोड़ी सी कर लो बंदगी
छोड़ दो यह गुस्सा वुस्सा,
आ जायेगी ताजगी,
मुस्कुरा लो खिलखिला लो,
यही तो है जादूगरी,
जिंदादिली से जो जियो,
खुशहाल होगी जिंदगी।


“एक” (One)

सबके ह्रदय रूपी मन्दिर में प्रकाशवान एक ही परमात्मा है। नाम चाहे जो रख लें, रूप चाहे जो देख लें, पर वह अनंत एक ही है।
There is only one God illuminated in everyone’s heart temple. Whatever you name, whatever you see but that infinite is only one.

एक ही तो
सत्य है,
एक ही तो
मुक्त है,
एक ही तो
व्याप्त है,
एक ही तो
व्यक्त है,
एक ही
धरा पे है,
आकाश में भी
एक है,
एक ही
ब्रह्माण्ड में है,
और परे भी
एक है,
एक ही से
दो बना है,
दो से ही
अनेक है,
अनेक ही
फैलाव सारा,
अंत में फिर
एक है,
एक ही
आधार है,
एक ही आनंद है,
एक ही में
सुख है सारा,
एक ही
परमानंद है।


“बढ़े चलो”(Go ahead)

न हार मानो, न ही रुको, न ही थको, चलो, आगे बढ़ो…लक्ष्य प्रप्ति निश्चित है।
Don’t give up, don’t stop, don’t be tired…Come on, go ahead … the goal is certain.

न रुको
तुम डटो,
प्रताप सूर्य
का बनो,
न थको
निसदिन चलो,
कण कण का तुम
उत्साह बनो,
ले सच का
ओट आसरा,
सच की दिशा
में ही बढ़ो,
ध्वजा को थाम
धर्म की,
काल अधर्म
का बनो,
नव ज्योति
कर प्रज्ज्वलित,
नवयुग का तुम
सृजन करो। – जसविंदर सिंह


Please share my motivational poem. Regards, Jasvinder Singh

“विद्याधन” (Knowledge is money)

यह सच है कि धन से समस्त संसार चल रहा है, पर यह उससे भी बड़ा सत्य है कि विद्या से जो ज्ञान उपजता है वह कभी नाश नहीं होता। विद्याधन के साथ धन तो धन, यश भी खिंचा चला आता है।
It is true that the whole world is running with money. But it is even more true that the knowledge is never destroyed. With knowledge, wealth also comes with and fame.

नीरज और सरल यूं तो सगे भाई थे पर सामर्थ्य के हिसाब से बड़ा अंतर था दोनों में।

नीरज जहां एक बहुत बड़ा व्यवसायी था और अकूत सम्पत्तियाँ अर्जित करता हुआ धीरे – धीरे शहर की सबसे बड़ी आसामी बनता जा रहा था, वहीं सरल प्राइवेट नौकरी करता था और उसे अपने कम वेतन में ही महीने भर गुजारा करना पड़ता था। एक तो किराये का घर और ऊपर से गृहस्थी का बोझ….

कैसी विडम्बना थी…एक ही शहर में रहते हुए दोनों परिवार कभी – कभार सुख – दुख में ही मिल पाते थे। कभी नीरज भईया के यहाँ बड़े फंक्शन का न्यौता मिलने पर सरल का जीवन कठिन हो उठता।

यहां तो कम खर्च में भी काम चल जाता था पर नीरज भईया के यहां तो शहर की नामी गिरामी हस्तियों समेत बड़े – बड़े नेतागण भी आमंत्रित होते थे…इसीलिए उनके सारे फंक्शन शहर के सबसे बड़े होटलों और रिसॉर्ट्स में हुआ करते…लोक लाज के चलते एक दो माह का वेतन दिखावे की भेंट चढ़ जाता और साल भर का बजट गड़बड़ हो जाता।

कितने सुखी दिन थे बचपन के, जब दोनों में इतना प्यार था कि एक दूसरे के लिए जान छिड़कते…झगड़ते भी तो पल में हो एक हो जाते, तीन सालों का ही तो अंतर था दोनों में।

