खुदा God

अब तक मुझे दिखा नहीं,
गल्ती मेरी,
उसकी नहीं,
चिलमन है आँखों में मेरी,
वह नहीं पर्दानशीं,
गल्ती है कानों की मेरी,
अब तक सुनी न धुन बंशी,
जुदा नहीं,
खफा नहीं,
नहीं है गुमशुदा कहीं,
यूँ है तो वह हर कहीं,
अभी यहीं,
सदा यहीं,
यह रुकावट बेवजह नहीं,
इसका भी है इलाज यहीं,
मन बात करता फिर रहा,
चौबीसों घँटे लड़ रहा,
कालिख है खुद पे मल रहा,
धूल में है सन रहा,
जो देखा इसको साफ कर,
हर इक को दिल से माफ कर,
तब जाना,
के क्यूं दिखा नहीं,
अब तक मुझे खुदा कहीं,
देखा पलट के खुद को जब,
जाना के है खुदा यहीं।


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“इंद्रधनुष” (Rainbow)

हर एक की जिंदगी उतार चढ़ाव से भरी होती है। कभी पर्वत के शिखर तक चढ़ जाती है तो कभी सागर के तल तक उतरती जाती है। यदि हम ईश्वर को प्रत्यक्ष मानकर स्वयं पर दृढ़ विश्वास रखें और सत्कर्म करते रहें तो एक न एक दिन सफलता अवश्य प्राप्त हो जाती है।
Each one’s life is full of ups and downs. sometimes climbing to the top of the mountain, Sometimes descending to the bottom of the ocean. If we believe in God and have strong faith in ourselves and continue to do true efforts then one day success is definitely attained.

सैंकड़ों लीटर पानी सहेजकर झोंपड़े का छप्पर इतना भारी हो गया था कि कभी भी टपक पड़ने को तैयार था। बारिश थी कि तीन दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

बिरजू इसी आस में प्याज की छोटी – छोटी पकौड़ियाँ तल रहा था कि शायद कोई भूला बिसरा इस वीरानी सी सड़क से गुजरे और चाय पकौड़ी खाए तांकि उसकी रोजी – रोटी का प्रबंध हो सके।

जुलाई सूखा ही बीत गया था, अगस्त काटे न कटता था। इतनी भीषण गर्मी पहले तो न पड़ती थी। बारिश हो ही नहीं रही थी। यूं तो सितम्बर की शुरुआत से ही बादल आते जाते रहे, मगर बरसते न थे।

पहले आस पास के गांव के लोग चायपान के लिए आते रहते थे। पर खेती सूखी हुई थी और फालतू खर्च करने के लिए ग्रामीणों के पास पैसा ही कहाँ था।


बिरजू यदा कदा झोंपड़े से बाहर निकल कर धूप से बचने के लिए माथे पर टोपी की तरह हाथ रखकर ऊपर चमकते आकाश को मायूसी से देखा करता और बड़ी मायूसी से वापिस आ कर धम्म से बैंच पर बैठ जाता और ठण्डी भट्ठी को शून्य निगाहों से यूँ घूरता रहता मानो उसकी निगाहों से ही ठण्डी भट्ठी में फिर से तपिश बढ़ जाएगी।

कहाँ तो सूखा ही सूखा, कहाँ न थमने वाली बारिश। कहाँ तो बादल थे ही नहीं और कहाँ एक के बाद एक न जाने कहाँ से आते जा रहे थे मानो, गरीब की भट्ठी ठण्डी करने के साथ – साथ उसके पेट की भट्ठी भी ठण्डी करके ही मानेंगे।

रात के करीब आठ बज रहे होंगे। ग्राहक न होने के कारण बिरजू ने दो दिन से भट्ठी नहीं सुलगाई थी। पर अब जब हिम्मत करके थोड़ी सी पकौड़ियाँ तलनी शुरू ही कीं थीं कि अचानक एक बड़ी सी कार उसके सामने आकर रुकी।

हल्का सा शीशा नीचे करते हुए सेठ जी ने कुछ पूछना चाहा, पर मूसलाधार बारिश की मोटी – मोटी बूंदों की टपटपाहट ने उनकी आवाज को जैसे दबा ही दिया। सेठ जी ने गाड़ी झोंपड़े के बिल्कुल साथ सटा दी और तेजी से दौड़कर भीतर आ गए।

परेशान तो बहुत दिखते थे पर भूख से व्याकुल भी थे। यकायक कढ़ाई से आती खुशबू से वह और सब भूल गए और तेजी से बोले….भाई, जल्दी से गरमागरम पकौड़ियाँ खिला दे…बड़ी भूख लगी है।

बिरजू की आंखों में आँसू आ गए। वाह परमेश्वर, जब तक मैने हिम्मत हारकर भट्ठी नहीं जलाई थी, तब तक कोई भी ग्राहक नहीं आया था और आज जैसे ही पहला घान तलना शुरू ही किया था कि आपने इतने बड़े सेठ जी को भेज दिया….धन्य हो प्रभु।

