सांझ की सुबह Dawn of Dusk

सांझ को दिल थोड़ा घबराया,
पड़ा सोच – कुछ समझ न आया,
कुछ हल्का सा पीया – खाया,
कुछ पढ़ा – सुना – कुछ गुनगुनाया,
पर अनमने मन को रास न आया,
युक्ति हुई न कोई कारगर,
दिल को अपने डूबता पाया,
सब बात भुला – करके साहस,
जोर लगा के भीतर मन का,
परदा सांझ का जरा उठाया,
था घोर अंधेरा – दिखता न था,
मीलों घण्टों खुद को भटकाया,
चूर हुआ पर हार न मानी,
मद्धिम प्रकाश नजर था आया,
रात्रि कालिमा भंग हो गई,
फटी पौ – सूरज चढ़ आया,
अब जान लिया था मैने भी,
सांझ को दिल था क्यों घबराया,
बिछड़ के अपने ही प्रकाश से,
सुख और किसी में नहीं था आया,
पर उस सांझ का अंत मधुर था,
अब था मुझको समझ में आया।


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सत्य का दीप Lamp of Truth

यदि हमें अपने समस्त प्रारब्ध की स्मृति हो जाए तो हो सकता है कि हम लज्जा से स्वयं से ही दृष्टि न मिला पाएं। तो क्यों न हम इस बार स्वंय में सुधार लाकर अपना स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित करें।
If we get power to memorise our all previous lives, may be we become shy for our misdeed.
So why don’t we ensure our golden future by improving ourselves in this present life.

दृष्टि दर्पण से मिलाकर,
देख ले अंतर पतित,
जन्मों जन्मों का किया,
जो हो गया है विस्मृत,
स्मृत जो हो जाएगा तो,
हो जाएगा फिर लज्जित,
कर ले तौबा दुष्कर्मों से,
दिल से कर ले प्रायश्चित,
छोड़ दे लालच,
और कितना करेगा एकत्रित,
कर ले अध्ययन गहन,
विचार कर ले संकुचित,
अब न कर अपना पराया,
स्वयं में हो प्रतिष्ठित,
कर के खेती प्रेम की,
सच को कर ले अंकुरित,
तोड़ बेड़ी सीमाओं की,
कर स्वयं को असीमित,
मांज धूमिल अंतःकरण,
और कर ले उज्जवलित,
जला के दीप सत्य का,
कर ह्रदय में प्रज्ज्वलित।


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