“विस्मरण” (Oblivion)

हम भले ही इस जन्म में कितनी ही ऊंचाइयों को छू लें, कितना ही सुखी क्यों न हो जाएं, पर भीतर एक खालीपन, एक रीतापन, कुछ कमीं, कुछ तड़प सदैव महसूस होती है। इसीलिए सुख भोगते हुए भी, आनंद की कमी हमेशा रहती है।
कारण एक ही है, ईश्वर को किए हुए वायदे को भूलना…..जो हम गर्भ में करके आए थे और जन्म लेते ही भूल गए…
विस्मरण को स्मरण में बदलते ही खालीपन भरने लगता है। No matter how much we achieved in our life, no matter how happy we are, but there is always an emptiness, some deficiencies, some yearning. That’s why, even while enjoying happiness, there is always a lack of pleasure. The reason is same, we’ve made promise to God in the womb and forgot as soon as we were born…
As soon as forgetfulness changes into remembrance, emptiness begins to fill.

चावल के दाने से लेकर,
दो बित्तों तक बड़ा किया,
गर्भ में तुझको पाला पोसा,
और धरा पर खड़ा किया,
करी व्यवस्था दूध की,
प्रथम तुझे आहार दिया,
बचपन तूने खेल बिताया,
यौवन का अंहकार किया,
उतरा यौवन ढली जवानी,
अधेड़ावस्था पार किया,
हुआ जीर्ण बदन अब तेरा,
जीवन का उपहास किया,
भूल गया जब तूँ भीतर था,
अंधकारमय जीवन था,
नौ माह तक तूँ कष्ट में लटका,
नर्क में तेरा डेरा था,
की प्रार्थना हे भगवन,
मुझे बचा इस जाल से,
उलझ गया हूँ पुलझ गया हूँ,
ले उबार जंजाल से,
रख ले मुझको बचा ले जीवन,
अब तूँ मुझको पाल ले,
करता हूँ वादा मैं तुमसे,
बाहर जब मैं जाऊंगा,
फँसूंगा न किसी और कृत्य में,
सुमिरन करता जाऊँगा,
भूल गए जो याद करो,
सोचो और विचार करो,
अभी नहीं बिगड़ा कुछ बंदे,
सुमिर के निज कल्याण करो।