सांझ की सुबह Dawn of Dusk

सांझ को दिल थोड़ा घबराया,
पड़ा सोच – कुछ समझ न आया,
कुछ हल्का सा पीया – खाया,
कुछ पढ़ा – सुना – कुछ गुनगुनाया,
पर अनमने मन को रास न आया,
युक्ति हुई न कोई कारगर,
दिल को अपने डूबता पाया,
सब बात भुला – करके साहस,
जोर लगा के भीतर मन का,
परदा सांझ का जरा उठाया,
था घोर अंधेरा – दिखता न था,
मीलों घण्टों खुद को भटकाया,
चूर हुआ पर हार न मानी,
मद्धिम प्रकाश नजर था आया,
रात्रि कालिमा भंग हो गई,
फटी पौ – सूरज चढ़ आया,
अब जान लिया था मैने भी,
सांझ को दिल था क्यों घबराया,
बिछड़ के अपने ही प्रकाश से,
सुख और किसी में नहीं था आया,
पर उस सांझ का अंत मधुर था,
अब था मुझको समझ में आया।


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“भोर” (Dawn)

सुबह सवेरे उठ के जो ताजगी महसूस होती है, उसका एहसास दिन भर रहता है। इसके उलट देर तक सोने से तन और मन दोनों में ही कुंठा और मनहूसियत बनी रहती है। आईये, आज से ही इस भोर का आनंद लेने का प्रण करते हैं।
The freshness that one feels after waking up in the morning remains the whole day. In contrast, late waking caused frustration both in body and mind remain for long. Come, let’s vow to enjoy this dawn from today itself.

भोर की वेला कितनी प्यारी,
कलरव करतीं चिड़ियां सारी,
खिलें पुष्प महकाएं क्यारी,
मंद बयार लगे अति न्यारी,
सूर्य प्रभा नित स्वर्ण सी चमके,
मैं क्यों न हो जाऊं वारी,
सात पहर हैं एक ओर,
चतुर्थ पहर है सब पे भारी,
जो कोई वेला उठे भोर की,
जिंदगी उसी ने है संवारी,
चित्त प्रसन्न रहे दिन भर ही,
बीमारी सब जाए मारी,
चल उठ जाग,
त्याग निंद्रा को,
कर ले खुशियों से तूं यारी।


Let’s share this positive and motivational poem with everyone… Regards, Jasvinder Singh