“समाया” Inside

कितने आश्चर्य की बात है कि ईश्वर रोम रोम में समाया हुआ है और रोम रोम ईश्वर में…जो बुद्धि से परे तो है किंतु प्रेम के वश में है।

तेरे भीतर जग समाया,
तू सबके भीतर समाया,
इन नैनों से दिखता जो भी,
वह सब है तेरी ही छाया,
सबकी अपनी सीमा रेखा,
सबकी अपनी अपनी काया,
एक असीमित तो तू ही है,
सब कोई तेरा ही साया,
अणु घूमे परमाणु घूमे,
घूमे ग्रह नक्षत्र बिन पहिया,
करें परिक्रमा तेरी ही सब,
खूब निराली तेरी माया,
स्थिर है तो एक तू ही है,
कहीं न आया कहीं न जाया,
यह कहे मेरा वह कहे मेरा,
सबको अपना ही सुख भाया,
सबके भीतर एक तू ही है,
कौन है अपना कौन पराया,
सब कोई ढूंढे तुझको ही,
यहां न पाया वहां न पाया,
जिसने प्रेम किया खुद मिटकर,
उसी के भीतर तू प्रगटाया।


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“एक” (One)

सबके ह्रदय रूपी मन्दिर में प्रकाशवान एक ही परमात्मा है। नाम चाहे जो रख लें, रूप चाहे जो देख लें, पर वह अनंत एक ही है।
There is only one God illuminated in everyone’s heart temple. Whatever you name, whatever you see but that infinite is only one.

एक ही तो
सत्य है,
एक ही तो
मुक्त है,
एक ही तो
व्याप्त है,
एक ही तो
व्यक्त है,
एक ही
धरा पे है,
आकाश में भी
एक है,
एक ही
ब्रह्माण्ड में है,
और परे भी
एक है,
एक ही से
दो बना है,
दो से ही
अनेक है,
अनेक ही
फैलाव सारा,
अंत में फिर
एक है,
एक ही
आधार है,
एक ही आनंद है,
एक ही में
सुख है सारा,
एक ही
परमानंद है।