पापा अकेले पड़ जाते इसलिए उन्होंने नीरज को आठवीं से ही अपने साथ शोरूम ले जाना शुरू कर दिया था। पैसे कमाने का गुर नीरज में शुरू से ही था और जिम्मेदारी से बिजनेस सम्भालते उसकी पढ़ाई मुश्किल से बारहवीं तक ही हो पाई थी। उधर मां का लाडला सरल अपनी पढ़ाई लिखाई में ही व्यस्त रहता था।

कितना काला पन्ना था उन दोनों के जीवन के अध्याय का वह…जब उनके पापा रोज की तरह बैंक में रुपया जमां करने जा रहे थे और बदमाशों ने दिन दहाड़े गोली मारकर लूटपाट कर ली थी।
सीधी सादी मां यह सदमा सह न पाईं थीं और बीमार होकर जल्द ही पापा के पास चली गईं थीं।

उन दोनों का जीवन सुचारू रूप से चले, इसलिए रिश्तेदारों ने आनन फानन में ही नीरज की ग्रहस्थी बसवा दी थी और जो कम आयु में ही बड़ी भी हो गई थी।
भाभी जिन्हें सरल मां का दर्जा देता था, बोलतीं तो मीठा थीं पर उन्होंने पता नहीं क्या किया था कि भईया ने एक दिन साफ कह दिया था…

देखो सरल, अब हमसे और न हो पाएगा…तुम्हारे भतीजे को भी पालना है और हमारे खर्चे भी बहुत अधिक हैं… तुम्हारे लिए इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारा ब्याह करा देता हूँ और कुछ पैसे भी दे दूंगा और फिर जहाँ चाहे खुशी से रह लो।

कितनी आसानी से एक ही साँस में कह गए थे भईया। सरल स्वभाव का मां का लाडला कुछ कह ही न पाया था…बेचारे का मुंह सूखे बेर की तरह सूख गया था और जबान तालू में चिपक कर रह गई थी…नाखूनों से उंगलियों की पोरों को कुरेदता नजरें नीची किए किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया था वह…

एक तो नया नया ब्याह और ऊपर से किराए का घर…भईया ने तीन महीनों का किराया तो दे दिया था…आगे की चिंता थी। पत्नी को चाहकर भी सुख नहीं दे पा रहा था वह। विवाह के बाद घूमने का सपना पहला साल बीतते बीतते धूमिल होने लगा था।

सरल की पत्नी संयुक्ता बड़ी अच्छी लड़की थी। पढ़ी लिखी, समझदार और मितव्ययी। अपने साथ अपना लैपटॉप और प्रिंटर वगैरह भी ले आई थी जिसपे वह कम्प्यूटर ग्राफिक्स सीखा करती थी।

सरल को शुरु से ही लेखन का बहुत शौक था। साहित्य में उसकी बड़ी पकड़ थी। अक्सर रात में मौका मिलने पर एकाध कविता कहानी लिख देता और संयुक्ता को सुनाकर ही खुश हो जाता।

आज सरल को बहुत बड़ा सरप्राइज मिला था। संयुक्ता ने उसके लेखन को कम्प्यूटर में लिखकर प्रिंट कर लिया था और आज उसके प्रयासों के कारण एक बहुत बड़े पब्लिशर ने सरल की पुस्तक को प्रिंट करना स्वीकार कर लिया था। उसको तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका साहित्य अब मूर्त रूप लेने जा रहा है।

आज नीरज भईया आगे की पंक्ति में गणमान्य व्यक्तियों के साथ बैठे माननीय राज्यपाल जी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

समूचा ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। गेंदे के ताजे फूल मद्धिम रोशनी और कर्णप्रिय संगीत के साथ सुगंध बिखेर रहे थे।

आज राज्य भर के साहित्यकारों, कवियों और लेखकों में से चुने गए सरल को लेखन सर्वोच्च सम्मान दिया जाना था।
नीरज भईया चहक चहक कर सबको बता रहे थे…अरे सरल मेरा सगा छोटा भाई है।

