तुम्हीं तुम हो

हम सबका का एक ही सहारा परब्रह्म पारमेश्वर हैं। सारे आसरे त्याग कर उनसे प्रेम करते ही वह हम सबको अपनी शरण में ले लेते हैं।
Hum sabka ek hi sahara Parbramha Parameshvar hain. Saare aasare tyaag kar unase prem karate hi woh hamen apni sharan mein le lete hain.

तुम्हीं तुम हो
मेरे लिए,
ब्रम्हांड में भी हो,
और पार भी हो,
सर्वज्ञ हो,
मर्मज्ञ हो,
देवी मेरी,
मेरे देव हो,
तुम्हीं तुम हो दाता मेरे,
रखवाले मेरे तुम हो,
शब्द तुम्हीं,
तुम्हीं गीत हो,
वाद्य तुम्हीं,
संगीत भी हो,
घण्टी में तुम्हीं,
बंशी में तुम हो,
डमरू में तुम्हीं,
हर नाद में तुम हो,
रागों में राग हो,
तुम्हीं बैराग्य हो,
तुम्हीं मेरी पुस्तक,
तुम्हीं मेरा ज्ञान हो,
अंखियों में सदा,
बसे तुम हो,
जिधर देखूं,
तुम्हीं तुम हो,
मेरी सदा से,
तुम्हीं प्रीत हो,
मैं खण्डों में विभाजित हुआ जा रहा,
टूटता बिखरता बहा जा रहा,
हे करुणा के सागर,
समेटो मुझे,
तुम्हीं तुम सम्पूर्ण हो,
अखण्ड हो,
तुम्हीं तुम हो,
तुम्हीं तुम हो।

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“बढ़े चलो”(Go ahead)

न हार मानो, न ही रुको, न ही थको, चलो, आगे बढ़ो…लक्ष्य प्रप्ति निश्चित है।
Don’t give up, don’t stop, don’t be tired…Come on, go ahead … the goal is certain.

न रुको
तुम डटो,
प्रताप सूर्य
का बनो,
न थको
निसदिन चलो,
कण कण का तुम
उत्साह बनो,
ले सच का
ओट आसरा,
सच की दिशा
में ही बढ़ो,
ध्वजा को थाम
धर्म की,
काल अधर्म
का बनो,
नव ज्योति
कर प्रज्ज्वलित,
नवयुग का तुम
सृजन करो। – जसविंदर सिंह


Please share my motivational poem. Regards, Jasvinder Singh

“जाने दे” (Let it go)

हम अक्सर पुरानी बातों को अपने सर पर कूड़े की तरह ढोते रहते हैं और वह कूड़ा कब हमें कुंठित और बीमार कर देता है, हमें पता भी नहीं चलता। उस कूड़े की टोकरी को फेंककर आगे बढ़ जाना चाहिए।
We often carry old things like garbage on our head and when that waste makes us frustrated and sick, we do not even know. That garbage basket should be thrown and proceeded.

जो बीत गई
वह बात गई,
जो बात गई,
उसे जाने दे,
जिसमें था गम
और तेरी उदासी,
वह रात गई
उसे जाने दे,
मनहूस समझ
न उसे पकड़,
बहला ले दिल
उसे जाने दे,
आँसू थे जहाँ पर
नमक भरे,
उन्हें पोंछ के
मीठा खाने दे,
था कभी जो गम
कर उसको कम,
अब रीत नई
अपनाने दे,
जो खुशी मिले,
ले उसे पकड़,
था जो भी बुरा,
मिट जाने दे,
धागा गाँठें बन
उलझा था,
न वक्त गंवा
सुलझाने में,
जो रुका था पानी
बन कीचड़,
उसे छोड़ जरा
बह जाने दे,
माथे पे कितने सारे बल,
उन्हें झाड़ जरा
गिर जाने दे,
यह होंठ जो तेरे
लटके हैं,
उन्हें खुल के तूँ
मुस्काने दे,
कोई ढूंढ बहाना
खुशियों का,
खुद को खुशियाँ
बन जाने दे।


Please comment if you like this post and please don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“आस”(Hope)

लघुकथा (Short Story)

