“ज्ञान” Knowledge

ज्ञान की अधिकता हो जाने पर ज्ञानी अपना ज्ञान बघारना शुरू कर देता है और वाहवाही मिलने पर अहंकार से फूलना शुरु कर देता है। यही ज्ञान ज्ञानी का निज जीवन भी सँवार सकता है और अहंकार होने पर उसे गर्त में भी डाल सकता है।When knowledgeable person start preaching, he start becoming arogant. He can improve his life with his knowledge but he should avoid ego.

ओ ज्ञानी न ज्ञान बघार,
पहले निज अंतर पहचान,
निकले शब्द बड़े ही भारी,
अहंकार में सनी जबान,
सुने किसी की कभी नहीं,
छेड़े केवल अपनी तान,
अपने ज्ञान की गठरी भारी,
अधिक भार से निकली जान,
बड़े बोल न बोल रे भाई,
इसमें नहीं तुम्हारी शान,
अधकल गगरी छलकत जाए,
भर ले गगरी फिर कर मान,
उलझे धागे पड़ गईं गाँठें,
जब से बढ़ गया अक्षर ज्ञान,
खोल जरा उलझी गांठों को,
अपने को पहले सा जान,
समय को न पहचान सका तू,
समय बड़ा ही है बलवान,
करे शिकार ज्ञान का पहले,
तोड़े बहुतों के अभिमान,
ज्ञान अज्ञान की छील के परतें,
नए सिरे से कर स्नान,
परम ज्ञान होगा प्रकाशित,
जब हो जाएगा अंतर्ध्यान।


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