आज इतना सम्मान मिलने के बाद सरल के ‘धन्यवाद के दो शब्द’ बोलने पर समूचा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था…पत्नी की प्रशंसा करते हुए कितना भावुक हो उठा था वह।

आज सच्चे अर्थों में विद्या का पलड़ा फिर से धन के पलड़े से भारी हो गया था और उसी विद्या से संयुक्ता ने सरल को संयुक्त कर दिया था।


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“कर्म” (Act)

निराश होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना आत्महत्या के समान है। पूरे उत्साह से काम में लग जाने से सफलता मिलना अवश्यम्भावी है।
Getting frustrated and leaving work is like suicide. It is inevitable to get success by working hard with full enthusiasm.

धरो धीर
मत हो अधीर,
रहो शांत
मिट जाए पीर,
करो कर्म
न करो शर्म,
सच पे डटो
है यही धर्म,
रहो शान्त
न करो क्रोध,
रहो प्रसन्न
मिटें अवरोध,
सोचो कम
तोड़ो सब भ्रम,
छोड़ो आलस्य
और करो श्रम,
होगी पूरी
तब तेरी आस,
जब दृढ़ होगा
मन में विश्वास।
– जसविंदर सिंह


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“सत्य” (Truth)

प्रार्थना

सत्य की परिभाषा हो तुम,
सदा सर्वदा ही सत्य हो तुम,
न तेरा आरम्भ होता,
और न ही होता है अंत,
सब कुछ तुम्हीं से है खिला,
सब कुछ तुम्हीं में है मिला,
सर्वत्र समाया है तुम्हीं में,
सर्वत्र में समाए हो तुम,
हर क्षण में जागृत हो तुम्हीं तुम,
कण कण में आच्छादित हो तुम,
चाशनी में झूठ की,
लिपटा हुआ है हर कोई,
सत्य का अनुभव करा दो,
सत्य हमें भी कर दो तुम।


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“विश्वास” (Belief)

चिकित्सा पद्धतियां चाहे जो भी हों, सबका अपना-अपना महत्त्व है। देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप जो उपलब्ध हों, वह अच्छी हैं। पर आयुर्वेद से तो हमारा अटूट संबंध पैदा होने से लेकर मृत्यु तक है, जैसे भोजन में प्रयोग होने वाले सभी मसालों का अपना-अपना बहुमूल्य स्वाद भी होता है और औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। इसी आयुर्वेद पर आधारित एक छोटी सी कहानी का आनंद लीजिए।
Every branch of medical pathy has an important role in itself. Those available according to place, time, situation are good. But our unbreakable relationship with Ayurveda is from birth to death, just like all the spices used in food, have their own precious taste and are also rich in medicinal properties. Enjoy a short story based on the Ayurveda.

हिमाचल के वह सुदूर का वह कस्बा मनोरम दृश्यों से सुशोभित था। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, चीड़ के बड़े-बड़े पेड़ तारपीन का तेल और गन्धविरोजा गोंद जैसी अमूल्य सौगातों को अपने भीतर सहेजे हुए जरा सी हवा चलने भी पर झूम उठते थे।

कभी तो वहाँ हरियाली ही हरियाली रही होगी, यह तो धीरे-धीरे घाटियों को साफ करके लोग बसते चले गए थे और अब तो यह भी न मालूम था कि सबसे पहले कौन आया था।

निशानी थी अगर कोई सबसे पुरानी तो वह थे अपने वैद्य रामदयाल जी। चट्टान काटकर बनाई गई तीन-चार बड़ी-बड़ी सीढ़ियां चढ़ कर सामने ही तो उनका हरियाली से भरा हुआ घर नजर आता था। न जाने क्या-क्या जड़ी-बूटियां लगा रखीं थीं उन्होंने। दिन भर कुछ न कुछ सुखाया पीसा करते थे।

गुलेरिया जी की पोस्टिंग संयोग से उस छोटे से कस्बे में हो गई थी। बड़े विद्वान थे वह। शहर के प्रबुद्ध वर्ग में गिने जाते थे। बड़े-बड़े डॉक्टरों से दोस्ती होने के कारण दवाओं का भी अच्छा खासा ज्ञान हो गया था।

