तुम्हीं तुम हो

हम सबका का एक ही सहारा परब्रह्म पारमेश्वर हैं। सारे आसरे त्याग कर उनसे प्रेम करते ही वह हम सबको अपनी शरण में ले लेते हैं।
Hum sabka ek hi sahara Parbramha Parameshvar hain. Saare aasare tyaag kar unase prem karate hi woh hamen apni sharan mein le lete hain.

तुम्हीं तुम हो
मेरे लिए,
ब्रम्हांड में भी हो,
और पार भी हो,
सर्वज्ञ हो,
मर्मज्ञ हो,
देवी मेरी,
मेरे देव हो,
तुम्हीं तुम हो दाता मेरे,
रखवाले मेरे तुम हो,
शब्द तुम्हीं,
तुम्हीं गीत हो,
वाद्य तुम्हीं,
संगीत भी हो,
घण्टी में तुम्हीं,
बंशी में तुम हो,
डमरू में तुम्हीं,
हर नाद में तुम हो,
रागों में राग हो,
तुम्हीं बैराग्य हो,
तुम्हीं मेरी पुस्तक,
तुम्हीं मेरा ज्ञान हो,
अंखियों में सदा,
बसे तुम हो,
जिधर देखूं,
तुम्हीं तुम हो,
मेरी सदा से,
तुम्हीं प्रीत हो,
मैं खण्डों में विभाजित हुआ जा रहा,
टूटता बिखरता बहा जा रहा,
हे करुणा के सागर,
समेटो मुझे,
तुम्हीं तुम सम्पूर्ण हो,
अखण्ड हो,
तुम्हीं तुम हो,
तुम्हीं तुम हो।

Please follow http://www.keyofallsecret.com


कालिमा से लालिमा की ओर From dark to light

वक्त को करवट बदलते पल भर भी नहीं लगता। चहकते जीवन पे कब उदासी छा जाए…महकती खुशबू कब फीकी पड़ जाए…किसी को पता नहीं।
इन असीम दुःखों की भट्ठी से तपकर जो बाहर निकल आता है, नियति उसके लिए नए आयाम प्रस्तुत कर देती है…नई राहें उसके स्वागत में विकल्पों के ताजे फूल बिछा देती है।
Time changes in a moment. When does sadness prevail in life…when life become dark…nobody knows.
One who struggle with darkness of life, destiny present new dimensions for him to grow again.

गाड़ी धीरे धीरे पटरियों पर रगड़ खाकर चायं चूं की आवाजें निकालती हुई हिचकोले लेती चली जा रही थी। एक तो पैसेंजर ट्रेन और ऊपर से इतनी भीषण भीड़। वह तो शुक्र था कि नवरात्रि के दिनों में मौसम थोड़ा बदलने लगता है।

यात्रा लंबी थी। वह सभ्य से दिखने वाले बाबूजी सुबह करीब ग्यारह बजे से ही खिड़की के बगल में लकड़ी के फट्टों वाली सीट पर बड़ी मुश्किल से बैठे हुए थे। कमर तो अकड़ ही रही थी…पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी। भीड़ के कारण गर्मी से और भी बुरा हाल था।

हरे भरे खेतों में चलती मंद बयार कभी कभार खिड़की के रास्ते हल्के से मुंह पर टकराकर मानो चिढ़ाती और तड़पा कर चली जाती थी।

दोपहर तीन बजे तक बड़ी भूख लगती रही थी। वह तो भला हो कुछ लोगों का, जो देवदूत बनकर खिड़की से रोटियों के ऊपर सब्जी और अचार रखकर पकड़ा गए थे और गाड़ी छूटते छूटते पानी का पाउच भी गोदी में डाल गए थे…कितना स्वादिष्ट लंगर था।

डूबता सूरज सामने ही था और गाड़ी बड़ी देर तक किसी छोटे से हॉल्ट पर खड़ी रही थी। उनकी खिड़की के अधटूटे पल्ले से सीधी धूप चेहरे पर पड़ कर आंखों को चौंधिया रही थी। अब तो सब्र का बांध टूट रहा था…कब रात हो और कब यात्रा थोड़ी सुखमय हो।

