“चाँदनी”(Moonlight)

“चाँदनी”

इक रात चाँदनी मेरे आँगन में आई, हौले से वह मेरी पलकों में समाई,
मैं अपलक खड़ा निहारता रह गया उसे,
मैं अवाक था मगर मेरे दिल ने पूछा,
ऐ चाँदनी तुम यहाँ कैसे आई हो,
क्या मेरे लिए कोई सौगात लाई हो,
जब आँख खुली तो पाया मैंने,
चाँदनी सी चमकती इक मूरत थी वहाँ,
रात चाँदनी से मेरे दिल ने पूछा था जहाँ, पास गया और अपलक देखा,
मूरत वह ममतामयी थी,
कोई और नहीं माँ थी मेरी,
मुझे जिसकी बहुत जरूरत थी।