तुम्हीं तुम हो

हम सबका का एक ही सहारा परब्रह्म पारमेश्वर हैं। सारे आसरे त्याग कर उनसे प्रेम करते ही वह हम सबको अपनी शरण में ले लेते हैं।
Hum sabka ek hi sahara Parbramha Parameshvar hain. Saare aasare tyaag kar unase prem karate hi woh hamen apni sharan mein le lete hain.

तुम्हीं तुम हो
मेरे लिए,
ब्रम्हांड में भी हो,
और पार भी हो,
सर्वज्ञ हो,
मर्मज्ञ हो,
देवी मेरी,
मेरे देव हो,
तुम्हीं तुम हो दाता मेरे,
रखवाले मेरे तुम हो,
शब्द तुम्हीं,
तुम्हीं गीत हो,
वाद्य तुम्हीं,
संगीत भी हो,
घण्टी में तुम्हीं,
बंशी में तुम हो,
डमरू में तुम्हीं,
हर नाद में तुम हो,
रागों में राग हो,
तुम्हीं बैराग्य हो,
तुम्हीं मेरी पुस्तक,
तुम्हीं मेरा ज्ञान हो,
अंखियों में सदा,
बसे तुम हो,
जिधर देखूं,
तुम्हीं तुम हो,
मेरी सदा से,
तुम्हीं प्रीत हो,
मैं खण्डों में विभाजित हुआ जा रहा,
टूटता बिखरता बहा जा रहा,
हे करुणा के सागर,
समेटो मुझे,
तुम्हीं तुम सम्पूर्ण हो,
अखण्ड हो,
तुम्हीं तुम हो,
तुम्हीं तुम हो।

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“समाया” Inside

कितने आश्चर्य की बात है कि ईश्वर रोम रोम में समाया हुआ है और रोम रोम ईश्वर में…जो बुद्धि से परे तो है किंतु प्रेम के वश में है।

तेरे भीतर जग समाया,
तू सबके भीतर समाया,
इन नैनों से दिखता जो भी,
वह सब है तेरी ही छाया,
सबकी अपनी सीमा रेखा,
सबकी अपनी अपनी काया,
एक असीमित तो तू ही है,
सब कोई तेरा ही साया,
अणु घूमे परमाणु घूमे,
घूमे ग्रह नक्षत्र बिन पहिया,
करें परिक्रमा तेरी ही सब,
खूब निराली तेरी माया,
स्थिर है तो एक तू ही है,
कहीं न आया कहीं न जाया,
यह कहे मेरा वह कहे मेरा,
सबको अपना ही सुख भाया,
सबके भीतर एक तू ही है,
कौन है अपना कौन पराया,
सब कोई ढूंढे तुझको ही,
यहां न पाया वहां न पाया,
जिसने प्रेम किया खुद मिटकर,
उसी के भीतर तू प्रगटाया।


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लालच Greed

जो है…उसके महत्त्व का भान नहीं है…जो नहीं है…उसे पाने की भरपूर चाहत है। इसी और पाने की ललक जब लालच का रूप ले लेती है तो पतन भी कर देती है। इसीलिए अधिक लालच करके फंसने से बचना चाहिए।

चना भले ही सूखा था,
दुबला पतला बूढ़ा सा था,
झुर्रियों से था भरा हुआ,
छोटा पिचका नन्हा सा था,
पर फुर्ती में अव्वल था,
छिटक के दौड़ लगाता था,
ठोस था तन से और बदन से,
जोर बड़ा आवाज में था
पर कुछ पाने की चाहत थी,
इसीलिए वह खुश न था,
प्यास सताती थी सुख की,
जनम जनम का प्यासा था,
इक दिन खा के तरस किसी ने,
दिया उसे पानी में डाल,
पानी के बर्तन में डल के,
चने का मन था हुआ निहाल,
फूल फाल के हो गया कुप्पा,
गालें हो गईं लालमलाल,
इतना पानी मिलने पर भी,
प्यास नहीं बुझ पाती थी,
अतृप्त रहा था सुबहो तक,
तृप्ति कहां हो पाती थी,
और अधिक लालच में आ के,
हुआ चने का बुरा ही हाल,
रखा किसी ने आग पे बर्तन,
दिए मसाले ऊपर डाल
उबल आग पर बड़ी जोर से,
किया स्वयं से एक सवाल,
क्यों थोड़े पानी से ही,
काम नहीं चल पाया था,
रात रात भर सोख के पानी,
और क्यों मन ललचाया था,
न पड़ता इतना लालच में,
न पड़ता मुझपे यह जाल,
संग सदा मैं रहता सबके,
कभी न आता मेरा काल,
ओ बंधू ओ मित्र सुनो सब,
बुरा है लालच का जंजाल,
छोड़ो इसको सुख से जीओ,
भीतर बाहर रहो निहाल।