भी रेगिस्तान भी तो समुंद्र रहा होगा। सागर की लहरें वहां भी तो हिलोरें भरती रही होंगी। तभी तो जल की जगह आज रेत की लहरों का सूखा समुंद्र चारों ओर दिखाई देता है। शायद इसीलिए रेगिस्तान में भटकते लोगों को मृगतृष्णा के कारण रेत की लहरें भी सागर की लहरों की मानिंद दिखाई देती हैं।
से ही रेगिस्तानी इलाके के दूरदराज में बसे पुराने गांवों में से एक गांव था वह। ज्यादातर मिट्टी से बने कच्चे मकान थे। केवल एक ही मकान पक्का था, जो अब देखरेख न हो पाने के कारण जर्जर होता जा रहा था।
दो – तीन कमरों के मकान के दालान में छोटी सी चारदीवारी थी, जिसके बीचों बीच लगे किवाड़ की कुण्डी आधी तो चमकती थी, पर आधी जंग से जंग हार रही थी और बापू की निगाहें उस कुण्डी को अपलक निहारती रहतीं थीं।
दालान में एक अदद पेड़ था, जो अक्सर शान्त ही रहता था और उसी के बगल में एक हैंडपंप था, जिसकी आवाज अब कम ही आती थी।
भी कोई आहट होती तो किवाड़ पहले ही चीं चीं कर बता देता…..पेड़ की पत्तियाँ हौले से सरसरा जातीं और नल से भी इस आस में पानी की दो बूंदे टपक जातीं कि कोई तो होगा अपना सा। जो भीतर कदम रखेगा और बापू को प्रणाम करके मुस्कुराते हुए अपना मैडल बापू के गले में पहना देगा…..कभी तो वह दिन आएगा।
स घर के पुरखों ने भी जंगें लड़ीं थीं….बेटे ने भी….जो लगभग बीस साल पहले नई नई वर्दी पहनकर ऊँट की सवारी करता हुआ शान से बार्डर की ओर पहरेदारी करने निकला था….पर लौटा नहीं।
रेगिस्तान में भी नमी न थी और बापू की आंखों में भी सूखे की कोई कमी न थी, जिनमें अब नमी आने की सम्भावना भी न के बराबर ही थी।
मौसम करवट बदल रहा था। रातें ठण्डी होने लगीं थीं। मौसम की मानिंद बापू की आस भी ठण्डी पड़नी शुरू हो गई थी और एक दिन बापू ने फौजी बेटे के आने की आस छोड़ दी। अब कोई आस शेष न बची थी।
ज पहली बार बापू ने स्वयं को बड़ा ही हल्का महसूस किया…क्योंकि भार तो इच्छाओं का ही होता है।
जैसे जैसे शाम ढलती जा रही थी, बापू अवचेतन में समाते जा रहे थे।
खिरकार अगले जन्म में नई प्रेरणा, नई चेतना और नई ऊर्जा के साथ उन्हें फौजी की वर्दी जो चाहिए थी।।



“अजेय”(Invincible)

विपत्तियां किस पर नहीं आतीं, दुख किसको नहीं मिलता। यह तो हमारा मन ही है, जो पल में ही हार मान लेता है।
पर यदि हम उन विकट परिस्थितियों में भी अपनी विवेक बुद्धि से काम लें और मन को सकारात्मक सोचने को विवश कर दें तो दुख के घने बादलों में भी आशा की सुनहरी किरण दिखाई दे जाती है। सच ही कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

Who does not get misery, who does not get sorrow. It is our mind that concedes defeat in the moment.
But if we work with our wisdom and intellect even in those difficult circumstances and make the mind think positively, then in the thick clouds of sorrow, a golden ray of hope is seen. Truth has been told that the losers of the mind are the losers, the victories won by the mind.

मन थक पड़ा,
मन गिर पड़ा,
निराशाओं के भंवर जाल में,
उलझ पुलझ के अंधकार में,
भर भर के खूब सोच विचारा,
कहो मिटे कैसे अंधियारा,
सहज ही भीतर बिजली कौंधी,
बरस प्रेम हुई मिट्टी सौंधी,
सूखे बीजों में जान पड़ी,
हरियाली की आस बढ़ी,
सूख चुके मन के बीजों में,
कोपल इक नई फूट गई,
निर आसा के भंवर जाल में,
लता सुहानी बढ़ी नई ।