तुलना Comparison

वैसे तो मनुष्य का स्वभाव आरम्भ से ही दूसरों से अपनी तुलना करने का रहा है। वह या तो दूसरे से श्रेष्ठ बनना चाहता है या दूसरे को श्रेष्ठ बनते देखते हुए देख कर मन ही मन कुढ़ता है।
पर जो दूसरों से अपनी तुलना नहीं करता…वास्तव में वही श्रेष्ठ होता है।
From the very beginning human nature has been to compare himself with others. He either wants to be superior to the other, or seeing the other becoming superior, he become upset.
But the one who does not compare himself to others … Actually he is the best.

आजकल तो जिसको देखो,
तुलना करने बैठा है,
पास में हो कुछ या न हो,
न जाने क्यों ऐंठा है,
बोले बातें ज्ञान भरी,
भीतर कितना रीता है,
हांके गप्पें बड़ी बड़ी,
समझे खुद को नेता है,
करता अभिनय बात बात में,
जैसे कि अभिनेता है,
देख सफलता औरों की,
मन ही मन में जलता है,
मटमैला मन सना मैल से,
एकाकी में रोता है,
रख के भीतर बुरे विचार,
ऊपर तन को धोता है,
छोड़ दे ईर्ष्या,
कर मत कुंठा,
काहे विष को पीता है,
भंवर जाल में फंस के इसके,
बारम्बार जन्मता है,
कर सन्तोष उसी में प्यारे,
जितनी तेरी क्षमता है,
मान उसी में सुख
जितनी कि,
आवश्यक आवश्यकता है,
पर सुख देखन छोड़ के भाई,
कर सन्तोष जो लेता है,
देता भगवन उसी को प्यारे,
जो सम भाव से रहता है।


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“ईर्ष्या” (Jealous)

हम दुखी क्यों रहते हैं, क्योंकि हम हमेशा दूसरों से अपनी तुलना करते रहते हैं। अगर हम दूसरों से अपनी तुलना बन्द करके सारा ध्यान स्वयं पर केंद्रित कर दें और आगे बढ़ने की कोशिश करें तो हम खुश तो रहेंगे ही, आगे भी बढ़ेंगे। Why we remain unhappy, because we always compare ourselves to others. If we stop comparing ourselves to others and focus all attention on ourselves and try to move forward, we will be happy, we will also move forward.

पतंगें दो थीं,
इक इसकी थी,
इक उसकी थी,
इक और थी,
कहीं दूर थी,
छोटी ही सही,
पर दिखती थी,
इसकी भी उड़ी,
उसकी भी उड़ी,
मैं क्यों नीचे,
वह क्यों ऊपर,
यह सोच थी,
उन दोंनों में जड़ी,
ईर्ष्या आई,
रह न पाईं,
फिर दोनों ही,
आपस में भिड़ीं,
इसका मांझा तो पक्का था,
उसका मांझा भी कम न था,
इतना ऊपर उड़ने पर भी,
सन्तोष नहीं हो पाता था,
मैं तो खुश हूँ,
पर क्यों खुश वह,
यह गम ही तो सताता था,
जो दूर थी वह,
अकेली ही सही,
पर ऊपर उठती जाती थी,
थी मस्त पवन,
थी प्रेम में वह,
मन ही मन में,
मुस्काती थी,
इसकी भी लड़ी,
उसकी भी भिड़ी,
मन में थी जलन,
बढ़ती ही रही,
कुछ दाँव चले,
कुछ पेंच चले,
मन में कटुता,
बढ़ती ही रही,
ऊपर नीचे के चक्कर में,
उड़ गए चिथड़े,
दोनों ही फटीं,
हुआ अंत बुरा,
उन दोनों का,
इसकी भी कटी,
उसकी भी कटी,
जो दूर में थी,
वह छोटी सी,
अब आँखो से न दिखती थी,
वह मस्त गगन में उड़ती थी,
ऊपर ही ऊपर बढ़ती थी।

There were two kites, belonged to different people. A another kite looked small from a distance. Both of them had the same mindset that another’s kite shouldn’t go above my kite. Jealous increased and they both trying to make each other fall down. Though thread of the both kites was very strong. Both were not satisfied even after reaching such a height. They were sad to see the growth of each other. On the other hand the third kite, which was alone, was filled with love, smiling at the heart, flying in the cool air. Jealousy increased and they both faught with each other. Bitterness was kept growing in their hearts. Both started fighting badly and both fell down after cutting each others thread. The alone kite, which had never faught with anyone, kept flying in the sky with great joy.


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