जितने भी स्टेशनों पर गाड़ी रुकती थी, भीड़ घटने की बजाए बढ़ती जाती थी, मानो आज ही सबको अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचना जरूरी था।

वक्त भी कैसी करवट लेता है। जिस इंसान के पास रेलगाड़ी खरीदने की हैसियत हो, वह आज उसी पैसेंजर ट्रेन में धक्के खाने को मजबूर था।

कितना खुशनसीब समझते थे वह अपने आप को। भरा पूरा परिवार, विदेशों तक फैला कारोबार, भली सी पत्नी, दो शादीशुदा बेटे और अब तो दादा भी बन गए थे।

बेटे बहुओं ने कितनी जिद्द करके विदेश यात्रा पर छुट्टियां मनाने भेज दिया था। फाईव स्टार क्रूज पर लग्जरी सुईट में पत्नी के साथ कितना सुहाना समय बीत रहा था।

एक बड़े धमाके के साथ क्रूज तेज झटके के साथ रुका था…शायद किसी बड़ी चट्टान से टकरा गया था। डेक की रेलिंग से विशाल समुंद्र में खूबसूरत सूर्यास्त को निहारती पत्नी अपने आप को संभाल नहीं पाई थीं…उनके हाथों से पत्नी का हाथ छूट गया था और वह अचानक से समुंद्र में जा समाई थीं।

पता नहीं क्या बात थी कि न ही किसी बच्चे ने फोन उठाया था और न ही किसी स्टाफ ने। दुख और निराशा के साथ यात्रा छोड़कर वापिस आने पर गार्ड ने क्षमा मांगते हुए घर के अंदर जाने नहीं दिया था। उनके भोलेपन का फायदा उठाकर बेटों बहुओं ने गहरा षडयंत्र रचकर उन्हें दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका था।

मन संसार से इस कदर उचाट हो गया था कि इतना पैसा और नाम कमाना भी उन्हें मूर्खता लगी थी।

वह किसी और पर बोझ नहीं बनना चाहते थे। इसीलिए किसी तरह से यह आघात सहकर गुरुद्वारा साहिब की शरण में पहुंच गए थे।

करना भी क्या था…गुरुद्वारा साहिब में सेवा करते रहो…चौबीसों घंटे लंगर…खाने पीने की कोई कमी नही। दवाखाना में दवाईयां और हफ्तावार डॉक्टर मिल जाते थे। सराय में एक छोटा सा कमरा भी मिल गया था।

कितने ही लोगों ने मदद करने की पेशकश की थी।
“बच्चे आपसे कुछ छीन नहीं सकते। कानून आपको आपका सब कुछ वापिस दिलवा देगा। हमारे वकील साहब आप जैसे भले इंसान का केस फ्री में लड़ने को तैयार हैं।”
पर अगर अब सब कुछ वापिस मिल भी जाता तो परिवार की बगिया जो पतझड़ बनकर मुरझा चुकी होती, उसमें एक अकेला खड़ा हरा पेड़ बनकर भी मन कहां लगना था।

मन बहुत ही व्यग्र रहने लगा था इसीलिए अब वह अपने शहर में नहीं रहना चाहते थे और कहीं दूर चले जाना चाहते थे, जहां उन्हें कोई जानता ही न हो। अब उस शहर में रहने का फायदा ही क्या था जहां अपने पराये बन चुके थे। उनसे तो अच्छे पराये ही थे जो आज भी साथ निभाने को तैयार खड़े थे।

किसी भलेमानस ने जाते देखकर रोकने की बहुत कोशिश की थी और हारकर जबरदस्ती उनकी जेब में टिकट भर के पैसे डाल दिए थे।

रात होते होते मौसम सुहावना हो गया था। अब भीड़ भी बुरी नहीं लग रही थी।
हवा के झोंकों ने मानो मां बनकर बड़े ही प्यार से थपकी देकर न जाने कब सुला दिया था।

