अंतर् दर्शन

ईश्वर के पावन स्वरूप का सम्पूर्ण वर्णन न ही कोई पुस्तक कर सकती है और न ही कोई मनुष्य, चाहे उसने दर्शन पा भी लिए हों। और अपने भीतर उसी को उनके पवित्र दर्शन हो सकते हैं, जिसने स्वयं को ईश्वर के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया हो।

अर्धचन्द्र
संग बिन्दी मस्तक,
देख हुआ
सब जग नतमस्तक,
दमके तेज
तुम्हारा ऐसा,
नेत्र हुए
जाते हैं चकमक,
लगा रहे जो
केवल तुझमें,
नहीं दिखा है
कोई अब तक,
कोई विरला
होता जग में,
जिसके द्वार
तू देता दस्तक,
नहीं समझ पाता है
तुझको,
लगा के बुद्धि
कोई विचारक,
वर्णन करे
समूचा तेरा,
नहीं है ऐसी
कोई पुस्तक,
वर्णन तेरे
अंतर् दर्शन का,
नहीं है आता
किसी के लब तक,
कृपा करे अपनी
जिस ऊपर,
केवल वही है
पहुंचे तुझ तक,
करो कृपा हे नाथ
अब मुझ पर,
द्वार खड़ा है
तुमरा बालक,
हे दीन दयाल
अनाथ के नाथ,
तुम स्वामी
मैं तुमरा सेवक।


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तुम्हीं तुम हो

हम सबका का एक ही सहारा परब्रह्म पारमेश्वर हैं। सारे आसरे त्याग कर उनसे प्रेम करते ही वह हम सबको अपनी शरण में ले लेते हैं।
Hum sabka ek hi sahara Parbramha Parameshvar hain. Saare aasare tyaag kar unase prem karate hi woh hamen apni sharan mein le lete hain.

तुम्हीं तुम हो
मेरे लिए,
ब्रम्हांड में भी हो,
और पार भी हो,
सर्वज्ञ हो,
मर्मज्ञ हो,
देवी मेरी,
मेरे देव हो,
तुम्हीं तुम हो दाता मेरे,
रखवाले मेरे तुम हो,
शब्द तुम्हीं,
तुम्हीं गीत हो,
वाद्य तुम्हीं,
संगीत भी हो,
घण्टी में तुम्हीं,
बंशी में तुम हो,
डमरू में तुम्हीं,
हर नाद में तुम हो,
रागों में राग हो,
तुम्हीं बैराग्य हो,
तुम्हीं मेरी पुस्तक,
तुम्हीं मेरा ज्ञान हो,
अंखियों में सदा,
बसे तुम हो,
जिधर देखूं,
तुम्हीं तुम हो,
मेरी सदा से,
तुम्हीं प्रीत हो,
मैं खण्डों में विभाजित हुआ जा रहा,
टूटता बिखरता बहा जा रहा,
हे करुणा के सागर,
समेटो मुझे,
तुम्हीं तुम सम्पूर्ण हो,
अखण्ड हो,
तुम्हीं तुम हो,
तुम्हीं तुम हो।

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“समाया” Inside

कितने आश्चर्य की बात है कि ईश्वर रोम रोम में समाया हुआ है और रोम रोम ईश्वर में…जो बुद्धि से परे तो है किंतु प्रेम के वश में है।

तेरे भीतर जग समाया,
तू सबके भीतर समाया,
इन नैनों से दिखता जो भी,
वह सब है तेरी ही छाया,
सबकी अपनी सीमा रेखा,
सबकी अपनी अपनी काया,
एक असीमित तो तू ही है,
सब कोई तेरा ही साया,
अणु घूमे परमाणु घूमे,
घूमे ग्रह नक्षत्र बिन पहिया,
करें परिक्रमा तेरी ही सब,
खूब निराली तेरी माया,
स्थिर है तो एक तू ही है,
कहीं न आया कहीं न जाया,
यह कहे मेरा वह कहे मेरा,
सबको अपना ही सुख भाया,
सबके भीतर एक तू ही है,
कौन है अपना कौन पराया,
सब कोई ढूंढे तुझको ही,
यहां न पाया वहां न पाया,
जिसने प्रेम किया खुद मिटकर,
उसी के भीतर तू प्रगटाया।


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“सत्य” (Truth)