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“भादो” (Bhado)

लघु कथा (Short Story)

समय यही कोई सुबह के छः बज रहे होंगे। रात भर के उमस से भरे छोटे से टैंट से निकलकर आकाश पास ही बुझे हुए अलाव के पास चला गया, जो रात में ही जलाया गया था।

राख को एक छोटी सी डंडी से हटाकर देखा तो लकड़ी कोयला बन कर अभी भी थोड़ी-थोड़ी सुलग रही थी। हल्की सी चोट से ही सुलगते कोयले से राख झड़ गई और सुर्ख अंगारे दिखने लगे। उन्हीं के साथ खेलते खेलते आकाश अतीत की गहराइयों में समाता चला गया।

उसकी नई नई शादी हुई थी। उसकी पत्नी बरखा अपने नाम के अनुरूप ही जिधर से निकल जाती, सौंधी खुशबू फैला जाती।

बरखा ने अपने मां बाप को कभी एहसास ही ना होने दिया था कि वह लड़का नहीं लड़की है। शुरू से ही उसका मन आकाश की बुलंदियों को छू लेना चाहता था। उसका एडमिशन भी एक बड़े अच्छे से सैनिक स्कूल में हो गया था।

आज बरखा बहुत खुश थी, होती भी क्यों न, पहली बार फाईटर प्लेन जो उड़ा कर आई थी। अब वह अपने मां बाबूजी की ही बेटी न थी। पूरे देश की बेटी थी।

आकाश बचपन से ही नई-नई खोजें करना चाहता था, पर लैब में नहीं। उसका मन तो हरियाली में ही रमता था। तभी तो वह उच्च शिक्षा लेकर डी आर डी ओ में वनस्पति वैज्ञानिक बन गया था और अपनी टीम के साथ देश भर के जंगलों – पहाड़ों पर नित्य नई खोजें किया करता था।

शादी के बाद तो दोनों को जैसे पंख से लग गए थे। दोनों अपने-अपने नाम के अनुरूप ही थे। आकाश का भावुक हृदय बहुत विशाल था और बरखा तो मानो आकाश के लिए ही बनी थी। क्या खूब जोड़ी थी उन दोनों की, दोनों बहुत खुश थे।

आकाश के ऊपर तो जैसे बिजली ही गिर गई हो। मानो करंट ने उसके तन-बदन को झिंझोड़ कर रख दिया हो। खबर थी ही ऐसी, बरखा का फाईटर प्लेन महासागर के ऊपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

हजार कोशिशों के बाद भी उसका कोई पता न चल सका था। मानो बेदर्द सागर ने उसकी बरखा को लील लिया हो और वापस लौटाने की कोई गुंजाईश ना हो।

जैसे भादो के महीने में हर पल बदलता मौसम भ्रमित करता रहता है, लगता है अभी बरसेगा और पल में ही धूप निकल आती है। मानो भादो के बादल लुका छुपी कर रहे हों। कुछ ऐसा ही उसके जीवन में भी घटित हो रहा था।

पर आकाश को पूरा भरोसा था कि कभी न कभी सूर्य अपनी रश्मियों से सागर में समाई बरखा को उठा लेगा और वह फिर से उसके सूने जीवन की हरियाली बन कर उसके ऊपर बरस जाएगी।