इतनी गहरी नींद तो बचपन में ही आती थी, जब छोटे से कस्बे में किराए के मकान में तंगहाली में रहा करते थे। बिजली अक्सर गुल रहती थी। सब छत पर ही सोते थे। बस बरसात के दिनों में नीचे बिना बिजली के उमस भरे घर में सोना पड़ता था, लेकिन मां की थपकी लगते ही निंदिया रानी अपनी गोद में ले लेती थी।

आज करीब साठ सालों बाद जब सारी इकट्ठा की हुई दौलत, शोहरत, परिवार सब एक ही झटके में छूट गया, तब ऐसा लगता था जैसे मां ने ही हवा का रूप लेकर अनकहे ही कानों में कह दिया हो… “मेरे लाल, सोच मत, सो जा।”
ट्रेन रात में रफ्तार पकड़ चुकी थी…मां रात भर जागकर उन्हें सुलाती रही थीं।

खटाक की आवाज और एक हल्के से झटके से उनकी आंखें खुल गईं। शायद कोई बड़ा स्टेशन आने वाला था और गाड़ी ने पटरी बदली थी।

सामने सूरज बादलों की ओट से झांककर अपनी लालिमा से उनके चेहरे को चमका रहा था।

इतनी गहरी नींद लेने के बाद उन्होंने स्वयं को इतना तरो ताजा कभी महसूस ही नहीं किया था।

शायद नवरात्रि की पहली रात उनके जीवन की नई शुरुआत बनकर आई थी और रातभर हवा के झोंकों के रूप में मां ने अपनी गोद मे लेकर जीवन भर की सारी थकान मिटा दी थी।

गाड़ी पटरी बदल रही थी, बादल भी छंट रहे थे और सूर्य अपनी पूरी आभा से मानो उनको नहला रहा था। उनकी बोझिल आंखों की थकान जा चुकी थी और उत्साह से भरी मुस्कान चेहरे पर आ चुकी थी।

अब उनका जीवन भी नई पटरी पर तेजी से प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। उनके जीवन में कोई बन्धन नहीं था…था
तो मां का आशीर्वाद जो रात में मिल चुका था।

उनका सब कुछ पीछे छूट रहा था, पर अनुभव और ज्ञान नहीं। वह उनके साथ था, जिसे हार मान चुके लोगों में बांटना था और उन्हें संसार में धन कमाने से अधिक संस्कार कमाना सिखाना था।

अतीत की कालिमा को छोड़ जीवन भविष्य की लालिमा की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा था।


Please comment, share & follow my blog and enjoy reading positive posts.

“बढ़े चलो”(Go ahead)

न हार मानो, न ही रुको, न ही थको, चलो, आगे बढ़ो…लक्ष्य प्रप्ति निश्चित है।
Don’t give up, don’t stop, don’t be tired…Come on, go ahead … the goal is certain.

न रुको
तुम डटो,
प्रताप सूर्य
का बनो,
न थको
निसदिन चलो,
कण कण का तुम
उत्साह बनो,
ले सच का
ओट आसरा,
सच की दिशा
में ही बढ़ो,
ध्वजा को थाम
धर्म की,
काल अधर्म
का बनो,
नव ज्योति
कर प्रज्ज्वलित,
नवयुग का तुम
सृजन करो। – जसविंदर सिंह


Please share my motivational poem. Regards, Jasvinder Singh

“इंद्रधनुष” (Rainbow)

हर एक की जिंदगी उतार चढ़ाव से भरी होती है। कभी पर्वत के शिखर तक चढ़ जाती है तो कभी सागर के तल तक उतरती जाती है। यदि हम ईश्वर को प्रत्यक्ष मानकर स्वयं पर दृढ़ विश्वास रखें और सत्कर्म करते रहें तो एक न एक दिन सफलता अवश्य प्राप्त हो जाती है।
Each one’s life is full of ups and downs. sometimes climbing to the top of the mountain, Sometimes descending to the bottom of the ocean. If we believe in God and have strong faith in ourselves and continue to do true efforts then one day success is definitely attained.

