कालिमा से लालिमा की ओर From dark to light

वक्त को करवट बदलते पल भर भी नहीं लगता। चहकते जीवन पे कब उदासी छा जाए…महकती खुशबू कब फीकी पड़ जाए…किसी को पता नहीं।
इन असीम दुःखों की भट्ठी से तपकर जो बाहर निकल आता है, नियति उसके लिए नए आयाम प्रस्तुत कर देती है…नई राहें उसके स्वागत में विकल्पों के ताजे फूल बिछा देती है।
Time changes in a moment. When does sadness prevail in life…when life become dark…nobody knows.
One who struggle with darkness of life, destiny present new dimensions for him to grow again.

गाड़ी धीरे धीरे पटरियों पर रगड़ खाकर चायं चूं की आवाजें निकालती हुई हिचकोले लेती चली जा रही थी। एक तो पैसेंजर ट्रेन और ऊपर से इतनी भीषण भीड़। वह तो शुक्र था कि नवरात्रि के दिनों में मौसम थोड़ा बदलने लगता है।

यात्रा लंबी थी। वह सभ्य से दिखने वाले बाबूजी सुबह करीब ग्यारह बजे से ही खिड़की के बगल में लकड़ी के फट्टों वाली सीट पर बड़ी मुश्किल से बैठे हुए थे। कमर तो अकड़ ही रही थी…पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी। भीड़ के कारण गर्मी से और भी बुरा हाल था।

हरे भरे खेतों में चलती मंद बयार कभी कभार खिड़की के रास्ते हल्के से मुंह पर टकराकर मानो चिढ़ाती और तड़पा कर चली जाती थी।

दोपहर तीन बजे तक बड़ी भूख लगती रही थी। वह तो भला हो कुछ लोगों का, जो देवदूत बनकर खिड़की से रोटियों के ऊपर सब्जी और अचार रखकर पकड़ा गए थे और गाड़ी छूटते छूटते पानी का पाउच भी गोदी में डाल गए थे…कितना स्वादिष्ट लंगर था।

डूबता सूरज सामने ही था और गाड़ी बड़ी देर तक किसी छोटे से हॉल्ट पर खड़ी रही थी। उनकी खिड़की के अधटूटे पल्ले से सीधी धूप चेहरे पर पड़ कर आंखों को चौंधिया रही थी। अब तो सब्र का बांध टूट रहा था…कब रात हो और कब यात्रा थोड़ी सुखमय हो।

जितने भी स्टेशनों पर गाड़ी रुकती थी, भीड़ घटने की बजाए बढ़ती जाती थी, मानो आज ही सबको अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचना जरूरी था।

वक्त भी कैसी करवट लेता है। जिस इंसान के पास रेलगाड़ी खरीदने की हैसियत हो, वह आज उसी पैसेंजर ट्रेन में धक्के खाने को मजबूर था।

कितना खुशनसीब समझते थे वह अपने आप को। भरा पूरा परिवार, विदेशों तक फैला कारोबार, भली सी पत्नी, दो शादीशुदा बेटे और अब तो दादा भी बन गए थे।

बेटे बहुओं ने कितनी जिद्द करके विदेश यात्रा पर छुट्टियां मनाने भेज दिया था। फाईव स्टार क्रूज पर लग्जरी सुईट में पत्नी के साथ कितना सुहाना समय बीत रहा था।

एक बड़े धमाके के साथ क्रूज तेज झटके के साथ रुका था…शायद किसी बड़ी चट्टान से टकरा गया था। डेक की रेलिंग से विशाल समुंद्र में खूबसूरत सूर्यास्त को निहारती पत्नी अपने आप को संभाल नहीं पाई थीं…उनके हाथों से पत्नी का हाथ छूट गया था और वह अचानक से समुंद्र में जा समाई थीं।

पता नहीं क्या बात थी कि न ही किसी बच्चे ने फोन उठाया था और न ही किसी स्टाफ ने। दुख और निराशा के साथ यात्रा छोड़कर वापिस आने पर गार्ड ने क्षमा मांगते हुए घर के अंदर जाने नहीं दिया था। उनके भोलेपन का फायदा उठाकर बेटों बहुओं ने गहरा षडयंत्र रचकर उन्हें दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका था।

मन संसार से इस कदर उचाट हो गया था कि इतना पैसा और नाम कमाना भी उन्हें मूर्खता लगी थी।

वह किसी और पर बोझ नहीं बनना चाहते थे। इसीलिए किसी तरह से यह आघात सहकर गुरुद्वारा साहिब की शरण में पहुंच गए थे।