भाई, बहुत ही स्वाद पकौड़ियाँ हैं, कुछ और भी है खाने को….सेठ जी ने अदरक वाली चाय सुड़कते हुए पूछा।

जी साहब, अभी सत्तू भर के छोटी – छोटी लिट्टियाँ आलू बैंगन टमाटर के चोखे के साथ बना देता हूं….उत्साहित होते हुए बिरजू बोला।

सिलबट्टा देखे कितना जमाना बीत गया था…अब तो घर में सारा काम मशीनों से ही होता था। सभी कुछ था, इतने बड़े आदमी जो थे…पर कुछ नहीं था तो मन की शांति।

बिरजू सिलबट्टे पर प्याज मिर्चा धनिया लहसुन को पीसकर चटनी बना रहा था…बट्टे को तेजी से आगे – पीछे होते देखकर सेठ जी अपने अतीत में खो गए।

कैसे वह भी एक समय अपनी छोटी सी दुकान में सिलबट्टे पर मस्त चटनी पीसा करते थे। उनके हाथ का चाय नाश्ता करने के लिए भारी भीड़ जुटी रहती थी। सरकारी फैक्ट्री के ठीक सामने उनके पिता ने बड़ी मशक्कत के साथ झोंपड़ा डाला था और धीरे – धीरे उसकी जगह छोटी सी दुकान बना ली थी जो बाद में छोटा सा रेस्टोरेंट बन गई थी।

बेटा पढ़ लिखकर कर कृषि वैज्ञानिक बन गया था और अपने शहर को छोड़कर बेटे बहू के साथ बड़े शहर आना पड़ा था। किसी के पास उनसे बात करने का समय ही न था।

लीजिए सेठ जी !
गरमा गरम लिट्टी चोखा तैयार है…चटनी के साथ….इसी के साथ विचारों की तन्द्रा भंग हुई….हैं…हां – हां…क्या खुशबू है…बिल्कुल मेरी वाली…

मूसलाधार पानी अनवरत बरस रहा था… पर अब बिरजू के मन में खुशी और मुख पर संतोष भरी मुस्कान थी।

साहब, आप इतनी अंधेरी और मौसम की मारी रात में कहाँ जाएंगे।
क्या बताऊँ भाई, मैं दूसरे शहर गया हुआ था। वापसी में अंधेरा और तेज बारिश की वजह से रास्ता भटक गया और पता नहीं कहां से होता हुआ तुम तक आ पहुंचा।
साहब, किसी ने सच ही कहा कि “जहाँ दाने, वहाँ खाने”
सच ही कहते हो भाई, ” दाने- दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम”…..मैं न भटकता तो इतने बढ़िया खाने से वंचित रह जाता…थोड़ा मुस्कुराते हुए सेठ जी बाहर की तरफ देखते हुए बोले, पर चेहरे पर चिंता भी साफ झलक रही थी।

वक़्त भी करता है क्या – क्या सितम,
कभी पैसा न था पर नहीं था कोई गम,
सिलबट्टे पे जीवन पिसता तो था,
दिन – रात पसीना छलकता तो था,
तपते कढ़ाऐ सी उबलती तो थी जिंदगी,
पर जिंदगी पे कोई रोष न था,
अब शहर में घर है गाड़ी तो है,
धन है दौलत है विलासिता तो है,
साथ हैं सब पर नहीं है परिवार का संग,
है तो बीमारी कमजोर है हर अंग..

क्या सोचने लगे सेठ जी, मेरी मानिए तो रुक जाइए और आज रात यहीं काट लीजिए, भोर होते ही रवाना हो जाइएगा। तख्ते के कोने में रखा बिस्तर झाड़कर करीने से बिछाता बिरजू बोला।

ठीक कहते हो भाई, मैं भी इसी चिंता में था…तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद।
तीन तरफ से खुले झोंपड़े में ठण्डी हवा के झोंके हल्की सी फुहार ऊपर डाल जाते थे, फिर भी सेठ जी खूब गहरी नींद में सोए। बिरजू बेंच पर दरी बिछाकर सो गया था।

सुबह पौ फटते – फटते बारिश धीमी होने लगी थी। अब केवल हल्की फुहार ही पड़ रही थी। सूर्यदेव हल्की सी लालिमा लिए इंद्रधनुष बनाने की तैयारी कर रहे थे। बादल हौले – हौले सिमट रहे थे।

सह्रदय बिरजू के अपनेपन ने सेठ जी का दिल जीत लिया था। उसकी दुर्दशा ने उन्हें विचलित कर दिया था। अब उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था बिरजू को अपने साथ ले जाके हाईवे लिट्टी – चोखा ढाबा खोलने का।

बारिश थम चुकी थी। चारों ओर मिट्टी की सौंधी खुशबू फैल चुकी थी। सेठ जी और बिरजू मोटी – मोटी रोटियां और हरी चटनी बनाते हुए इंद्रधनुष को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन दोनों के जीवन का रीतापन भरने वाला था। उनका फीका हो चुका जीवन अब फिर से इंद्रधनुष के सतरंगी रंगों से भरने वाला था।


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