“कृपा”(Grace)

भगवान की कृपा से ही कोई कुछ लिख सकता है। कलम वही कहानी कह रही है (One can write something only with God’s grace. Pen is telling the same story)

अवगुन से थी मैं भरी हुई,
वासनाओं से सनी हुई,
जीवन की आपाधापी की,
धूल मिट्टी में जमीं हुई,
निर्जन स्थल पर पड़ी हुई,
स्याही थी मेरी जमीं हुई,
धड़कन थी मेरी खड़ी हुई,
निसदिन थी मैं निस्तेज हुई,
अरी सखी मैं क्या बतलाऊँ,
मूर्छा में थी मैं सोई हुई, इक दिन मालिक की कृपा हुई,
घटना अंतर में घटित हुई,
आँखों में मेरी चमक हुई,
किरणें प्रकाश का पुंज हुईं,
उनकी ही कृपा के चलते,
अब मैं लिखती जाती हूँ,
हाथ पकड़ कर वह लिखवाते,
मैं इठलाती गाती हूँ।

I was loaded with demerits,
Stained with lusts,
Life was a vain run,
Frozen in dust and soil,
Lying on a lonely place,
My ink was frozen,
My heart was stop beating,
I was languishing day by day,
How do I tell you friend,
I was unconscious,
One day the God was pleased,
Some positive happened inside,
My eyes flashed,
Rays become the beam of light,
Due to God’s grace,
Now I keep writing,
He Holds my hands during writing,
Now I keep singing joyfully.