प्रार्थना

सत्य की परिभाषा हो तुम,
सदा सर्वदा ही सत्य हो तुम,
न तेरा आरम्भ होता,
और न ही होता है अंत,
सब कुछ तुम्हीं से है खिला,
सब कुछ तुम्हीं में है मिला,
सर्वत्र समाया है तुम्हीं में,
सर्वत्र में समाए हो तुम,
हर क्षण में जागृत हो तुम्हीं तुम,
कण कण में आच्छादित हो तुम,
चाशनी में झूठ की,
लिपटा हुआ है हर कोई,
सत्य का अनुभव करा दो,
सत्य हमें भी कर दो तुम।


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“इंद्रधनुष” (Rainbow)

हर एक की जिंदगी उतार चढ़ाव से भरी होती है। कभी पर्वत के शिखर तक चढ़ जाती है तो कभी सागर के तल तक उतरती जाती है। यदि हम ईश्वर को प्रत्यक्ष मानकर स्वयं पर दृढ़ विश्वास रखें और सत्कर्म करते रहें तो एक न एक दिन सफलता अवश्य प्राप्त हो जाती है।
Each one’s life is full of ups and downs. sometimes climbing to the top of the mountain, Sometimes descending to the bottom of the ocean. If we believe in God and have strong faith in ourselves and continue to do true efforts then one day success is definitely attained.

सैंकड़ों लीटर पानी सहेजकर झोंपड़े का छप्पर इतना भारी हो गया था कि कभी भी टपक पड़ने को तैयार था। बारिश थी कि तीन दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

बिरजू इसी आस में प्याज की छोटी – छोटी पकौड़ियाँ तल रहा था कि शायद कोई भूला बिसरा इस वीरानी सी सड़क से गुजरे और चाय पकौड़ी खाए तांकि उसकी रोजी – रोटी का प्रबंध हो सके।

जुलाई सूखा ही बीत गया था, अगस्त काटे न कटता था। इतनी भीषण गर्मी पहले तो न पड़ती थी। बारिश हो ही नहीं रही थी। यूं तो सितम्बर की शुरुआत से ही बादल आते जाते रहे, मगर बरसते न थे।

पहले आस पास के गांव के लोग चायपान के लिए आते रहते थे। पर खेती सूखी हुई थी और फालतू खर्च करने के लिए ग्रामीणों के पास पैसा ही कहाँ था।


बिरजू यदा कदा झोंपड़े से बाहर निकल कर धूप से बचने के लिए माथे पर टोपी की तरह हाथ रखकर ऊपर चमकते आकाश को मायूसी से देखा करता और बड़ी मायूसी से वापिस आ कर धम्म से बैंच पर बैठ जाता और ठण्डी भट्ठी को शून्य निगाहों से यूँ घूरता रहता मानो उसकी निगाहों से ही ठण्डी भट्ठी में फिर से तपिश बढ़ जाएगी।

कहाँ तो सूखा ही सूखा, कहाँ न थमने वाली बारिश। कहाँ तो बादल थे ही नहीं और कहाँ एक के बाद एक न जाने कहाँ से आते जा रहे थे मानो, गरीब की भट्ठी ठण्डी करने के साथ – साथ उसके पेट की भट्ठी भी ठण्डी करके ही मानेंगे।

रात के करीब आठ बज रहे होंगे। ग्राहक न होने के कारण बिरजू ने दो दिन से भट्ठी नहीं सुलगाई थी। पर अब जब हिम्मत करके थोड़ी सी पकौड़ियाँ तलनी शुरू ही कीं थीं कि अचानक एक बड़ी सी कार उसके सामने आकर रुकी।

हल्का सा शीशा नीचे करते हुए सेठ जी ने कुछ पूछना चाहा, पर मूसलाधार बारिश की मोटी – मोटी बूंदों की टपटपाहट ने उनकी आवाज को जैसे दबा ही दिया। सेठ जी ने गाड़ी झोंपड़े के बिल्कुल साथ सटा दी और तेजी से दौड़कर भीतर आ गए।

परेशान तो बहुत दिखते थे पर भूख से व्याकुल भी थे। यकायक कढ़ाई से आती खुशबू से वह और सब भूल गए और तेजी से बोले….भाई, जल्दी से गरमागरम पकौड़ियाँ खिला दे…बड़ी भूख लगी है।

बिरजू की आंखों में आँसू आ गए। वाह परमेश्वर, जब तक मैने हिम्मत हारकर भट्ठी नहीं जलाई थी, तब तक कोई भी ग्राहक नहीं आया था और आज जैसे ही पहला घान तलना शुरू ही किया था कि आपने इतने बड़े सेठ जी को भेज दिया….धन्य हो प्रभु।