करना भी क्या था…गुरुद्वारा साहिब में सेवा करते रहो…चौबीसों घंटे लंगर…खाने पीने की कोई कमी नही। दवाखाना में दवाईयां और हफ्तावार डॉक्टर मिल जाते थे। सराय में एक छोटा सा कमरा भी मिल गया था।

कितने ही लोगों ने मदद करने की पेशकश की थी।
“बच्चे आपसे कुछ छीन नहीं सकते। कानून आपको आपका सब कुछ वापिस दिलवा देगा। हमारे वकील साहब आप जैसे भले इंसान का केस फ्री में लड़ने को तैयार हैं।”
पर अगर अब सब कुछ वापिस मिल भी जाता तो परिवार की बगिया जो पतझड़ बनकर मुरझा चुकी होती, उसमें एक अकेला खड़ा हरा पेड़ बनकर भी मन कहां लगना था।

मन बहुत ही व्यग्र रहने लगा था इसीलिए अब वह अपने शहर में नहीं रहना चाहते थे और कहीं दूर चले जाना चाहते थे, जहां उन्हें कोई जानता ही न हो। अब उस शहर में रहने का फायदा ही क्या था जहां अपने पराये बन चुके थे। उनसे तो अच्छे पराये ही थे जो आज भी साथ निभाने को तैयार खड़े थे।

किसी भलेमानस ने जाते देखकर रोकने की बहुत कोशिश की थी और हारकर जबरदस्ती उनकी जेब में टिकट भर के पैसे डाल दिए थे।

रात होते होते मौसम सुहावना हो गया था। अब भीड़ भी बुरी नहीं लग रही थी।
हवा के झोंकों ने मानो मां बनकर बड़े ही प्यार से थपकी देकर न जाने कब सुला दिया था।

इतनी गहरी नींद तो बचपन में ही आती थी, जब छोटे से कस्बे में किराए के मकान में तंगहाली में रहा करते थे। बिजली अक्सर गुल रहती थी। सब छत पर ही सोते थे। बस बरसात के दिनों में नीचे बिना बिजली के उमस भरे घर में सोना पड़ता था, लेकिन मां की थपकी लगते ही निंदिया रानी अपनी गोद में ले लेती थी।

आज करीब साठ सालों बाद जब सारी इकट्ठा की हुई दौलत, शोहरत, परिवार सब एक ही झटके में छूट गया, तब ऐसा लगता था जैसे मां ने ही हवा का रूप लेकर अनकहे ही कानों में कह दिया हो… “मेरे लाल, सोच मत, सो जा।”
ट्रेन रात में रफ्तार पकड़ चुकी थी…मां रात भर जागकर उन्हें सुलाती रही थीं।

खटाक की आवाज और एक हल्के से झटके से उनकी आंखें खुल गईं। शायद कोई बड़ा स्टेशन आने वाला था और गाड़ी ने पटरी बदली थी।

सामने सूरज बादलों की ओट से झांककर अपनी लालिमा से उनके चेहरे को चमका रहा था।

इतनी गहरी नींद लेने के बाद उन्होंने स्वयं को इतना तरो ताजा कभी महसूस ही नहीं किया था।

शायद नवरात्रि की पहली रात उनके जीवन की नई शुरुआत बनकर आई थी और रातभर हवा के झोंकों के रूप में मां ने अपनी गोद मे लेकर जीवन भर की सारी थकान मिटा दी थी।

गाड़ी पटरी बदल रही थी, बादल भी छंट रहे थे और सूर्य अपनी पूरी आभा से मानो उनको नहला रहा था। उनकी बोझिल आंखों की थकान जा चुकी थी और उत्साह से भरी मुस्कान चेहरे पर आ चुकी थी।

अब उनका जीवन भी नई पटरी पर तेजी से प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। उनके जीवन में कोई बन्धन नहीं था…था
तो मां का आशीर्वाद जो रात में मिल चुका था।

उनका सब कुछ पीछे छूट रहा था, पर अनुभव और ज्ञान नहीं। वह उनके साथ था, जिसे हार मान चुके लोगों में बांटना था और उन्हें संसार में धन कमाने से अधिक संस्कार कमाना सिखाना था।

अतीत की कालिमा को छोड़ जीवन भविष्य की लालिमा की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा था।


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चैन की बंशी Happy Life

वास्तव में भाग्य प्रारब्ध पर ही आधारित होता है, परन्तु यह ध्रुव सत्य है कि अपने सत्कर्मों और अथक प्रयासों से धूमिल भाग्य को सुनहरे भाग्य में बदला जा सकता है।
It’s true that destiny is based on our previous activities, but this is the absolute truth that our sacret and relentless efforts are capable to turn foggy destiny into golden destiny.