सैंकड़ों लीटर पानी सहेजकर झोंपड़े का छप्पर इतना भारी हो गया था कि कभी भी टपक पड़ने को तैयार था। बारिश थी कि तीन दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

बिरजू इसी आस में प्याज की छोटी – छोटी पकौड़ियाँ तल रहा था कि शायद कोई भूला बिसरा इस वीरानी सी सड़क से गुजरे और चाय पकौड़ी खाए तांकि उसकी रोजी – रोटी का प्रबंध हो सके।

जुलाई सूखा ही बीत गया था, अगस्त काटे न कटता था। इतनी भीषण गर्मी पहले तो न पड़ती थी। बारिश हो ही नहीं रही थी। यूं तो सितम्बर की शुरुआत से ही बादल आते जाते रहे, मगर बरसते न थे।

पहले आस पास के गांव के लोग चायपान के लिए आते रहते थे। पर खेती सूखी हुई थी और फालतू खर्च करने के लिए ग्रामीणों के पास पैसा ही कहाँ था।


बिरजू यदा कदा झोंपड़े से बाहर निकल कर धूप से बचने के लिए माथे पर टोपी की तरह हाथ रखकर ऊपर चमकते आकाश को मायूसी से देखा करता और बड़ी मायूसी से वापिस आ कर धम्म से बैंच पर बैठ जाता और ठण्डी भट्ठी को शून्य निगाहों से यूँ घूरता रहता मानो उसकी निगाहों से ही ठण्डी भट्ठी में फिर से तपिश बढ़ जाएगी।

कहाँ तो सूखा ही सूखा, कहाँ न थमने वाली बारिश। कहाँ तो बादल थे ही नहीं और कहाँ एक के बाद एक न जाने कहाँ से आते जा रहे थे मानो, गरीब की भट्ठी ठण्डी करने के साथ – साथ उसके पेट की भट्ठी भी ठण्डी करके ही मानेंगे।

रात के करीब आठ बज रहे होंगे। ग्राहक न होने के कारण बिरजू ने दो दिन से भट्ठी नहीं सुलगाई थी। पर अब जब हिम्मत करके थोड़ी सी पकौड़ियाँ तलनी शुरू ही कीं थीं कि अचानक एक बड़ी सी कार उसके सामने आकर रुकी।

हल्का सा शीशा नीचे करते हुए सेठ जी ने कुछ पूछना चाहा, पर मूसलाधार बारिश की मोटी – मोटी बूंदों की टपटपाहट ने उनकी आवाज को जैसे दबा ही दिया। सेठ जी ने गाड़ी झोंपड़े के बिल्कुल साथ सटा दी और तेजी से दौड़कर भीतर आ गए।

परेशान तो बहुत दिखते थे पर भूख से व्याकुल भी थे। यकायक कढ़ाई से आती खुशबू से वह और सब भूल गए और तेजी से बोले….भाई, जल्दी से गरमागरम पकौड़ियाँ खिला दे…बड़ी भूख लगी है।

बिरजू की आंखों में आँसू आ गए। वाह परमेश्वर, जब तक मैने हिम्मत हारकर भट्ठी नहीं जलाई थी, तब तक कोई भी ग्राहक नहीं आया था और आज जैसे ही पहला घान तलना शुरू ही किया था कि आपने इतने बड़े सेठ जी को भेज दिया….धन्य हो प्रभु।

भाई, बहुत ही स्वाद पकौड़ियाँ हैं, कुछ और भी है खाने को….सेठ जी ने अदरक वाली चाय सुड़कते हुए पूछा।

जी साहब, अभी सत्तू भर के छोटी – छोटी लिट्टियाँ आलू बैंगन टमाटर के चोखे के साथ बना देता हूं….उत्साहित होते हुए बिरजू बोला।

सिलबट्टा देखे कितना जमाना बीत गया था…अब तो घर में सारा काम मशीनों से ही होता था। सभी कुछ था, इतने बड़े आदमी जो थे…पर कुछ नहीं था तो मन की शांति।

