काश

“विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष” कभी – कभी लगता है कि हमारी पृथ्वी जैसी थी, वैसी ही शुद्ध फिर से हो जाए। परन्तु इसके लिए सभी को अपने – अपने स्थान पर इसके लिए विशेष प्रयत्न करने होंगे।

जब हम न थे – जब तुम न थे,
जब धरा हरी और भरी सी थी,
कितना जल था – कितनी प्रकृति,
ऊंचे पर्वत – गहरे समुंद्र,
सारी नदियां कल – कल करतीं,
चहुं ओर थे वन – हरियाली थी,
न नगर ही थे – न डगर ही थे,
न सीमा थी – न देश ही थे,
वर्षा सिंचित करती रहती,
मिट्टी सारी सोंधी सी थी,
न गैसें थीं – न प्रदूषण,
था पवित्र वातावरण,
काश – अब भी ऐसा हो जाए,
यह मानवता संभल जाए,
लोलुपता सब मिट जाए,
यह वन संपदा बढ़ जाए,
शुद्ध पवन चहुं ओर बहे,
सब महामारियां मिट जाएं,
हर मन में निश्चय हो जाए,
हर घर में पौधे लग जाएं,
घर – घर हरियाली लहराए,
स्वर्ग सी पृथ्वी हो जाए,
सबके मन फिर से खिल जाएं।


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