भेषधारी

झूठे भेषधारी जनता को बेवकूफ बनाकर अपनी झोलियां तो भर सकते हैं पर भीतर से वह भी भयभीत ही रहते हैं… वहीं सच्चे संत सच की राह पर चलकर अपने प्रभु संग आनंदित रहते हैं।

जिसने पहना कपड़ा बढ़िया,
वही हो गया संत,
पता नहीं है चाहे उसको,
मिलता कैसे कंत,
करे कर्म कृतघ्न वाले,
रहता सदा ही जंत,
मन भर के वह भोग करे,
भोगे भोग अनंत,
नहीं जानता अपने बारे,
कब हो जाएगा अंत,
बक्के बक बक दे उपदेश,
होत नहीं करमवंत,
लूटे जन को धर्म नाम पे,
होत जाए धनवंत,
रखे चाहे भेष अनेकों
नहीं बनता पतवंत,
होता मिलन उसी का प्यारे,
जो होता सतवंत।


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