तुम्हीं तुम हो

हम सबका का एक ही सहारा परब्रह्म पारमेश्वर हैं। सारे आसरे त्याग कर उनसे प्रेम करते ही वह हम सबको अपनी शरण में ले लेते हैं।
Hum sabka ek hi sahara Parbramha Parameshvar hain. Saare aasare tyaag kar unase prem karate hi woh hamen apni sharan mein le lete hain.

तुम्हीं तुम हो
मेरे लिए,
ब्रम्हांड में भी हो,
और पार भी हो,
सर्वज्ञ हो,
मर्मज्ञ हो,
देवी मेरी,
मेरे देव हो,
तुम्हीं तुम हो दाता मेरे,
रखवाले मेरे तुम हो,
शब्द तुम्हीं,
तुम्हीं गीत हो,
वाद्य तुम्हीं,
संगीत भी हो,
घण्टी में तुम्हीं,
बंशी में तुम हो,
डमरू में तुम्हीं,
हर नाद में तुम हो,
रागों में राग हो,
तुम्हीं बैराग्य हो,
तुम्हीं मेरी पुस्तक,
तुम्हीं मेरा ज्ञान हो,
अंखियों में सदा,
बसे तुम हो,
जिधर देखूं,
तुम्हीं तुम हो,
मेरी सदा से,
तुम्हीं प्रीत हो,
मैं खण्डों में विभाजित हुआ जा रहा,
टूटता बिखरता बहा जा रहा,
हे करुणा के सागर,
समेटो मुझे,
तुम्हीं तुम सम्पूर्ण हो,
अखण्ड हो,
तुम्हीं तुम हो,
तुम्हीं तुम हो।

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खुदा God

अब तक मुझे दिखा नहीं,
गल्ती मेरी,
उसकी नहीं,
चिलमन है आँखों में मेरी,
वह नहीं पर्दानशीं,
गल्ती है कानों की मेरी,
अब तक सुनी न धुन बंशी,
जुदा नहीं,
खफा नहीं,
नहीं है गुमशुदा कहीं,
यूँ है तो वह हर कहीं,
अभी यहीं,
सदा यहीं,
यह रुकावट बेवजह नहीं,
इसका भी है इलाज यहीं,
मन बात करता फिर रहा,
चौबीसों घँटे लड़ रहा,
कालिख है खुद पे मल रहा,
धूल में है सन रहा,
जो देखा इसको साफ कर,
हर इक को दिल से माफ कर,
तब जाना,
के क्यूं दिखा नहीं,
अब तक मुझे खुदा कहीं,
देखा पलट के खुद को जब,
जाना के है खुदा यहीं।


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लालच Greed

जो है…उसके महत्त्व का भान नहीं है…जो नहीं है…उसे पाने की भरपूर चाहत है। इसी और पाने की ललक जब लालच का रूप ले लेती है तो पतन भी कर देती है। इसीलिए अधिक लालच करके फंसने से बचना चाहिए।

चना भले ही सूखा था,
दुबला पतला बूढ़ा सा था,
झुर्रियों से था भरा हुआ,
छोटा पिचका नन्हा सा था,
पर फुर्ती में अव्वल था,
छिटक के दौड़ लगाता था,
ठोस था तन से और बदन से,
जोर बड़ा आवाज में था
पर कुछ पाने की चाहत थी,
इसीलिए वह खुश न था,
प्यास सताती थी सुख की,
जनम जनम का प्यासा था,
इक दिन खा के तरस किसी ने,
दिया उसे पानी में डाल,
पानी के बर्तन में डल के,
चने का मन था हुआ निहाल,
फूल फाल के हो गया कुप्पा,
गालें हो गईं लालमलाल,
इतना पानी मिलने पर भी,
प्यास नहीं बुझ पाती थी,
अतृप्त रहा था सुबहो तक,
तृप्ति कहां हो पाती थी,
और अधिक लालच में आ के,
हुआ चने का बुरा ही हाल,
रखा किसी ने आग पे बर्तन,
दिए मसाले ऊपर डाल
उबल आग पर बड़ी जोर से,
किया स्वयं से एक सवाल,
क्यों थोड़े पानी से ही,
काम नहीं चल पाया था,
रात रात भर सोख के पानी,
और क्यों मन ललचाया था,
न पड़ता इतना लालच में,
न पड़ता मुझपे यह जाल,
संग सदा मैं रहता सबके,
कभी न आता मेरा काल,
ओ बंधू ओ मित्र सुनो सब,
बुरा है लालच का जंजाल,
छोड़ो इसको सुख से जीओ,
भीतर बाहर रहो निहाल।


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“एहसास” (Feelings)

शादी के बाद जब लड़की का मायका छूटता है तो कैसा एहसास होता है….
इन्हीं एहसासों को दर्शाती एक छोटी सी कविता…
How does one feel when a girl leaves her house after marriage ….
A small poem reflecting these feelings …

अपने माँ बाप को छोड़ के जाना,
इक अजनबी को अपना बनाना,
कैसा एहसास है,
जहां कली खिली और बड़ी हुई,
जिस घर की है चाहत दिल में बसी,
उस अँगने को छोड़ के जाना,
कैसा एहसास है,
जहां कदम कदम पर फूल बिछे,
कांटे कभी दामन छू न सके,
उस बगिया से दूर हो जाना,
कैसा एहसास है,
भईया का चुटिया पकड़ना और सताना,
सखियों संग खिलखिलाना खूब बतियाना,
उस घर को छोड़ के जाना,
कैसा एहसास है,
जहां राखी पर मिलते हैं
प्रेम भरे आश्वासन,
उस भईया की सूनी कलाई को
छोड़ के जाना,
कैसा एहसास है,
जहां पली बढ़ी और बड़ी हुई,
अपने पैरों पे खड़ी हुई,
उसी घर से बिछड़ जाना,
हाय, कैसा एहसास है।