कहाँ बड़े-बड़े शहरों में रहे और कहाँ वह छोटा सा कस्बा। सुविधाएं कम ही थीं वहां पर। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर एक छोटा सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था। डाक्टर कमोवेश ही मिलते थे…फार्मासिस्ट ही डॉक्टर थे।

खाने-पीने के शौकीन होने के कारण गुलेरिया जी का पेट अक्सर गड़बड़ ही रहता था। चूँकि जानकारी इतनी अधिक थी कि स्वयंमेव ही मेडिकल स्टोर से दवाएं ले लेते थे।

कितनी तेज झिड़का था उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारी को, जिसने उन्हें एक बार रामलाल जी से सलाह लेने की बात कर दी थी। एलोपैथी पे गर्व ही इतना था कि उनके सामने किसी और पैथी की बात आते ही बिफर जाते।

रात में पार्टी बड़ी जोर-शोर से चल रही थी। ऊपर पहाड़ी पर जाती सड़क के साथ लगती उनके सहकर्मी के घर की छत मीठे-मीठे पहाड़ी गानों से गूंज रही थी। लाईट्स आसपास के नजारों को और भी खूबसूरत बना रहीं थीं।

एक तो देर से पकती हुई पहाड़ी कढ़ी, दाल मखानी और ऊपर से मुरमुरी तंदूरी रोटियां। मंद बयार खाने की खुशबू को बढ़ा रही थी। साहब के लिए विशेष खान-पान का इंतजाम भी था, जिसका इतने दिनों बाद जम के मजा लिया था उन्होंने।

बड़े साहब अभी तक नहीं आए…जा के देखो तो उनके क्वार्टर में…सब ठीक तो है न…रात देर बहुत हो गई थी।


साहब, बड़े साहब तो पेट दर्द और सर दर्द से कराह रहे हैं, जल्दी चलिए…


हम शहर कैसे जा सकते हैं…सुबह हुई लैंड स्लाइड से सड़क तो बंद हो गई है…

मैं जितना ट्रीटमेंट कर सकता था, कर दिया…अब यह केस मेरे बस का नहीं… मेरी सलाह मानिए तो एक बार वैद्य जी के पास ले जाइए…फार्मासिस्ट ने सलाह दी।

रामदयाल जी तो थे ही दयालुता की प्रतिमूर्ति। बड़े जतन से दवाईयां तैयार कर कुछ बूंदें नाक में डालीं, कुछ मुंह में और न जाने क्या लेप सा लगाया था पेट पर।

शाम होते-होते गुलेरिया जी की कराहटें बन्द हो गईं। पेट की अकड़न और सरदर्द तो मानो छूमंतर ही हो गया था।

होश आते ही गुलेरिया जी ने पूछा, मैं किस नर्सिंग होम में हूँ…मैं उन डॉक्टरों को धन्यवाद कहना चाहता हूँ जिन्होंने मेरी जान बचा ली…

वैद्य रामलाल जी ने मुस्कुराते हुए उन्हें कम बोलने का इशारा किया और थोड़ा सा बाहर टहल के आने की सलाह दी।

गुलेरिया जी का दिल तो मानने को तैयार ही न था कि किसी और पैथी में भी इतनी सामर्थ्य हो सकती है कि इंसान की जान बच जाए।


पर कुछ तो ऐसा चुम्बकीय आकर्षण था वैद्य जी के शब्दों में कि न चाहते हुए भी उनको वैद्य जी का सानिध्य भाने लगा था और धीरे-धीरे यह समझ आना शुरू हो गया था कि कब क्या खाएं, क्या न खाएं और कितनी मात्रा में खाएं।

अब एलोपैथी के साथ-साथ वह आयुर्वेद के महत्व को भी जान चुके थे और वैद्य रामलाल जी ही अब उनके लिए सबसे बड़े डॉक्टर थे।


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”पछतावा” (Repentance)