बिरजू सिलबट्टे पर प्याज मिर्चा धनिया लहसुन को पीसकर चटनी बना रहा था…बट्टे को तेजी से आगे – पीछे होते देखकर सेठ जी अपने अतीत में खो गए।

कैसे वह भी एक समय अपनी छोटी सी दुकान में सिलबट्टे पर मस्त चटनी पीसा करते थे। उनके हाथ का चाय नाश्ता करने के लिए भारी भीड़ जुटी रहती थी। सरकारी फैक्ट्री के ठीक सामने उनके पिता ने बड़ी मशक्कत के साथ झोंपड़ा डाला था और धीरे – धीरे उसकी जगह छोटी सी दुकान बना ली थी जो बाद में छोटा सा रेस्टोरेंट बन गई थी।

बेटा पढ़ लिखकर कर कृषि वैज्ञानिक बन गया था और अपने शहर को छोड़कर बेटे बहू के साथ बड़े शहर आना पड़ा था। किसी के पास उनसे बात करने का समय ही न था।

लीजिए सेठ जी !
गरमा गरम लिट्टी चोखा तैयार है…चटनी के साथ….इसी के साथ विचारों की तन्द्रा भंग हुई….हैं…हां – हां…क्या खुशबू है…बिल्कुल मेरी वाली…

मूसलाधार पानी अनवरत बरस रहा था… पर अब बिरजू के मन में खुशी और मुख पर संतोष भरी मुस्कान थी।

साहब, आप इतनी अंधेरी और मौसम की मारी रात में कहाँ जाएंगे।
क्या बताऊँ भाई, मैं दूसरे शहर गया हुआ था। वापसी में अंधेरा और तेज बारिश की वजह से रास्ता भटक गया और पता नहीं कहां से होता हुआ तुम तक आ पहुंचा।
साहब, किसी ने सच ही कहा कि “जहाँ दाने, वहाँ खाने”
सच ही कहते हो भाई, ” दाने- दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम”…..मैं न भटकता तो इतने बढ़िया खाने से वंचित रह जाता…थोड़ा मुस्कुराते हुए सेठ जी बाहर की तरफ देखते हुए बोले, पर चेहरे पर चिंता भी साफ झलक रही थी।

वक़्त भी करता है क्या – क्या सितम,
कभी पैसा न था पर नहीं था कोई गम,
सिलबट्टे पे जीवन पिसता तो था,
दिन – रात पसीना छलकता तो था,
तपते कढ़ाऐ सी उबलती तो थी जिंदगी,
पर जिंदगी पे कोई रोष न था,
अब शहर में घर है गाड़ी तो है,
धन है दौलत है विलासिता तो है,
साथ हैं सब पर नहीं है परिवार का संग,
है तो बीमारी कमजोर है हर अंग..

क्या सोचने लगे सेठ जी, मेरी मानिए तो रुक जाइए और आज रात यहीं काट लीजिए, भोर होते ही रवाना हो जाइएगा। तख्ते के कोने में रखा बिस्तर झाड़कर करीने से बिछाता बिरजू बोला।

ठीक कहते हो भाई, मैं भी इसी चिंता में था…तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद।
तीन तरफ से खुले झोंपड़े में ठण्डी हवा के झोंके हल्की सी फुहार ऊपर डाल जाते थे, फिर भी सेठ जी खूब गहरी नींद में सोए। बिरजू बेंच पर दरी बिछाकर सो गया था।

सुबह पौ फटते – फटते बारिश धीमी होने लगी थी। अब केवल हल्की फुहार ही पड़ रही थी। सूर्यदेव हल्की सी लालिमा लिए इंद्रधनुष बनाने की तैयारी कर रहे थे। बादल हौले – हौले सिमट रहे थे।

