“वापसी” (Return)

कोरोना ने बहुत कुछ छीना है। पर अगर हार न मानी जाये तो जीत होनी तय है….इसी पे आधारित एक लघुकथा कविता के साथ….
Corona has snatched a lot. But if we don’t give up then victory is sure to happen…. Presenting a short story with poem based on this….

क्या यार…आज भी कोई सनसनाहट नहीं…लगता है आज भी कोई गाड़ी नहीं चलने वाली…आज फिर पेट भर खाए बिना सब जागेंगे…पटरी से कान सटाए हुए सुंदर मन ही मन बुदबुदा उठा। सिग्नल आज भी लाल थे….मानो गाड़ी को न रोक रहे हों….भाग्य को को ही रोक रहे हों। मायूस हो सुंदर घर की तरफ चल पड़ा।

बड़े शहर में आने के बाद तो सुंदर की मौज हो गई थी। कहां गांव में खेतीबाड़ी करके बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी नसीब हो पाती थी और यहां तो मेहनत से ज्यादा मिल जाता था, तभी तो वह अपने परिवार को भी अपने संग लिवा लाया था।

रेलवे स्टेशन के आऊटर के पास बनी झुग्गी – झोंपड़ियों में से एक में परिवार संग रहता था वह। रेलवे स्टेशनों की तरह उस आऊटर पर भी कभी रात न होती थी। कभी कोई आने वाली गाड़ी रुकती तो कभी जाने वाली।

आऊटर के पास खड़े सिग्नल मुस्कुराकर ट्रेनों को चलने – रुकने का इशारा किया करते थे। कभी हरे होते तो कभी लाल। इन्हीं की रोशनी से पटरियां रात भर चमकती रहतीं थीं।

वहां का कोई भी निवासी कभी नौकरी ढूंढने नहीं जाता था….जाना भी क्यों कर था….सभी अपना – अपना काम जो करते थे। बच्चे हों या जवान, सभी कुछ न कुछ बेचा करते थे। जैसे ही कोई गाड़ी रुकती, सभी उस पर टूट पड़ते और कुछ न कुछ कमाई करके खुशी – खुशी घर आ जाते।

सुंदर की सयानी पत्नी छोटे – छोटे समोसे और चटपटी चटनी बनाती। गाड़ी रुकते ही सुंदर जोर से चिल्लाता….

मेरा है छोटू समोसा खास,
इसकी चटनी है झक्कास,
खुशबू इसकी बड़ी सुहानी,
ट्रेन हो जाती है दीवानी…

कभी – कभी सड़क के किनारे बने पिज्जा कॉर्नर से छोटे – छोटे पिज्जा भी लाकर बेचता…जो हाथों हाथ बिक जाते।
पीछे – पीछे उसके दोनों लड़के बर्फ वाली बाल्टी में कोल्ड ड्रिंक लेके दौड़ते….जीवन बड़े मजे में कट रहा था, न जाने किसकी नजर लग गई।

सुना था जोर बड़ा रेलवे ‘इंजन’ में है,
पर अब जाना जोर तो “निरंजन” में है… जिसके एक छोटे से किटाणु ने सारे के सारे इंजन रोक दिये।

पटरियों के किनारे बना घर,
अब सूना – सूना सा क्यों लगता है,
जहां दिन – रात खटकतीं थीं पटरियां,
अब खटके बिना जी न लगता है,
जहां शोर इतना होता था,
बात नहीं हो पाती थी,
इशारों से चलता था काम,
आंखें ही सब समझातीं थीं,
कभी खटर – पटर,
कभी धमक – धमक,
कभी धड़क – धड़क,
कभी भड़क – भड़क,
इक आती थी,
इक जाती थी,
इक रूकती थी,
इक चलती थी,
जब देखो सीटी बजती थी,
अब आंखों से ही ओझल हैं,
अब जीवन कितना बोझिल है,
पटरी सूनी जो हो गई है,
जीवन की रेखा थम गई है,
कौन जाने किस घड़ी देवदूत कब आएंगें,
बुत बने खड़े से यह सिग्नल,
फिर लाल – हरे हो जाएंगे।

अब बच्चों का दुख बर्दाश्त न होता था। बहुत से लोग अपने गॉंव की ओर पलायन कर रहे थे। सुंदर ने भी कठिन फैसला लिया और जिन पटरियों ने दिन रात कमाई करवाई, उन्हीं पे आज चल के गाँव की ओर जाने को मजबूर हो गए।

हजारों मुश्किलों को सहते गाँव तो पहुँच गए, पर अब करें क्या। इतने छोटे से खेत में क्या कर पाएंगे।

पर जहां चाह, वहाँ राह। सुंदर ने हार न मानी। उसने परिवार संग मिलकर एक मिट्टी का तन्दूर बनाया और बगल के शहर से समान लाकर छोटे – छोटे पिज्जा बनाने शुरू कर दिए।

अब ‘सुंदर पिज्जा’ न केवल गाँव वालों को भाता है बल्कि आसपास के गाँवों से भी काफी डिमांड आने लगी है और उसके बदरंग होते जीवन में फिर से नए रंग भरने लगे हैं। लाल हो चुके सिग्नल फिर से हरे हो कर उसके भाग्य की रेखा को रंगबिरंगी रोशनी से भर रहे हैं।


If you like this positive story as well as poem of migrants, please comment and share.. Regards, Jasvinder Singh, Himachal Pradesh