अंतर् दर्शन

ईश्वर के पावन स्वरूप का सम्पूर्ण वर्णन न ही कोई पुस्तक कर सकती है और न ही कोई मनुष्य, चाहे उसने दर्शन पा भी लिए हों। और अपने भीतर उसी को उनके पवित्र दर्शन हो सकते हैं, जिसने स्वयं को ईश्वर के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया हो।

अर्धचन्द्र
संग बिन्दी मस्तक,
देख हुआ
सब जग नतमस्तक,
दमके तेज
तुम्हारा ऐसा,
नेत्र हुए
जाते हैं चकमक,
लगा रहे जो
केवल तुझमें,
नहीं दिखा है
कोई अब तक,
कोई विरला
होता जग में,
जिसके द्वार
तू देता दस्तक,
नहीं समझ पाता है
तुझको,
लगा के बुद्धि
कोई विचारक,
वर्णन करे
समूचा तेरा,
नहीं है ऐसी
कोई पुस्तक,
वर्णन तेरे
अंतर् दर्शन का,
नहीं है आता
किसी के लब तक,
कृपा करे अपनी
जिस ऊपर,
केवल वही है
पहुंचे तुझ तक,
करो कृपा हे नाथ
अब मुझ पर,
द्वार खड़ा है
तुमरा बालक,
हे दीन दयाल
अनाथ के नाथ,
तुम स्वामी
मैं तुमरा सेवक।


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