अपना देश अपना ही होता है। रोटी चाहे चुपड़ी हो या सूखी, ताजी हो या बासी, अपने देश की ही अच्छी। विदेशों में सब कुछ मिल सकता है पर अपने देश की धरती की गोद नहीं। संकट काल में विदेशों में रहते हुए अंत समय में पछताने के सिवा कुछ नहीं बचता।

कौशल कंवल जब से चीन आए थे, मजे ही मजे थे।

कितना परेशान होते थे वह अपने देश में। कहने को तो मातृभूमि थी पर जब से फैक्ट्री संभाली थी, परेशान ही रहते थे।

होते भी क्यों न, उनके सारे के सारे दोस्त विदेशों में ही तो सैटल हो गए थे। लगभग सभी सफल व्यवसाई थे। वहां की इतनी तारीफें करते रहते कि अपने देश में हर ओर गंदगी और हर चीज में कमियां ही कमियां नजर आने लग गईं थीं।

कहां उच्च कोटि के शहर और कहां अपने देश के। गंदगी केवल शहरों में ही होती तो शायद सह लेते। पर अब तो हर जगह में ही कमी दिखती थी। फिर चाहे वह सरकारी विभाग हों या फिर आम जनमानस।

फिर कितनी ही जिद्द करने के बाद पापा ने चीन जा के लिए सैटल होने के लिए हामी भर दी थी। लेकिन इकलौते बेटे के जाने के बाद और बनी बनाई फैक्ट्री उजड़ने के बाद सदमे से उनकी मृत्यु हो गई थी।

उनकी मृत्यु के बाद कौशल जी ने अपनी मां को अपने साथ ले जाने की बड़ी जिद्द की थी, पर मां ने भारी मन से न बोल दिया था।

चीन कितना सुंदर था, वहां के लोग कितने सयाने थे। इंडस्ट्रियल एरिया में उनके पहुंचते ही उस क्षेत्र विशेष के मेयर अपनी टीम के साथ उनका स्वागत करने पहुंच गए थे। कौशल जी कितने हैरान हो गए थे जब मेयर ने उन्हें होटल में बैठे बिठाए बिना कहीं भी जूते घिसे एक ही दिन में सारे विभागों के अधिकारियों से मिलवा दिया था और दूसरे ही दिन उन्हें फैक्टरी के लिए जमीन आवंटित कर दी गई थी। सारी की सारी सुविधाएं एक साथ इतनी जल्दी, यह तो अपने देश में संभव ही न था।

कर्मचारी और लेबर कितने कर्मठी थे, केवल त्योहारौं में ही छुट्टी लेते थे और ओवरटाईम भी खूब जम के करते थे। अब तो मौज ही लग गई थी।

धीरे-धीरे पूरा परिवार ही वहां सैटल हो गया था। मां के गुजर जाने के बाद अब अपने देश में बचा ही क्या था, तो सारी जमीनें जायदादें बेचकर वहीं विलासता पूर्वक ऐश में जिंदगी व्यतीत हो रही थी।

चूंकि अब बड़े बड़े व्यवसायियों और नेताओं से पार्टियों में मिलना जुलना होता ही रहता था तो अब साग सब्जी भी फीकी लगनी शुरू हो गई थी। अब तो धीरे धीरे सी फूड से लेकर लगभग सभी तरह के पशु पक्षियों के अनोखे स्वाद जिव्हा की स्वाद ग्रंथियों में रच बस से गए थे।

जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन, जैसा पिए पानी, वैसी बोले बानी।


अपना देश तो कुछ यूं बुरा सा लगने लगा था कि सोशल मीडिया पर भी देश प्रेम की बातें सुनकर मुंह बिचका लेते और बड़े गर्व से सबसे कहते…अरे जाओ…कहां चाईना और कहां इंडिया…सपने देखो…सात जन्मों में भी भारत कभी यहां का मुकाबला नहीं कर सकता।


यह बात और थी कि उनकी फैक्ट्री का सारा माल भारत में ही खपत होता था। फिर भी वह चाईना का गुणगान करते न थकते। वहां रहकर बड़े अरबपतियों में उनकी गिनती जो होने लगी थी।