भाई, बहुत ही स्वाद पकौड़ियाँ हैं, कुछ और भी है खाने को….सेठ जी ने अदरक वाली चाय सुड़कते हुए पूछा।

जी साहब, अभी सत्तू भर के छोटी – छोटी लिट्टियाँ आलू बैंगन टमाटर के चोखे के साथ बना देता हूं….उत्साहित होते हुए बिरजू बोला।

सिलबट्टा देखे कितना जमाना बीत गया था…अब तो घर में सारा काम मशीनों से ही होता था। सभी कुछ था, इतने बड़े आदमी जो थे…पर कुछ नहीं था तो मन की शांति।

बिरजू सिलबट्टे पर प्याज मिर्चा धनिया लहसुन को पीसकर चटनी बना रहा था…बट्टे को तेजी से आगे – पीछे होते देखकर सेठ जी अपने अतीत में खो गए।

कैसे वह भी एक समय अपनी छोटी सी दुकान में सिलबट्टे पर मस्त चटनी पीसा करते थे। उनके हाथ का चाय नाश्ता करने के लिए भारी भीड़ जुटी रहती थी। सरकारी फैक्ट्री के ठीक सामने उनके पिता ने बड़ी मशक्कत के साथ झोंपड़ा डाला था और धीरे – धीरे उसकी जगह छोटी सी दुकान बना ली थी जो बाद में छोटा सा रेस्टोरेंट बन गई थी।

बेटा पढ़ लिखकर कर कृषि वैज्ञानिक बन गया था और अपने शहर को छोड़कर बेटे बहू के साथ बड़े शहर आना पड़ा था। किसी के पास उनसे बात करने का समय ही न था।

लीजिए सेठ जी !
गरमा गरम लिट्टी चोखा तैयार है…चटनी के साथ….इसी के साथ विचारों की तन्द्रा भंग हुई….हैं…हां – हां…क्या खुशबू है…बिल्कुल मेरी वाली…

मूसलाधार पानी अनवरत बरस रहा था… पर अब बिरजू के मन में खुशी और मुख पर संतोष भरी मुस्कान थी।

साहब, आप इतनी अंधेरी और मौसम की मारी रात में कहाँ जाएंगे।
क्या बताऊँ भाई, मैं दूसरे शहर गया हुआ था। वापसी में अंधेरा और तेज बारिश की वजह से रास्ता भटक गया और पता नहीं कहां से होता हुआ तुम तक आ पहुंचा।
साहब, किसी ने सच ही कहा कि “जहाँ दाने, वहाँ खाने”
सच ही कहते हो भाई, ” दाने- दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम”…..मैं न भटकता तो इतने बढ़िया खाने से वंचित रह जाता…थोड़ा मुस्कुराते हुए सेठ जी बाहर की तरफ देखते हुए बोले, पर चेहरे पर चिंता भी साफ झलक रही थी।

वक़्त भी करता है क्या – क्या सितम,
कभी पैसा न था पर नहीं था कोई गम,
सिलबट्टे पे जीवन पिसता तो था,
दिन – रात पसीना छलकता तो था,
तपते कढ़ाऐ सी उबलती तो थी जिंदगी,
पर जिंदगी पे कोई रोष न था,
अब शहर में घर है गाड़ी तो है,
धन है दौलत है विलासिता तो है,
साथ हैं सब पर नहीं है परिवार का संग,
है तो बीमारी कमजोर है हर अंग..

क्या सोचने लगे सेठ जी, मेरी मानिए तो रुक जाइए और आज रात यहीं काट लीजिए, भोर होते ही रवाना हो जाइएगा। तख्ते के कोने में रखा बिस्तर झाड़कर करीने से बिछाता बिरजू बोला।

ठीक कहते हो भाई, मैं भी इसी चिंता में था…तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद।
तीन तरफ से खुले झोंपड़े में ठण्डी हवा के झोंके हल्की सी फुहार ऊपर डाल जाते थे, फिर भी सेठ जी खूब गहरी नींद में सोए। बिरजू बेंच पर दरी बिछाकर सो गया था।

सुबह पौ फटते – फटते बारिश धीमी होने लगी थी। अब केवल हल्की फुहार ही पड़ रही थी। सूर्यदेव हल्की सी लालिमा लिए इंद्रधनुष बनाने की तैयारी कर रहे थे। बादल हौले – हौले सिमट रहे थे।

