“बड़े बोल”(Spiel)

अपनी ओर से बातें जोड़कर मूल बात का स्वरूप कितना ही बदलने का प्रयत्न क्यों न किया जाए, वह दमहीन ही रहता है और सच बात का स्वरूप सर्वथा सत्य ही बना रहता है।
No matter how much we try to change the nature of the original matter by adding things on our behalf, it remains powerless and the nature of the truth remains completely true.

कुछ पढ़ा
कुछ गढ़ा,
कुछ था सच
कुछ मढ़ा,
कुछ था जुड़ा
कुछ जड़ा,
पर था फीका
रसहीन रहा,
जो उपरंत जुड़ा
दमहीन रहा,
जो था मिथ्या
वह गया बिखर,
बिन सोचे समझे
बिन जाने,
बिन निज अनुभव के
अनजाने,
वह तेजहीन ही
बना रहा,
था जो मूल
वह बचा रहा,
और अनंत काल तक
अमर रहा।


Please share as much as. Regards, Jasvinder Singh