इधर सालों से कुंभकरणीं नींद में मृत्यु शैया पर पड़े भारत ने अचानक ही मानो संजीवनी बूटी चख ली थी।

सरकार बदलते ही देश ने खड़े होकर अंगड़ाई ली और खुद पर जमीं धूल को झाड़ते हुए स्वयं को फिर से व्यवस्थित किया।


बुजुर्ग होता जा रहा भारत अब फिर से युवा हो चुका था। उसकी सुंदरता की चमक पूरे ग्लोब को प्रभावित कर रही थी। इधर भारत तेजी से विकसित हो रहा था और उधर चाईना की सांसें फूल रहीं थीं।


अरे अब भी समय है, लौट आ, मेरी बात मान, वह बहुत मक्कार देश है। वहाँ के लोग बड़े धूर्त हैं, न जाने कब क्या हो जाए, यहाँ बहुत कुछ बदल चुका है। घर वापसी पर तेरी कम्पनी को सरकार पूरी मदद करेगी…मामा जी ने लाख समझाया था पर कौशल जी की आंखों में तो शंघाई की चकाचौंध भरी हुई थी।

अब तो वह किसी रिश्तेदार को भी घास नहीं डालते थे और किसी का फोन आने पर अनमनी बातें करके उसे टाल देते थे।


आज कितनी बड़ी पार्टी दी थी उन्होंने शहर के सबसे मंहगे सैवन स्टार होटल में। शंघाई के लगभग सभी बड़े व्यवसाई और बड़े बड़े नेता मंत्री भी शामिल हुए थे। इतने बड़े प्रोजेक्ट हासिल करने की खुशी जो थी।


सभी ने खाने की कितनी तारीफ की थी, पर असली मजा तो चमगादड़ के खून से बनी वाईन में ही आया था, जब उसमें आग लगाकर फूंक मारकर सिप करके मंत्री जी ने पार्टी की शुरुआत की थी तो मेहमानों की जोरदार तालियों से समूचा टैरेस गूँज उठा था।


क्या बात है…जी एम लुई शुंग अभी तक क्यों नहीं पहुँचे, क्या हो गया? सर अभी-अभी खबर आई है कि वह आईसीयू में एडमिट हैं और केवल वही नहीं शहर का कोई भी आईसीयू खाली नहीं है, सभी तेजी से भर रहे हैं।

तभी सरकारी आदेश आया कि आप सभी तुरंत फैक्ट्री खाली करिए और अपने अपने घर जाइए। हमें फैक्ट्री सील करने का आदेश मिला है।

अरे यह क्या ड्राइवर…गाड़ी कैसे चला रहे हो…अरे अरे…संभाल कर चलो बेवकूफ!
अरे सर जरा सामने तो देखिए दूर-दूर तक लोग लड़खड़ा कर गिरते दिखाई दे रहे हैं।
अरे यह भगदड़ कैसी…यार जल्दी घर पहुंचाओ।
अरे सर देखा आपने, कैसे पुलिस वालों ने चार पाँच लोगों को गोली मार दी। आखिरी हो क्या रहा है कुछ समझ में नहीं आ रहा…सुबह तक तो सब ठीक था…इतनी जल्दी यह क्या हो गया।


बाहर निकलो! जोरदार कड़क आवाज सुनते ही कौशल जी का कलेजा कांप उठा। पुलिस ने ड्राइवर का टेंपरेचर देखते ही उसे बाहर खींच कर गोली मार दी। अरे अरे यह क्या कर रहे हो, मुझे जानते नहीं मैं कौन हूं? सॉरी सर आप गाड़ी लेकर जल्दी घर जाईए और हां अपना पहचान पत्र गले में लटका लीजिए…नहीं तो आगे कोई और आपको न पहचान पाया और आपको बुखार निकला तो तुरंत गोली मार देगा।


लगभग कांपते हुए गाड़ी चलाते हुए कौशल जी तेजी से शहर के सबसे सुंदर इलाके में बने अपने विला में समां जाने को बेताब हो रहे थे।