सह्रदय बिरजू के अपनेपन ने सेठ जी का दिल जीत लिया था। उसकी दुर्दशा ने उन्हें विचलित कर दिया था। अब उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया था बिरजू को अपने साथ ले जाके हाईवे लिट्टी – चोखा ढाबा खोलने का।

बारिश थम चुकी थी। चारों ओर मिट्टी की सौंधी खुशबू फैल चुकी थी। सेठ जी और बिरजू मोटी – मोटी रोटियां और हरी चटनी बनाते हुए इंद्रधनुष को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन दोनों के जीवन का रीतापन भरने वाला था। उनका फीका हो चुका जीवन अब फिर से इंद्रधनुष के सतरंगी रंगों से भरने वाला था।


Please comment and share this short story….. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“जाने दे” (Let it go)

हम अक्सर पुरानी बातों को अपने सर पर कूड़े की तरह ढोते रहते हैं और वह कूड़ा कब हमें कुंठित और बीमार कर देता है, हमें पता भी नहीं चलता। उस कूड़े की टोकरी को फेंककर आगे बढ़ जाना चाहिए।
We often carry old things like garbage on our head and when that waste makes us frustrated and sick, we do not even know. That garbage basket should be thrown and proceeded.

जो बीत गई
वह बात गई,
जो बात गई,
उसे जाने दे,
जिसमें था गम
और तेरी उदासी,
वह रात गई
उसे जाने दे,
मनहूस समझ
न उसे पकड़,
बहला ले दिल
उसे जाने दे,
आँसू थे जहाँ पर
नमक भरे,
उन्हें पोंछ के
मीठा खाने दे,
था कभी जो गम
कर उसको कम,
अब रीत नई
अपनाने दे,
जो खुशी मिले,
ले उसे पकड़,
था जो भी बुरा,
मिट जाने दे,
धागा गाँठें बन
उलझा था,
न वक्त गंवा
सुलझाने में,
जो रुका था पानी
बन कीचड़,
उसे छोड़ जरा
बह जाने दे,
माथे पे कितने सारे बल,
उन्हें झाड़ जरा
गिर जाने दे,
यह होंठ जो तेरे
लटके हैं,
उन्हें खुल के तूँ
मुस्काने दे,
कोई ढूंढ बहाना
खुशियों का,
खुद को खुशियाँ
बन जाने दे।


Please comment if you like this post and please don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“आस”(Hope)

लघुकथा (Short Story)

भी रेगिस्तान भी तो समुंद्र रहा होगा। सागर की लहरें वहां भी तो हिलोरें भरती रही होंगी। तभी तो जल की जगह आज रेत की लहरों का सूखा समुंद्र चारों ओर दिखाई देता है। शायद इसीलिए रेगिस्तान में भटकते लोगों को मृगतृष्णा के कारण रेत की लहरें भी सागर की लहरों की मानिंद दिखाई देती हैं।
से ही रेगिस्तानी इलाके के दूरदराज में बसे पुराने गांवों में से एक गांव था वह। ज्यादातर मिट्टी से बने कच्चे मकान थे। केवल एक ही मकान पक्का था, जो अब देखरेख न हो पाने के कारण जर्जर होता जा रहा था।
दो – तीन कमरों के मकान के दालान में छोटी सी चारदीवारी थी, जिसके बीचों बीच लगे किवाड़ की कुण्डी आधी तो चमकती थी, पर आधी जंग से जंग हार रही थी और बापू की निगाहें उस कुण्डी को अपलक निहारती रहतीं थीं।
दालान में एक अदद पेड़ था, जो अक्सर शान्त ही रहता था और उसी के बगल में एक हैंडपंप था, जिसकी आवाज अब कम ही आती थी।
भी कोई आहट होती तो किवाड़ पहले ही चीं चीं कर बता देता…..पेड़ की पत्तियाँ हौले से सरसरा जातीं और नल से भी इस आस में पानी की दो बूंदे टपक जातीं कि कोई तो होगा अपना सा। जो भीतर कदम रखेगा और बापू को प्रणाम करके मुस्कुराते हुए अपना मैडल बापू के गले में पहना देगा…..कभी तो वह दिन आएगा।
स घर के पुरखों ने भी जंगें लड़ीं थीं….बेटे ने भी….जो लगभग बीस साल पहले नई नई वर्दी पहनकर ऊँट की सवारी करता हुआ शान से बार्डर की ओर पहरेदारी करने निकला था….पर लौटा नहीं।
रेगिस्तान में भी नमी न थी और बापू की आंखों में भी सूखे की कोई कमी न थी, जिनमें अब नमी आने की सम्भावना भी न के बराबर ही थी।
मौसम करवट बदल रहा था। रातें ठण्डी होने लगीं थीं। मौसम की मानिंद बापू की आस भी ठण्डी पड़नी शुरू हो गई थी और एक दिन बापू ने फौजी बेटे के आने की आस छोड़ दी। अब कोई आस शेष न बची थी।
ज पहली बार बापू ने स्वयं को बड़ा ही हल्का महसूस किया…क्योंकि भार तो इच्छाओं का ही होता है।
जैसे जैसे शाम ढलती जा रही थी, बापू अवचेतन में समाते जा रहे थे।
खिरकार अगले जन्म में नई प्रेरणा, नई चेतना और नई ऊर्जा के साथ उन्हें फौजी की वर्दी जो चाहिए थी।।



