अपना पराया

जीवन भर हम लोगों को परखते ही रह जाते हैं कि यह अपना है या पराया…यहां अपने पराये और पराये अपने बन मिलते –  बिछड़ते रहते हैं। यहां तो हरदम संग चलने वाला दम भी अंत मे पराया हो जाता है…

कोई कहे अपना – कोई पराया,
किसी को कुछ भी समझ न आया,
सब कोई कर्म है अपना लाया,
भोग के हर कोई जग से जाया,
किसको कहें यह है मेरा अपना,
नहीं अपना – अपना ही साया,
जब जन्मा था – हाथ था खाली,
जो पाया सब छोड़ के जाया,
मिले जो संगी – साथी जग में,
अंत में संग न कोई जाया,
सुख में गुड़ में चींटे बन चिपके,
दुख में नजर न कोई आया,
ढूंढे बहुत सहारे व्यर्थ ही,
अंत सहारा भीतर पाया,
अपना हमदम अपने भीतर,
अंतिम दम तक साथ निभाया।