अपना पराया

जीवन भर हम लोगों को परखते ही रह जाते हैं कि यह अपना है या पराया…यहां अपने पराये और पराये अपने बन मिलते –  बिछड़ते रहते हैं। यहां तो हरदम संग चलने वाला दम भी अंत मे पराया हो जाता है…

कोई कहे अपना – कोई पराया,
किसी को कुछ भी समझ न आया,
सब कोई कर्म है अपना लाया,
भोग के हर कोई जग से जाया,
किसको कहें यह है मेरा अपना,
नहीं अपना – अपना ही साया,
जब जन्मा था – हाथ था खाली,
जो पाया सब छोड़ के जाया,
मिले जो संगी – साथी जग में,
अंत में संग न कोई जाया,
सुख में गुड़ में चींटे बन चिपके,
दुख में नजर न कोई आया,
ढूंढे बहुत सहारे व्यर्थ ही,
अंत सहारा भीतर पाया,
अपना हमदम अपने भीतर,
अंतिम दम तक साथ निभाया।


“कर्म” (Act)

निराश होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना आत्महत्या के समान है। पूरे उत्साह से काम में लग जाने से सफलता मिलना अवश्यम्भावी है।
Getting frustrated and leaving work is like suicide. It is inevitable to get success by working hard with full enthusiasm.

धरो धीर
मत हो अधीर,
रहो शांत
मिट जाए पीर,
करो कर्म
न करो शर्म,
सच पे डटो
है यही धर्म,
रहो शान्त
न करो क्रोध,
रहो प्रसन्न
मिटें अवरोध,
सोचो कम
तोड़ो सब भ्रम,
छोड़ो आलस्य
और करो श्रम,
होगी पूरी
तब तेरी आस,
जब दृढ़ होगा
मन में विश्वास।
– जसविंदर सिंह


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