खुदा God

अब तक मुझे दिखा नहीं,
गल्ती मेरी,
उसकी नहीं,
चिलमन है आँखों में मेरी,
वह नहीं पर्दानशीं,
गल्ती है कानों की मेरी,
अब तक सुनी न धुन बंशी,
जुदा नहीं,
खफा नहीं,
नहीं है गुमशुदा कहीं,
यूँ है तो वह हर कहीं,
अभी यहीं,
सदा यहीं,
यह रुकावट बेवजह नहीं,
इसका भी है इलाज यहीं,
मन बात करता फिर रहा,
चौबीसों घँटे लड़ रहा,
कालिख है खुद पे मल रहा,
धूल में है सन रहा,
जो देखा इसको साफ कर,
हर इक को दिल से माफ कर,
तब जाना,
के क्यूं दिखा नहीं,
अब तक मुझे खुदा कहीं,
देखा पलट के खुद को जब,
जाना के है खुदा यहीं।


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“तरंग” Positive Waves

निराशा हमें अवसाद के पाताल में खींच कर ले जाती है…जिससे आने वाले समय में हम कहीं के नहीं रह पाते। समय रहते ही सुचेत हो के नई ऊर्जा के साथ फिर से जुट जाने से सफलता की तरंगें स्वयंमेव ही उठने लगतीं हैं।

मन दबा दबा कुचला सहमा,
डरा डरा सा क्यों है,
अलसाया मुरझाया,
सकुचाया सा क्यों है,
लुका छिपा सा यूं,
गिरा पड़ा क्यों है,
क्या है टीस दिल में,
जुबां दबी क्यों है,
पलकें हुईं हैं बोझिल,
सूखे होंठ क्यों हैं,
माथे पे हैं लकीरें,
ग्रीवा झुकी क्यों है,
तूं इतने दिनों से पीछे,
सहमा सा खड़ा क्यों है,
न कर स्वीकार हार को,
हार अभी तो हुई नहीं है,
देख खुशी से भीतर अपने,
अभी तो सुबह हुई नई है,
न छोड़ दामन आशाओं का,
अभी तो आशा जगी नई है,
छोड़ दे आहें खोल ले बाहें,
अभी तो किरणें खिली नई हैं,
छेड़ दी वीणा मन के भीतर,
अभी तरंगे उठी नई हैं।


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