ज्योतिष सीखी मैने भी,
बड़े जोर और शोर से,
देखे हाथ दूसरों के,
और माथे हर ओर से,
इक दिन मुझको मिली थी छुट्टी,
आपाधापी के दौर से,
न जाने क्या सोच के,
अपनी ही हथेली देखी गौर से,
बड़ा ही आश्चर्यचकित हुआ था,
अरे यह क्या घटित हुआ था,
रेखाओं के नाम पे बस इक,
कड़े जतन की रेखा थी,
बन्द मुट्ठी के भीतर वह तो,
अब तक ही अनदेखा थी,
उस रेखा को न देखा था,
जो जीवन का लेखा थी,
लगी समझ अब मुझको भी,
कुछ न होगा रेखाओं से,
रेखाएं तो बनतीं मिटती,
मेरे अपने कर्मों से,
धर्म श्रेष्ठ है रेखाओं से,
धर्म तो है सत्कर्मों से,
करता हूं अब कठिन परिश्रम,
बजती बंशी चैन से।

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jeevan ka rahasya

जीवन का रहस्य ( Secret of Life)

इस कविता में जीवन की सच्चाई और रहस्यों को प्रकाशित करने का प्रयत्न किया है, पसंद आये तो अवश्य comment और Share करें, धन्यवाद। 

In this poem, I’ve tried to publish the truth and secrets of life, if you like, then comment and share, thank you.

जीवन का रहस्य

जीवन है इक कठिन चढ़ाई, 
            जिसपे चढ़ते जाना है। 
जीवन है इक आग का दरिया,
             प्रेम का जल बरसाना है। 
जीवन है इक दुख का सागर, 
            सत्य की नाव चलाना है। 
जीवन है इच्छाओं की झाड़ी, 
            संयम से कटवाना है। 
जीवन है इक अहम का पत्थर, 
            सेवा से हनवाना है। 
जीवन है इक मेघनाथ, 
            जिसे लक्ष्मण से मरवाना है। 
जीवन है रावण का पुुतला,
            राम से शीश कटवाना है। 
जीवन है माया का बन्धन,
            मोहपाश खुुलवाना है। 
जीवन है सुुंदर सी दलदल, 
            लेट के पार कर जाना है। 
जीवन है इक मात्र भुलावा, 
            सत्य का चेत कराना है। 
जीवन है इक झूठा शोर, 
            इसे अनहद नाद सुनवाना है।
जीवन है मृत्यु का साथी, 
            जिसे अमर कर जाना है। 
जीवन हैै यह अहं बुद्धि, 
            सतगुरु की बुद्धि अपनाना है। 
अहं तोड़कर – मोह छोड़कर, 
            जीवन का सब सार समझ, 
तेरे चरणों में लग जाना है। 
            हे प्रभु अब दया करो, 
दया करो प्रभु दया करो, 
            मुझे तुझमें ही मिल जाना है।

last wishes key of all secret

अंतिम स्मृतियाँ (Last Memories)

यह एक पत्ते की छोटी सी कहानी है, जो अपने परिवार से बिछड़ कर धरा पर आन पड़ा है और अंतिम सांसे गिन रहा है। उसके नेत्रों  के सामने सारी यादें चलचित्र बनकर उभर रही हैं। उसका एक मार्मिक चित्रण इस छोटी सी कविता में समाहित है। यदि कविता अच्छी लगे तो कमेंट और शेयर कर दिजिए ,धन्यवाद।

(This is a short story of a leaf, who is separated from his family and lies on the earth and is counting the last breath.  All the memories are playing in front of his eyes as a movie.  A poignant portrayal of it is contained in this short poem. If the poem looks good, please comment and share, thanks)

अंतिम स्मृतियाँ (Last Memories)

यह टूटा हुआ पत्ता पूछे,
पहले मैं भी था हरा – हरा,
सारे पत्तों संग खेला करता,
मेरा भी था परिवार बड़ा,
जब बच्चों ने झूला डाला,
तब सावन का लगा पता,
पींग मारते झूले पे,
जब आते ऊपर बच्चे,
सचमुच कितना अच्छा लगता,
झूम उठते हम सब पत्ते,
सूख गया आयु पूरी कर,
लटक गया बूढ़ा बनके,
साथ मेरा सबने छोड़ा,
जोश जवानी में तनके,
फिर पत्ते की आंखें मूंदीं,
मन उतर गया गहरे तल में,
सांसें टूटीं छूटा दामन,
अंतिम हिचकी ली नश्वर ने l


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Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh