तुलना Comparison

वैसे तो मनुष्य का स्वभाव आरम्भ से ही दूसरों से अपनी तुलना करने का रहा है। वह या तो दूसरे से श्रेष्ठ बनना चाहता है या दूसरे को श्रेष्ठ बनते देखते हुए देख कर मन ही मन कुढ़ता है।
पर जो दूसरों से अपनी तुलना नहीं करता…वास्तव में वही श्रेष्ठ होता है।
From the very beginning human nature has been to compare himself with others. He either wants to be superior to the other, or seeing the other becoming superior, he become upset.
But the one who does not compare himself to others … Actually he is the best.

आजकल तो जिसको देखो,
तुलना करने बैठा है,
पास में हो कुछ या न हो,
न जाने क्यों ऐंठा है,
बोले बातें ज्ञान भरी,
भीतर कितना रीता है,
हांके गप्पें बड़ी बड़ी,
समझे खुद को नेता है,
करता अभिनय बात बात में,
जैसे कि अभिनेता है,
देख सफलता औरों की,
मन ही मन में जलता है,
मटमैला मन सना मैल से,
एकाकी में रोता है,
रख के भीतर बुरे विचार,
ऊपर तन को धोता है,
छोड़ दे ईर्ष्या,
कर मत कुंठा,
काहे विष को पीता है,
भंवर जाल में फंस के इसके,
बारम्बार जन्मता है,
कर सन्तोष उसी में प्यारे,
जितनी तेरी क्षमता है,
मान उसी में सुख
जितनी कि,
आवश्यक आवश्यकता है,
पर सुख देखन छोड़ के भाई,
कर सन्तोष जो लेता है,
देता भगवन उसी को प्यारे,
जो सम भाव से रहता है।


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