उलझन Confusion

हम अक्सर इन्हीं उलझनों से घिरे रहकर परेशान और उदास रहते हैं कि संसार में वह ऐसा क्यों है और मैं…जिस दिन यह सब छोड़कर हम सत्कर्मों में लग जाते हैं, उसी दिन से उलझनों की गांठे सुलझना शुरू हो जातीं हैं…
We are often troubled and sad by being surrounded by these confusions that why every person and personality is so different…The day we leave all this and engage in good deeds, from that day the knots of confusion start to unravel.

सबकी अपनी अपनी बुद्धि,
सबके पास है अपना मन,
कोई तरसे दाने दाने को,
किसी के घर है धन ही धन,
कोई कलूटा काला बदसूरत,
किसी का स्वर्ण सा दमके तन,
किसी के मुख से झड़ते फूल,
कोई फुंफकारे काढ़ के फन,
कोई फाड़े कपड़े सबके,
कोई सबके लिए सज्जन,
सबके अपने कर्म – अपना स्वभाव,
छोड़ दे तूं सारी उलझन,
कर सत्कर्म – बन पावन – तप के,
सदा नहीं रहता जीवन।


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“विद्याधन” (Knowledge is money)

यह सच है कि धन से समस्त संसार चल रहा है, पर यह उससे भी बड़ा सत्य है कि विद्या से जो ज्ञान उपजता है वह कभी नाश नहीं होता। विद्याधन के साथ धन तो धन, यश भी खिंचा चला आता है।
It is true that the whole world is running with money. But it is even more true that the knowledge is never destroyed. With knowledge, wealth also comes with and fame.

नीरज और सरल यूं तो सगे भाई थे पर सामर्थ्य के हिसाब से बड़ा अंतर था दोनों में।

नीरज जहां एक बहुत बड़ा व्यवसायी था और अकूत सम्पत्तियाँ अर्जित करता हुआ धीरे – धीरे शहर की सबसे बड़ी आसामी बनता जा रहा था, वहीं सरल प्राइवेट नौकरी करता था और उसे अपने कम वेतन में ही महीने भर गुजारा करना पड़ता था। एक तो किराये का घर और ऊपर से गृहस्थी का बोझ….

कैसी विडम्बना थी…एक ही शहर में रहते हुए दोनों परिवार कभी – कभार सुख – दुख में ही मिल पाते थे। कभी नीरज भईया के यहाँ बड़े फंक्शन का न्यौता मिलने पर सरल का जीवन कठिन हो उठता।

यहां तो कम खर्च में भी काम चल जाता था पर नीरज भईया के यहां तो शहर की नामी गिरामी हस्तियों समेत बड़े – बड़े नेतागण भी आमंत्रित होते थे…इसीलिए उनके सारे फंक्शन शहर के सबसे बड़े होटलों और रिसॉर्ट्स में हुआ करते…लोक लाज के चलते एक दो माह का वेतन दिखावे की भेंट चढ़ जाता और साल भर का बजट गड़बड़ हो जाता।

कितने सुखी दिन थे बचपन के, जब दोनों में इतना प्यार था कि एक दूसरे के लिए जान छिड़कते…झगड़ते भी तो पल में हो एक हो जाते, तीन सालों का ही तो अंतर था दोनों में।

पापा अकेले पड़ जाते इसलिए उन्होंने नीरज को आठवीं से ही अपने साथ शोरूम ले जाना शुरू कर दिया था। पैसे कमाने का गुर नीरज में शुरू से ही था और जिम्मेदारी से बिजनेस सम्भालते उसकी पढ़ाई मुश्किल से बारहवीं तक ही हो पाई थी। उधर मां का लाडला सरल अपनी पढ़ाई लिखाई में ही व्यस्त रहता था।

कितना काला पन्ना था उन दोनों के जीवन के अध्याय का वह…जब उनके पापा रोज की तरह बैंक में रुपया जमां करने जा रहे थे और बदमाशों ने दिन दहाड़े गोली मारकर लूटपाट कर ली थी।
सीधी सादी मां यह सदमा सह न पाईं थीं और बीमार होकर जल्द ही पापा के पास चली गईं थीं।

उन दोनों का जीवन सुचारू रूप से चले, इसलिए रिश्तेदारों ने आनन फानन में ही नीरज की ग्रहस्थी बसवा दी थी और जो कम आयु में ही बड़ी भी हो गई थी।
भाभी जिन्हें सरल मां का दर्जा देता था, बोलतीं तो मीठा थीं पर उन्होंने पता नहीं क्या किया था कि भईया ने एक दिन साफ कह दिया था…

देखो सरल, अब हमसे और न हो पाएगा…तुम्हारे भतीजे को भी पालना है और हमारे खर्चे भी बहुत अधिक हैं… तुम्हारे लिए इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारा ब्याह करा देता हूँ और कुछ पैसे भी दे दूंगा और फिर जहाँ चाहे खुशी से रह लो।

कितनी आसानी से एक ही साँस में कह गए थे भईया। सरल स्वभाव का मां का लाडला कुछ कह ही न पाया था…बेचारे का मुंह सूखे बेर की तरह सूख गया था और जबान तालू में चिपक कर रह गई थी…नाखूनों से उंगलियों की पोरों को कुरेदता नजरें नीची किए किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया था वह…

एक तो नया नया ब्याह और ऊपर से किराए का घर…भईया ने तीन महीनों का किराया तो दे दिया था…आगे की चिंता थी। पत्नी को चाहकर भी सुख नहीं दे पा रहा था वह। विवाह के बाद घूमने का सपना पहला साल बीतते बीतते धूमिल होने लगा था।

सरल की पत्नी संयुक्ता बड़ी अच्छी लड़की थी। पढ़ी लिखी, समझदार और मितव्ययी। अपने साथ अपना लैपटॉप और प्रिंटर वगैरह भी ले आई थी जिसपे वह कम्प्यूटर ग्राफिक्स सीखा करती थी।

सरल को शुरु से ही लेखन का बहुत शौक था। साहित्य में उसकी बड़ी पकड़ थी। अक्सर रात में मौका मिलने पर एकाध कविता कहानी लिख देता और संयुक्ता को सुनाकर ही खुश हो जाता।

आज सरल को बहुत बड़ा सरप्राइज मिला था। संयुक्ता ने उसके लेखन को कम्प्यूटर में लिखकर प्रिंट कर लिया था और आज उसके प्रयासों के कारण एक बहुत बड़े पब्लिशर ने सरल की पुस्तक को प्रिंट करना स्वीकार कर लिया था। उसको तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका साहित्य अब मूर्त रूप लेने जा रहा है।

आज नीरज भईया आगे की पंक्ति में गणमान्य व्यक्तियों के साथ बैठे माननीय राज्यपाल जी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

समूचा ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। गेंदे के ताजे फूल मद्धिम रोशनी और कर्णप्रिय संगीत के साथ सुगंध बिखेर रहे थे।

आज राज्य भर के साहित्यकारों, कवियों और लेखकों में से चुने गए सरल को लेखन सर्वोच्च सम्मान दिया जाना था।
नीरज भईया चहक चहक कर सबको बता रहे थे…अरे सरल मेरा सगा छोटा भाई है।

आज इतना सम्मान मिलने के बाद सरल के ‘धन्यवाद के दो शब्द’ बोलने पर समूचा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था…पत्नी की प्रशंसा करते हुए कितना भावुक हो उठा था वह।

आज सच्चे अर्थों में विद्या का पलड़ा फिर से धन के पलड़े से भारी हो गया था और उसी विद्या से संयुक्ता ने सरल को संयुक्त कर दिया था।


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