सह्रदय बिरजू के अपनेपन ने सेठ जी का दिल जीत लिया था। उसकी दुर्दशा ने उन्हें विचलित कर दिया था। अब उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था बिरजू को अपने साथ ले जाके हाईवे लिट्टी – चोखा ढाबा खोलने का।

बारिश थम चुकी थी। चारों ओर मिट्टी की सौंधी खुशबू फैल चुकी थी। सेठ जी और बिरजू मोटी – मोटी रोटियां और हरी चटनी बनाते हुए इंद्रधनुष को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन दोनों के जीवन का रीतापन भरने वाला था। उनका फीका हो चुका जीवन अब फिर से इंद्रधनुष के सतरंगी रंगों से भरने वाला था।


Please comment and share this short story….. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“विस्मरण” (Oblivion)

हम भले ही इस जन्म में कितनी ही ऊंचाइयों को छू लें, कितना ही सुखी क्यों न हो जाएं, पर भीतर एक खालीपन, एक रीतापन, कुछ कमीं, कुछ तड़प सदैव महसूस होती है। इसीलिए सुख भोगते हुए भी, आनंद की कमी हमेशा रहती है।
कारण एक ही है, ईश्वर को किए हुए वायदे को भूलना…..जो हम गर्भ में करके आए थे और जन्म लेते ही भूल गए…
विस्मरण को स्मरण में बदलते ही खालीपन भरने लगता है। No matter how much we achieved in our life, no matter how happy we are, but there is always an emptiness, some deficiencies, some yearning. That’s why, even while enjoying happiness, there is always a lack of pleasure. The reason is same, we’ve made promise to God in the womb and forgot as soon as we were born…
As soon as forgetfulness changes into remembrance, emptiness begins to fill.

चावल के दाने से लेकर,
दो बित्तों तक बड़ा किया,
गर्भ में तुझको पाला पोसा,
और धरा पर खड़ा किया,
करी व्यवस्था दूध की,
प्रथम तुझे आहार दिया,
बचपन तूने खेल बिताया,
यौवन का अंहकार किया,
उतरा यौवन ढली जवानी,
अधेड़ावस्था पार किया,
हुआ जीर्ण बदन अब तेरा,
जीवन का उपहास किया,
भूल गया जब तूँ भीतर था,
अंधकारमय जीवन था,
नौ माह तक तूँ कष्ट में लटका,
नर्क में तेरा डेरा था,
की प्रार्थना हे भगवन,
मुझे बचा इस जाल से,
उलझ गया हूँ पुलझ गया हूँ,
ले उबार जंजाल से,
रख ले मुझको बचा ले जीवन,
अब तूँ मुझको पाल ले,
करता हूँ वादा मैं तुमसे,
बाहर जब मैं जाऊंगा,
फँसूंगा न किसी और कृत्य में,
सुमिरन करता जाऊँगा,
भूल गए जो याद करो,
सोचो और विचार करो,
अभी नहीं बिगड़ा कुछ बंदे,
सुमिर के निज कल्याण करो।

“कृपा”(Grace)

भगवान की कृपा से ही कोई कुछ लिख सकता है। कलम वही कहानी कह रही है (One can write something only with God’s grace. Pen is telling the same story)

अवगुन से थी मैं भरी हुई,
वासनाओं से सनी हुई,
जीवन की आपाधापी की,
धूल मिट्टी में जमीं हुई,
निर्जन स्थल पर पड़ी हुई,
स्याही थी मेरी जमीं हुई,
धड़कन थी मेरी खड़ी हुई,
निसदिन थी मैं निस्तेज हुई,
अरी सखी मैं क्या बतलाऊँ,
मूर्छा में थी मैं सोई हुई, इक दिन मालिक की कृपा हुई,
घटना अंतर में घटित हुई,
आँखों में मेरी चमक हुई,
किरणें प्रकाश का पुंज हुईं,
उनकी ही कृपा के चलते,
अब मैं लिखती जाती हूँ,
हाथ पकड़ कर वह लिखवाते,
मैं इठलाती गाती हूँ।

I was loaded with demerits,
Stained with lusts,
Life was a vain run,
Frozen in dust and soil,
Lying on a lonely place,
My ink was frozen,
My heart was stop beating,
I was languishing day by day,
How do I tell you friend,
I was unconscious,
One day the God was pleased,
Some positive happened inside,
My eyes flashed,
Rays become the beam of light,
Due to God’s grace,
Now I keep writing,
He Holds my hands during writing,
Now I keep singing joyfully.