गाड़ी थी कि चल ही नहीं रही थी, लहराई जा रही थी, मानो आज ही चलानी सीखी हो। इतने लोगों को सड़क पर बदहवास होकर गिरते और पुलिस की गोली से मरते उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।

पूरे हफ्ते शहर में सन्नाटा पसरा रहा था। दिन में तो गोली चलने की आवाज आती ही रही थी। रात को भी मिलिट्री के जूतों की आवाजें भी गोलियों की आवाज के साथ सुनाई देतीं रहीं थीं। दहशत इतनी बढ़ गई थी कि खिड़कियों से झांकने की भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी।

आखिरकार पूरा जोर लगाने पर कौशल जी के एक विश्वासपात्र मंत्री ने धीरे से फोन पर बताया था कि एक खतरनाक वायरस बनाकर हम पूरी दुनिया को विश्व युद्ध के बिना ही जीतना चाहते थे। पर दुर्भाग्य से वह यहीं फैल गया और अब तक लाखों लोगों की जानें जा चुकी हैं। गरीबों, बूढ़ों, बीमारों और लाचारों को चुन चुन कर मारा जा रहा है, ताकि और इंफेक्शन न फैले।

धीरे धीरे चाईना की सच्चाई कौशल जी के सामने आने लगी पर तब तक उनका लगभग सत्तर प्रतिशत स्टाफ खतरनाक वायरस की लपेट में आकर प्राण गवां चुका था।

फैक्ट्री बंद हुए अब लगभग तीन महीने हो चुके थे। अरबों का नुकसान हो चुका था। शुरू के दिनों में कौशल जी ने हजारों नोटों को ऊपर वाले माले से सड़कों पर यह लिख कर फेंका था कि हमें रोटी दो, दवा दो, नहीं तो हम मर जाएंगे।

कितनी बड़ी त्रासदी थी, जिस देश की तारीफ करते न थकते थे, अब वहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। न ही ठीक से खाने को मिल रहा था और न ही दवाईयां।

अभी धीरे-धीरे हालात सुधरने शुरू हुए ही थे कि वहां के प्रशासन ने साफ बोल दिया…आप लोगों ने गलवान घाटी में हमारे ऊपर अटैक करके साठ सत्तर मिलिट्री वालों को मार दिया। अब हमसे कोई उम्मीद मत रखिएगा।

यह क्या हो गया था? साठ वर्षों के जीवन काल में कभी इतना परेशान नहीं होना पड़ा था, जितना इन छह महीनों में। दिमाग चकरघिन्नी बन कर रह गया था।

अरे यह क्या! सपने में नहीं सोचा था कि तृतीय विश्व युद्ध होगा। इधर अपने देश ने और उधर अमेरिका ने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर चाईना पर अटैक कर दिया था, जिसकी त्रासदी कौशल जी को झेलनी पड़ गई थी।

सरकार ने अपना असली रंग दिखा दिया था। उनके सारे अकाउंट सीज कर दिए गए थे। फैक्ट्री और सभी जमीनें जयदादें आपातकाल के नाम पर छीन लीं गईं थीं।

अब तक चाईना का युद्ध में बड़ा भारी नुकसान हो चुका था। उधर पूरा का पूरा चाईना मृत्यु शैया पर पड़ा एड़ियां रगड़ कर अंतिम सांसे ले रहा था और इधर कौशल जी…।

कांपते हाथों से बेटे का हाथ पकड़कर धीरे से बोल रहे थे वह। कुछ शब्द तो मुंह में ही फंस कर रह गए थे। ओठों ने फुसफुसा कर अपने प्यारे भारत देश लौट जाने का वचन मांगा था। अब था भी क्या यहां पर, सब कुछ तो युद्ध की भेंट चढ़ चुका था। सरकार कंगली हो चुकी थी। कौशल जी का सभी कुछ छीन कर युद्ध की अग्नि में झोंक दिया गया था। आज उनकी डबडबाई आंखों से बेबसी के आंसू अनवरत बहे जा रहे थे।