“अजेय”(Invincible)

विपत्तियां किस पर नहीं आतीं, दुख किसको नहीं मिलता। यह तो हमारा मन ही है, जो पल में ही हार मान लेता है।
पर यदि हम उन विकट परिस्थितियों में भी अपनी विवेक बुद्धि से काम लें और मन को सकारात्मक सोचने को विवश कर दें तो दुख के घने बादलों में भी आशा की सुनहरी किरण दिखाई दे जाती है। सच ही कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

Who does not get misery, who does not get sorrow. It is our mind that concedes defeat in the moment.
But if we work with our wisdom and intellect even in those difficult circumstances and make the mind think positively, then in the thick clouds of sorrow, a golden ray of hope is seen. Truth has been told that the losers of the mind are the losers, the victories won by the mind.

मन थक पड़ा,
मन गिर पड़ा,
निराशाओं के भंवर जाल में,
उलझ पुलझ के अंधकार में,
भर भर के खूब सोच विचारा,
कहो मिटे कैसे अंधियारा,
सहज ही भीतर बिजली कौंधी,
बरस प्रेम हुई मिट्टी सौंधी,
सूखे बीजों में जान पड़ी,
हरियाली की आस बढ़ी,
सूख चुके मन के बीजों में,
कोपल इक नई फूट गई,
निर आसा के भंवर जाल में,
लता सुहानी बढ़ी नई ।

संकल्प शक्ति (Willpower)

कभी-कभी हमारे भीतर विचारों का अंतर्द्वंद चलता रहता है। पर यदि संकल्प शक्ति हो तो आसानी से मन पर विजय पाई जा सकती है।(Sometimes there is a conflict of thoughts within us.  But if you have the power to resolve, then the mind can easily be conquered.)


आज मन था कुछ गमगीन,
कवितायें लिख दीं तीन,
मन बुझा बुझा सा बोझिल था,
चिंता के जाल में उलझा था,
कलम ने उठ कुछ लिखना चाहा,
पर मन को यह सब न भाया,
उसे तो करनी मनमानी थी,
उसकी तो यह जन्मजात निशानी थी,
पर हिम्मत कर कलम बोली,
वैसे तो मेरी सांसें फूलीं,
तुझसे कौन जीत सका है,
हर कोई तो तुझसे थका है,
पर अब मैं तुझसे हार न मानूं,
मुझे झुका तो मैं जानूं,
तूं चाहता लिखूँ गम की गज़ल,
कर दूं सबकी आंखें सजल,
पर मेरी नहीं यह नीयत है,
मेरी हरी भरी तबीयत है,
डिस्चार्ज न मैं हो पाऊंगी,
कोरे कागज के सीने पे,
नित ऊर्जा भरती जाऊंगी।