सहसा अंगारे से उड़कर एक हल्की सी चिंगारी ने आकाश के हाथ पर पड़ कर उसे मानो सोते से जगा दिया हो। सूने मन से अंगड़ाई लेता हुआ वह उठ खड़ा हुआ।

तभी टैंट के भीतर से किसी की हर्ष मिश्रित आवाज आई। आकाश! वायरलैस पे हेडक्वार्टर से संदेश आया है कि विंग कमांडर बरखा की खोज पूरी हो गई है। अब वह स्वस्थ और सुरक्षित हैं और एयरफोर्स वाले उन्हें जल्द लेकर तुम्हारे घर आने वाले हैं।

आकाश की बुझी आंखें फिर से चमक उठीं। मुस्कुराकर सर उठा कर ऊपर देखा तो भादो की काली घटाएं उमड़ घुमड़ कर आ रही थी और इस बार मानों आकाश पर झमाझम बरस कर उन दोनों के नाम को सार्थक बना देना चाहती थीं।

“आस”(Hope)

लघुकथा (Short Story)

भी रेगिस्तान भी तो समुंद्र रहा होगा। सागर की लहरें वहां भी तो हिलोरें भरती रही होंगी। तभी तो जल की जगह आज रेत की लहरों का सूखा समुंद्र चारों ओर दिखाई देता है। शायद इसीलिए रेगिस्तान में भटकते लोगों को मृगतृष्णा के कारण रेत की लहरें भी सागर की लहरों की मानिंद दिखाई देती हैं।
से ही रेगिस्तानी इलाके के दूरदराज में बसे पुराने गांवों में से एक गांव था वह। ज्यादातर मिट्टी से बने कच्चे मकान थे। केवल एक ही मकान पक्का था, जो अब देखरेख न हो पाने के कारण जर्जर होता जा रहा था।
दो – तीन कमरों के मकान के दालान में छोटी सी चारदीवारी थी, जिसके बीचों बीच लगे किवाड़ की कुण्डी आधी तो चमकती थी, पर आधी जंग से जंग हार रही थी और बापू की निगाहें उस कुण्डी को अपलक निहारती रहतीं थीं।
दालान में एक अदद पेड़ था, जो अक्सर शान्त ही रहता था और उसी के बगल में एक हैंडपंप था, जिसकी आवाज अब कम ही आती थी।
भी कोई आहट होती तो किवाड़ पहले ही चीं चीं कर बता देता…..पेड़ की पत्तियाँ हौले से सरसरा जातीं और नल से भी इस आस में पानी की दो बूंदे टपक जातीं कि कोई तो होगा अपना सा। जो भीतर कदम रखेगा और बापू को प्रणाम करके मुस्कुराते हुए अपना मैडल बापू के गले में पहना देगा…..कभी तो वह दिन आएगा।
स घर के पुरखों ने भी जंगें लड़ीं थीं….बेटे ने भी….जो लगभग बीस साल पहले नई नई वर्दी पहनकर ऊँट की सवारी करता हुआ शान से बार्डर की ओर पहरेदारी करने निकला था….पर लौटा नहीं।
रेगिस्तान में भी नमी न थी और बापू की आंखों में भी सूखे की कोई कमी न थी, जिनमें अब नमी आने की सम्भावना भी न के बराबर ही थी।
मौसम करवट बदल रहा था। रातें ठण्डी होने लगीं थीं। मौसम की मानिंद बापू की आस भी ठण्डी पड़नी शुरू हो गई थी और एक दिन बापू ने फौजी बेटे के आने की आस छोड़ दी। अब कोई आस शेष न बची थी।
ज पहली बार बापू ने स्वयं को बड़ा ही हल्का महसूस किया…क्योंकि भार तो इच्छाओं का ही होता है।
जैसे जैसे शाम ढलती जा रही थी, बापू अवचेतन में समाते जा रहे थे।
खिरकार अगले जन्म में नई प्रेरणा, नई चेतना और नई ऊर्जा के साथ उन्हें फौजी की वर्दी जो चाहिए थी।।