आज उनको वह पुराने दिन याद आ रहे थे। कितनी हरियाली थी उनके घर में भी और फैक्ट्री में भी। कितना बढ़िया शुद्ध शाकाहारी जीवन जीते थे और खुशियां फल बन कर उनके मम्मी पापा की हरी भरी बगिया में लटकीं रहतीं थीं। जब जी चाहता, लपक कर तोड़ते और खुश हो जाते।

परिवार की देश वापसी की हामी भरने पर कौशल जी को इतना संतोष हो गया कि अब जीते जी न सही पर मृत्योपरांत उनकी अस्थियां अपने देश की पतित पावन नदियों में बह कर शायद पवित्र हो जाएंगी और उनकी मातृभूमि की माटी उन्हें क्षमा कर देगी।


यदि यह लघुकथा पसंद आई हो तो कमेंट और शेयर जरूर करें, धन्यवाद जसविंदर सिंह, हिमाचल प्रदेश

“दुआ” (Prayer)

जब किसी को भीख मांगने की आदत पड़ जाती है, तो वह हर जगह ठोकर खाता है। दरअसल हम सभी भिखारी हैं जो हर दिन भगवान से कुछ न कुछ चाहते हैं। लेकिन मांगने के साथ-साथ हमें बांटना भी आना चाहिए और किसे मिलता है…आइए देखें…
When someone gets used to begging, he stumbles everywhere. Actually we all are beggars who demands something from God every day. But along with demanding, we should also learn to distribute and who gets….Let’s see…

सुना है दुआओं में
बड़ी ताकत होती है,
सुन लीं जाएं तो
बड़ी इनायत होती है,
जो पास नहीं होता
उसी की तो चाहत होती है,
किसी की दुआओं में पैसा,
किसी के औलाद होती है,
सौगातों की चाहत से ही तो
फरियाद होती है,
मिलतीं नहीं हैं उनको
जिनके दिलों में खार होती है,
जो देना नहीं जानते,
सिर्फ लेने की चाह होती है,
रब उनकी नहीं सुनता
जिनकी सोच बेकार होती है,
सच तो यह है
जिन्हें मांगना भी नहीं आता,
मासूमियत में उन्हीं की
पूरी चाह होती है,
जिनके होते हैं दिल साफ
आईने की तरह,
उनकी तो बिन बोले ही
पूरी हर मुराद होती है।

Have heard that prayers have the big power,
It is a great grace, if God listen someone’s,
We want those which we don’t have,
Someone prayer for money,
Someone prayer for children,
We do prayer to fulfil our wishes,
But their prayers are not fulfilled,
who have deceit in their hearts,
God never listen to those, whose thinking is not good,
Those who do not know to give,
Only want to take,
Truth is this
God fulfills the desires of those,
Who are innocent by nature and dont know to demand everytime,
His every wish is fulfilled by the God,
Whose heart is clean like glass.


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“प्रेम” (Love)

तेरी प्रकृति इतनी सुंदर है तो तूं कितना सुंदर होगा…..
If your nature is so beautiful, how beautiful you will be…..

हो कुसुमलता इतराती सी,
जो मस्त पवन लहराती सी,
पल पल प्रतिपल पलछिन प्रतिक्षण,
जीवन की आस बढ़ाती सी,
हों कमल पंखुड़ी खिली खिली,
हों ताल के बीच सुहाती सी,
नभ के तारे थल के जुगनू,
हो रात्रि चमक बढ़ाती सी,
हो चाँदनी पूनम चन्दा की,
सागर को मोहित करती सी,
हों ओस की बूंदें फूलों पर,
हर बूंद में किरण चमकती सी,
जल के भीतर कलरव करती,
हो बादल की परछाईं सी,
हो पर्वत श्रृंखला नीली सी,
हो बर्फ की चादर ओढ़ी सी,
हो मधुबन घाटी फूलों की,
सब धरा को हो महकाती सी,
इन सबमें कहीं मैं खो जाऊँ,
तेरे प्रेम में ही मुस्काती सी।


आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा है….साथ ही साथ शेयर भी कर दीजिएगा…😊🙏आभार, जसविंदर सिंह, हिमाचल प्रदेश