चौराहा

हम जीवन भर कितनी भी दौड़ भाग कर लें, इस जीवन को असली मान बैठें, परन्तु असल में तो एक दिन रुक ही जाना है और अपने असली घर वापिस जाने के लिए असली चौराहे यानी श्मशान या कब्रस्तान आना ही है, यही वास्तविकता है।

मैं अंधेरी रातों में
चौराहे पर खड़ा सोचता रहता हूं
कि यह अंधेरे रास्ते
कहीं तो जाते होंगे,
आगे जाके न जाने कितने
मोहल्लों – गलियों और छोटे – छोटे
तंग रास्तों से जुड़ जाते होंगे,
उनके आगे न जाने कितने
मैदान – तालाब – नदियां
और पहाड़ आते होंगे,
कहीं तो आखिरी छोर होगा इनका,
आखिर यह कहां तक जाते होंगे,
न जाने कैसे कैसे लोगों से
यह टकराते होंगे,
हर किसी का वास्ता
तो इनसे पड़ता ही है,
क्योंकि हर एक इन्हीं से जुड़े
घरों में जन्मता है,
सोचता हूं हर एक
इस चौराहे तक तो आता ही होगा,
फिर दूजे रास्तों की खाक छानकर
अपने रास्तों पर लौट जाता होगा,
कुछ इस चौराहे को श्मशान
तो कुछ कब्रस्तान कहते हैं,
छोड़ने आते हैं औरों को
और लौट जाते हैं,
मैं अकेला खड़ा रह जाता हूं
यहां यह सोचकर,
आखिरकार तो यहां आना ही है,
यही तो है घर अपना
सही ठिकाना ही यह है,
क्यों मैं दौडूं शुरू से आखिर तक,
खींचूं लकीरें कि यह रास्ता है मेरा,
क्यों न बैठा रहूं यहां उसी की याद में,
आखिर इसी के ऊपर तो रहता है हमदम मेरा।।


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विस्मृति से स्मृती Remembrance From Oblivion

हमें लगता है कि सब कुछ सही चल रहा है…हम सदा ही रहेंगे…हमें कुछ नहीं होगा और इसी क्रम में एक दिन एक झटके के साथ ही सब कुछ पीछे छूट जाता है और हम फिर से इस अमूल्य जीवन को ऐसे ही समाप्त कर चुके होते हैं।
यदि हम पिछली भूलों को स्मरण करते हुए वर्तमान को संवारने के प्रयत्न करें तो हमारा  जीवन जीना सार्थक हो सकता है।

कभी जलाया गया
कभी दफनाया गया
कभी चील कौवों द्वारा
नोच – नोच के खाया गया
कभी न जाना न समझा
क्यों यह हुआ
कभी जने बच्चे बन के स्त्री
कभी बन पुरूष
वन – वन भटकता रहा
न जाने किन – किन रूपों में
किन – किन योनियों में आता रहा
मानव देह की प्रतीक्षा मैं करता रहा
चिर युगों पश्चात्
फिर से मिली है यह देह
मिलते ही पिछला सब विस्मृत हो गया
जन्म लेते ही चासनी बनी अहंकार की
आज तक उसी में मैं लिपटता रहा
जो अब भी न समझा अब भी न जाना
संग मेरे घटित हुआ है यह सब
कहीं अब भी यदि यह नहीं माना
तो फिर से यह क्रम चलता रहेगा
चलेगी चक्की समय की
मैं पिसता रहूँगा
फिर मिलेगी देह तो
किसी न किसी की
संघर्ष जीवन का फिर से होता रहेगा
कुछ पाऊँगा और कुछ खोता रहूँगा
फिर मिलेगी यह देह और मैं सोता रहूँगा
हे भगवन् कर दे वर्षा तूं अपनी कृपा की
दे उतार गन्दगी – चासनी यह मेरी
दे सद्बुद्धि हो जाए सद्गति मेरी
मिले सुमति – नष्ट हो यह कुमति मेरी
फिर न भुगतने पड़ें और दुष्परिणाम
खो जाऊं तुझमें ही भूल के स्वयं को
सदा लेता रहूँ मैं तुम्हारा ही नाम
सदा लेता रहूँ मैं तुम्हारा ही नाम।।

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