“बढ़े चलो”(Go ahead)

न हार मानो, न ही रुको, न ही थको, चलो, आगे बढ़ो…लक्ष्य प्रप्ति निश्चित है।
Don’t give up, don’t stop, don’t be tired…Come on, go ahead … the goal is certain.

न रुको
तुम डटो,
प्रताप सूर्य
का बनो,
न थको
निसदिन चलो,
कण कण का तुम
उत्साह बनो,
ले सच का
ओट आसरा,
सच की दिशा
में ही बढ़ो,
ध्वजा को थाम
धर्म की,
काल अधर्म
का बनो,
नव ज्योति
कर प्रज्ज्वलित,
नवयुग का तुम
सृजन करो। – जसविंदर सिंह


Please share my motivational poem. Regards, Jasvinder Singh

“जाने दे” (Let it go)

हम अक्सर पुरानी बातों को अपने सर पर कूड़े की तरह ढोते रहते हैं और वह कूड़ा कब हमें कुंठित और बीमार कर देता है, हमें पता भी नहीं चलता। उस कूड़े की टोकरी को फेंककर आगे बढ़ जाना चाहिए।
We often carry old things like garbage on our head and when that waste makes us frustrated and sick, we do not even know. That garbage basket should be thrown and proceeded.

जो बीत गई
वह बात गई,
जो बात गई,
उसे जाने दे,
जिसमें था गम
और तेरी उदासी,
वह रात गई
उसे जाने दे,
मनहूस समझ
न उसे पकड़,
बहला ले दिल
उसे जाने दे,
आँसू थे जहाँ पर
नमक भरे,
उन्हें पोंछ के
मीठा खाने दे,
था कभी जो गम
कर उसको कम,
अब रीत नई
अपनाने दे,
जो खुशी मिले,
ले उसे पकड़,
था जो भी बुरा,
मिट जाने दे,
धागा गाँठें बन
उलझा था,
न वक्त गंवा
सुलझाने में,
जो रुका था पानी
बन कीचड़,
उसे छोड़ जरा
बह जाने दे,
माथे पे कितने सारे बल,
उन्हें झाड़ जरा
गिर जाने दे,
यह होंठ जो तेरे
लटके हैं,
उन्हें खुल के तूँ
मुस्काने दे,
कोई ढूंढ बहाना
खुशियों का,
खुद को खुशियाँ
बन जाने दे।


Please comment if you like this post and please don’t forget to share. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh

“आस”(Hope)

लघुकथा (Short Story)

भी रेगिस्तान भी तो समुंद्र रहा होगा। सागर की लहरें वहां भी तो हिलोरें भरती रही होंगी। तभी तो जल की जगह आज रेत की लहरों का सूखा समुंद्र चारों ओर दिखाई देता है। शायद इसीलिए रेगिस्तान में भटकते लोगों को मृगतृष्णा के कारण रेत की लहरें भी सागर की लहरों की मानिंद दिखाई देती हैं।
से ही रेगिस्तानी इलाके के दूरदराज में बसे पुराने गांवों में से एक गांव था वह। ज्यादातर मिट्टी से बने कच्चे मकान थे। केवल एक ही मकान पक्का था, जो अब देखरेख न हो पाने के कारण जर्जर होता जा रहा था।
दो – तीन कमरों के मकान के दालान में छोटी सी चारदीवारी थी, जिसके बीचों बीच लगे किवाड़ की कुण्डी आधी तो चमकती थी, पर आधी जंग से जंग हार रही थी और बापू की निगाहें उस कुण्डी को अपलक निहारती रहतीं थीं।
दालान में एक अदद पेड़ था, जो अक्सर शान्त ही रहता था और उसी के बगल में एक हैंडपंप था, जिसकी आवाज अब कम ही आती थी।
भी कोई आहट होती तो किवाड़ पहले ही चीं चीं कर बता देता…..पेड़ की पत्तियाँ हौले से सरसरा जातीं और नल से भी इस आस में पानी की दो बूंदे टपक जातीं कि कोई तो होगा अपना सा। जो भीतर कदम रखेगा और बापू को प्रणाम करके मुस्कुराते हुए अपना मैडल बापू के गले में पहना देगा…..कभी तो वह दिन आएगा।
स घर के पुरखों ने भी जंगें लड़ीं थीं….बेटे ने भी….जो लगभग बीस साल पहले नई नई वर्दी पहनकर ऊँट की सवारी करता हुआ शान से बार्डर की ओर पहरेदारी करने निकला था….पर लौटा नहीं।
रेगिस्तान में भी नमी न थी और बापू की आंखों में भी सूखे की कोई कमी न थी, जिनमें अब नमी आने की सम्भावना भी न के बराबर ही थी।
मौसम करवट बदल रहा था। रातें ठण्डी होने लगीं थीं। मौसम की मानिंद बापू की आस भी ठण्डी पड़नी शुरू हो गई थी और एक दिन बापू ने फौजी बेटे के आने की आस छोड़ दी। अब कोई आस शेष न बची थी।
ज पहली बार बापू ने स्वयं को बड़ा ही हल्का महसूस किया…क्योंकि भार तो इच्छाओं का ही होता है।
जैसे जैसे शाम ढलती जा रही थी, बापू अवचेतन में समाते जा रहे थे।
खिरकार अगले जन्म में नई प्रेरणा, नई चेतना और नई ऊर्जा के साथ उन्हें फौजी की वर्दी जो चाहिए थी।।