चिंता Worries

जीवन में सुख व दुख दोनों ही अपने निर्धारित समय पर आते जाते रहते हैं। सुख के तो कहने ही क्या…वह तो दुख ही है जो बेचैनी, चिंता व अवसाद देता हुआ चिता ही बन जाता है, पर यदि इस चिता रूपी चिंता को चिंतन में परिवर्तित करने का प्रयत्न करें तो मन शांत व स्थिर होना शुरू हो जाता है।
Both happiness and sorrow keep coming and going at their fixed time in life. Happiness is amazing. It’s the only sadness that turns into a pyre giving restlessness, anxiety and depression, but if you try to convert this grave-like worry into positive contemplation, then the mind starts to become calm and stable.

चिंता तोड़े तन बदन को
निचुड़े सारा मन मस्तिष्क
चिंता माने हार पल भर में
करे विचारों को संकुचित
ग्रीवा झुके हर इक के आगे
शब्द न हों मुख से स्फुटित
भूले सद् राहें रहे भ्रमित
स्थिर न हो पाए चित्त
मेल जोल सब छोड़ छाड़ कर
एकांत में रहे व्यथित
हंसना गाना भूल भाल सब
बैठ रोए कोने में नित
जिसकी बैचैनी बनती चिंता
मृत समान वह रहता जीवित
चिंताओं के पार क्षितिज है
असीमित व अपरिमित
चहुँ ओर प्रकाश की फैलीं किरणें
किंचित मात्र भी नहीं तिमिर
बरखा बहार संग गुनगुनाए
सुगंध बयार में घुल जाए
ऐसा हो सकता है सच में
जब चिंता चिंतन बन जाए
जब चिंता चिंतन बन जाए।


जागो Wake up

हमारी पूरी जिंदगी जोड़ – घटाव यानी सुख का पीछा करने में ही बीत जाती है और हम असली सुख देने वाले को बिसारते रहते हैं, परन्तु सोते से जागने और सच्चे सुख को पाने की शुरुआत कभी भी हो सकती है।

उम्र बढ़ती रही,
मैं बिगड़ता रहा,
लालसा बढ़ती रही,
मैं बढ़ाता रहा,
मासूमियत छोड़ कर,
वह बचपन की,
जवानी में गोते लगाता रहा,
मैं जोड़ता रहा,
तमाम उम्र बहुत कुछ,
पर अनमोल सांसें गंवाता रहा,
मैं समझता रहा,
गहरे समंदर में खुद को,
पर कीचड़ में खुद को लिपटाता रहा,
दुनिया को हर पल निहारा किया,
पर खुद से ही,
नजरें चुराता रहा,
जो न करना था,
वह ही किया उम्र भर,
जो था करना,
उसी से किनारा मैं करता रहा,
गर अब भी जाग जाऊं,
सोते से आज भी,
मिलेगा वह जो,
हर क्षण है,
दिल में धड़कता रहा।


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